JS 405 (Jawahar Safed Musli 405)
ICAR-DMAPR की अपनी आधिकारिक जारी-किस्मों की सूची में दर्ज सफ़ेद मूसली (Chlorophytum borivilianum) की एकमात्र किस्म — RVSKVV, मंदसौर से 2004 में जारी। बाक़ी ज़्यादातर किसान किसी नामी किस्म की बजाय पिछली स्वस्थ फ़सल से बचाए जड़ के टुकड़े रोपते।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- सफ़ेद मूसली
- प्रकार
- कंद-जड़ के टुकड़े, असली बीज नहीं
- सीज़न
- खरीफ़
- पकने की अवधि
- रोपाई के ~4–4.5 महीने बाद पत्तियाँ सूखतीं; जड़ें नवंबर–जनवरी में खुदतीं
- बीज दर
- 600–1,000 किग्रा/हेक्टेयर कंद-जड़ के टुकड़े (कली-डिस्क सहित उँगलियाँ, ≥5 ग्राम) — दर दूरी पर निर्भर; यह प्रजाति-मानक दर है, JS 405 के लिए अलग से तय नहीं
- अपेक्षित उपज
- 2–3 टन/हेक्टेयर ताज़ा जड़ → 400–600 किग्रा/हेक्टेयर सूखी — यह ICAR का प्रजाति-स्तर का आँकड़ा है; JS 405 के जारी-रिकॉर्ड में किस्म-विशेष उपज दर्ज नहीं
- उपयुक्त मिट्टी
- अच्छी जल-निकासी वाली बलुई दोमट या दोमट, pH 6.0–8.0
- जारी
- 2004 में जारी · RVSKVV शोध केंद्र, मंदसौर, मध्य प्रदेश
इस किस्म के बारे में
JS 405 (जवाहर सफ़ेद मूसली 405) राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (RVSKVV) के मंदसौर, मध्य प्रदेश स्थित शोध केंद्र से 2004 में जारी हुई, व ICAR-DMAPR की अपनी आधिकारिक जारी-किस्मों की सूची में दर्ज सफ़ेद मूसली की एकमात्र किस्म है। जारी-रिकॉर्ड — किस्म का नाम, जारी करने वाला केंद्र व वर्ष — के अलावा, उस सूची में JS 405 के लिए अलग से कोई उपज, अवधि या रोग-प्रतिरोध गुण दर्ज नहीं, इसलिए नीचे दी गई खेती-जानकारी ICAR के अपने उत्पादन-तकनीक नोट में बताई प्रजाति-स्तर की सफ़ेद मूसली (Chlorophytum borivilianum) की सामान्य पद्धति है, इस किस्म के लिए अलग से मापी गई नहीं। सफ़ेद मूसली असली बीज से नहीं उगाई जाती — "बीज" ख़ुद कंद-जड़ का एक टुकड़ा होता, जिसमें कली वाली डिस्क होती, व कम प्राकृतिक बीज-अंकुरण व विषमयुग्मजी स्वभाव के कारण, जड़ के टुकड़ों से वानस्पतिक प्रवर्धन (जैसा JS 405 में होता) ही मानक व्यावसायिक तरीक़ा है।
मुख्य विशेषताएँ
बुवाई व खेती
- बुवाई का समयमानसून की पहली या दूसरी अच्छी बारिश, आमतौर जून–जुलाई
- बीज दर600–1,000 किग्रा/हेक्टेयर कंद-जड़ के टुकड़े (कली-डिस्क सहित उँगलियाँ, ≥5 ग्राम) — दर दूरी पर निर्भर; यह प्रजाति-मानक दर है, JS 405 के लिए अलग से तय नहीं
- दूरी30 सेमी क़तार-से-क़तार × 10–15 सेमी पौधे-से-पौधे, मेड़ों या उठी क्यारियों पर — लगभग 3.33 लाख पौधे/हेक्टेयर
- बुवाई विधिअंकुरित जड़ के टुकड़े मेड़ों या उठी क्यारियों पर रोपें; भारी मिट्टी या ज़्यादा बारिश वाले इलाक़ों में जल-निकासी के लिए मेड़ें ज़रूरी
- सिंचाईमानसून समय पर हो तो लगभग कोई सिंचाई नहीं; मानसून धोखा दे या लंबा सूखा अंतराल आए तो 10–15 दिन के अंतराल पर लगभग 6–8 सिंचाई, पत्ती गिरने के बाद भी जारी
- उर्वरकखेत-तैयारी में 10–15 टन/हेक्टेयर अच्छी सड़ी गोबर खाद, साथ ही कुल 50:40:40 किग्रा N:P:K प्रति हेक्टेयर — यह प्रजाति-मानक खुराक है जो ICAR अच्छी जड़ उपज के लिए बताता
- कटाईरोपाई के लगभग 4–4.5 महीने बाद पत्तियाँ सूखने लगतीं। कच्चे दवा-माल के तौर पर बिक्री के लिए, पूरी तरह पकने पर नवंबर–जनवरी में खोदें; अगर जड़ें अगले सीज़न की बुवाई सामग्री के लिए रखनी हों, तो मार्च–अप्रैल तक ज़मीन में छोड़ सकते
मिट्टी व जलवायु
मिट्टी
- उपयुक्त मिट्टी
- अच्छी जल-निकासी वाली बलुई दोमट या दोमट, जैविक पदार्थ से भरपूर व इतनी भुरभुरी कि कंद-जड़ें बेरोकटोक फैल सकें
- सिंचाई
- जल-निकासी अच्छी होनी चाहिए — पानी रुकने से कंद ख़राब होते व जड़-कॉलर गलन आता, इसीलिए ज़्यादा बारिश वाले इलाक़ों में मेड़ें या उठी क्यारियाँ इस्तेमाल होतीं
जलवायु
- जलवायु
- दिन का 30–35°C तापमान, 500–1,500 मिमी बारिश, लगभग 1,500 मी ऊँचाई तक — यह मानसून पकड़ने के लिए रोपी जाती व सीज़न भर गिरने वाली बारिश पर ही ज़्यादातर बढ़ती
उपज व अवधि
पकने की अवधि
रोपाई के ~4–4.5 महीने बाद पत्तियाँ सूखतीं; जड़ें नवंबर–जनवरी में खुदतीं
अपेक्षित उपज
2–3 टन/हेक्टेयर ताज़ा जड़ → 400–600 किग्रा/हेक्टेयर सूखी — यह ICAR का प्रजाति-स्तर का आँकड़ा है; JS 405 के जारी-रिकॉर्ड में किस्म-विशेष उपज दर्ज नहीं
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
मुख्य रोग
प्रबंधन सुझाव
- ICAR का अपना उत्पादन-नोट कहता कि सफ़ेद मूसली पर कभी-कभार पत्ती खाने वाली इल्ली व गीले मौसम में पत्ती झुलसा के अलावा अब तक कोई गंभीर रोग-कीट दर्ज नहीं हुआ — अच्छी जल-निकासी व स्वस्थ बुवाई सामग्री इस फ़सल की ज़्यादातर परेशानी रोक देतीं।
- सीज़न भर हर आने वाली फूल-बाली तोड़ते रहें — यह अकेला काम कंद-जड़ की उपज लगभग एक-तिहाई तक बढ़ा सकता है।
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- ICAR-DMAPR के आधिकारिक जारी-रिकॉर्ड वाली एकमात्र सफ़ेद मूसली किस्म, किसी बेनाम खेत-बचाई जड़ लाइन की बजाय।
- मध्य प्रदेश पट्टी के लिए ख़ास तौर पर जारी — भारत में इस फ़सल के मुख्य उगाने वाले इलाक़ों में से एक।
ध्यान रखने योग्य बातें
- आधिकारिक जारी-रिकॉर्ड में सामान्य खेत-बचाई बुवाई सामग्री पर किस्म-विशेष उपज, अवधि या रोग-प्रतिरोध की बढ़त दर्ज नहीं — इसे साबित उपज-सुधार नहीं, बल्कि दस्तावेज़ी मूल वाली किस्म मानें।
- हर सफ़ेद मूसली की तरह, यह फ़सल भी सीधे दवा-बाज़ार ख़रीदारों को गुणवत्ता व ग्रेड पर बिकती, कोई एमएसपी या मंडी-शैली खुली बिक्री-व्यवस्था नहीं।
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- मध्य प्रदेश
- गुजरात
- राजस्थान
- महाराष्ट्र
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
JS 405 क्या है?
सफ़ेद मूसली (Chlorophytum borivilianum) की एक बुवाई-जड़ किस्म, जो 2004 में RVSKVV के मंदसौर, मध्य प्रदेश स्थित शोध केंद्र से जारी हुई — ICAR-DMAPR की अपनी आधिकारिक जारी-किस्मों की सूची में दर्ज एकमात्र सफ़ेद मूसली किस्म।
JS 405 कब रोपें?
मानसून की पहली या दूसरी अच्छी बारिश पर, आमतौर जून–जुलाई — बरसात वाले दिन ही रोपाई करने से ज़्यादा जड़ के टुकड़े जीवित रहते।
JS 405 को प्रति हेक्टेयर कितनी बुवाई सामग्री चाहिए?
600–1,000 किग्रा/हेक्टेयर कंद-जड़ के टुकड़े, हर एक में कम-से-कम 5 ग्राम कली वाली डिस्क — दर बुवाई की दूरी पर निर्भर, व यह फ़सल का सबसे बड़ा अकेला ख़र्च है।
क्या JS 405 सामान्य सफ़ेद मूसली बुवाई सामग्री से ज़्यादा उपज देती?
आधिकारिक जारी-रिकॉर्ड में किस्म-विशेष उपज-बढ़त दर्ज नहीं — इसका दस्तावेज़ी मूल्य एक जाँची-परखी, आधिकारिक उत्पत्ति है, खेत-बचाई जड़ों पर साबित उपज-बढ़त नहीं।
सफ़ेद मूसली की कटाई कब होती?
रोपाई के लगभग 4–4.5 महीने बाद पत्तियाँ सूखने लगतीं। कच्चे दवा-माल की बिक्री के लिए जड़ें नवंबर से जनवरी में खोदी जातीं, या अगले सीज़न की बुवाई सामग्री के लिए मार्च–अप्रैल तक छोड़ी जातीं।
स्रोत: ICAR-DMAPR — Crop Improvement (Released Varieties table), ICAR-DMAPR — Crop Production (Safed Musli agronomy), Khadke et al., "Production technology of safed musli", Indian Horticulture (ICAR), Sept–Oct 2023. संपादकीय नीति.
