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मध्यमअपडेट 6 सितंबर 2026

अरबी (घुइयाँ)

Colocasia esculenta

बीज से नहीं, छोटी कॉर्मेल (गाँठों) से उगाई जाती है, और कंद फ़सलों में असामान्य है क्योंकि यह सचमुच वह जलभराव सह लेती है जो आलू या शकरकंद को सड़ा देता — पर फिर भी दो चीज़ें फ़सल तय करतीं: अरबी पत्ती झुलसा, एक फफूँद जो एक ही नम दौर में खेत की पत्तियाँ झाड़ सकती, और कसैलापन, कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल से आती चुभने वाली, खुजलाने वाली स्वाद जिसे एक कम-कसैली किस्म व अच्छी तरह पकाना दोनों काबू में रखते हैं।

A pile of freshly harvested arbi (taro/colocasia) corms with soil still clinging to their fibrous brown skin

त्वरित सारांश

इस पेज की मुख्य बातें लगभग दो मिनट में — पढ़ें या सुनें।

त्वरित सारांश

अरबी, जिसे टैरो या कोलोकेसिया भी कहते (Colocasia esculenta), एक कंद फ़सल है, पूर्वी व दक्षिणी पट्टी भर उगाई जाती — पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ व असम, साथ ही दक्षिण (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक) व गुजरात भी इसे उगाते हैं। किसान इसे कंद के लिए उगाते, जो सब्ज़ी के रूप में बिकता, और कई इलाक़ों में पत्तियों के लिए भी, जो साग की तरह पकाई जातीं या पत्रा जैसे व्यंजन बनातीं। यह बिल्कुल बीज से नहीं उगाई जाती — हर पौधा एक स्वस्थ मातृ कंद से काटी छोटी साइड-कॉर्मेल से शुरू होता।

जो अरबी को बाक़ी कंद फ़सलों से अलग करता वह है पानी से उसका बर्ताव। आलू व शकरकंद एक-दो दिन खड़े पानी में सड़ जाते; अरबी सचमुच इसे सह लेती, और कुछ नीची पट्टियों में इसे लगभग एक वेटलैंड फ़सल की तरह उगाया जाता, खेत सीज़न के बड़े हिस्से नम रखा जाता। इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा दलदल में रहना पसंद है — स्थिर, एक-समान नमी ही असल में एक अच्छा कंद बनाती, और एक सच्चा सूखा दौर फिर भी उपज घटाता है।

जो रोग अरबी फ़सल तय करता वह है अरबी पत्ती झुलसा, एक फफूँद के कारण जो ठीक उसी गरम, नम मौसम में फलती-फूलती जो भारत की अधिकांश अरबी पट्टी को मानसून में मिलता है। यह छोटे पानी-भरे धब्बों से शुरू होता और कुछ ही दिनों में खेत की पूरी पत्ती-छतरी में फैल सकता, अगर इस पर नज़र न रखी जाए व जल्दी छिड़काव न हो तो उपज बुरी तरह घटती है। फ़सल का दूसरा तय-कारक गुण है कसैलापन — कंद व पत्ती में सुई-जैसे कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल से आती मुँह व नंगी त्वचा पर खुजली व जलन। कुछ परंपरागत प्रकार तेज़ कसैले हैं; श्री हीरा जैसी नई किस्में ख़ासकर इसे कम रखने को विकसित हैं, और अच्छी तरह पकाना किस्म चाहे जो हो अधिकांश असर मिटा देता है।

फसल प्रकार
गरम-मौसम की कंद फ़सल (कॉर्मेल से उगाई, बीज से नहीं)
सीज़न
मुख्यतः खरीफ़ (अप्रैल–जून रोपाई); कुछ सिंचित रोपाई फ़रवरी–मार्च
उपयुक्त राज्य
पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, केरल, तमिलनाडु
बढ़वार अवधि
किस्म अनुसार 175–240 दिन
जल आवश्यकता
मध्यम; जलभराव सहती पर सूखा नहीं, एक-समान नमी चाहिए
तापमान
गरम, 25–32°C; दिन-निरपेक्ष पर पाले के प्रति संवेदनशील
मिट्टी
बलुई दोमट से चिकनी; ज़्यादातर कंद फ़सलों से ख़राब जल-निकासी बेहतर सहती, pH 5.5–7.0
कठिनाई स्तर
मध्यम (अरबी पत्ती झुलसा, कम-कसैली किस्म चुनना)
अपेक्षित उपज
15–20 टन/हेक्टेयर (उन्नत किस्म से 28 टन/हेक्टेयर तक)
मुख्य जोखिम
एक नम दौर में अरबी पत्ती झुलसा से फ़सल की पत्तियाँ झड़ना

परिचय

अरबी, या टैरो/कोलोकेसिया (Colocasia esculenta), एक गरम-मौसम की कंद फ़सल है, अपने स्टार्चयुक्त भूमिगत कंद के लिए और, कई इलाक़ों में, अपनी खाने-योग्य पत्तियों के लिए उगाई जाती। यह पूरी तरह एक मातृ कंद से काटी छोटी साइड-कॉर्मेल से प्रवर्धित होती — व्यावसायिक खेती में कोई बीज-बुवाई नहीं है।

यह पूर्वी पट्टी (पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़) व असम भर व्यापक रूप से उगाई जाती, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब व गुजरात में भी असली खेती है। ज़्यादातर कंद फ़सलों के विपरीत, यह सचमुच जलभराव व अर्ध-जलीय दशाएँ सह लेती, इसीलिए यह उस नीची ज़मीन में फिट होती जो आलू या शकरकंद को डुबो देती।

दो चीज़ें तय करतीं कि अरबी फ़सल कैसी निकलती: अरबी पत्ती झुलसा को जल्दी पकड़ना, क्योंकि फफूँद गरम, नम मौसम में फटती और कुछ दिनों में खेत की पत्तियाँ झाड़ सकती, और एक कम-कसैली किस्म चुनना साथ में सावधान पकाना, क्योंकि कंद व पत्ती में कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल लापरवाही से सँभालने या खाने पर तीखा, खुजली भरा स्वाद व त्वचा-जलन देते।

फसल की समयरेखा, बुवाई से कटाई तक

पूरे सीज़न की एक झलक — हर अवस्था की पूरी जानकारी के लिए नीचे संबंधित सेक्शन पर जाएँ।

  1. दिन 0

    रोपाई

    स्वस्थ साइड-कॉर्मेल (हर एक 20–35 ग्राम), पत्ती झुलसा व मुलायम सड़न से मुक्त, मेड़ों या क्यारियों में 5–10 सेमी गहरी लगाई, कतारें 45–60 सेमी दूर व कतार में 30–45 सेमी; बारानी फ़सल अप्रैल–जून, कुछ इलाक़ों में सिंचित फ़सल फ़रवरी–मार्च लगाई जाती।

  2. दिन 15–25

    अंकुरण

    दबी कॉर्मेल से अंकुर निकलते; अंकुरित न हुई किसी कॉर्मेल की गैप-फ़िलिंग करें। रोपाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई और लगभग एक हफ़्ते बाद फिर, एक-समान अंकुरण में मदद को।

  3. दिन 25–45

    स्थापना व पहली टॉप-ड्रेसिंग

    पहला उर्वरक विभाजन (पूरा फॉस्फोरस, आधी नाइट्रोजन व पोटाश) पौधे के आधार के पास दिया जाता, साथ में पहली निराई व लगभग 30–45 दिन पर मिट्टी चढ़ाई।

  4. दिन 45–90

    वानस्पतिक बढ़वार व कंद-आरंभ

    पत्ती-छतरी तेज़ी से बनती; कंद ज़मीन के नीचे बनना शुरू करता। यही वह समय भी है जब नम, गीले मौसम में अरबी पत्ती झुलसा का ख़तरा तेज़ी से बढ़ता — अभी से पत्तियों पर नज़र रखना शुरू करें। लगभग 60–75 दिन पर दूसरी मिट्टी चढ़ाई व बची उर्वरक खुराक दी जाती।

  5. दिन 90–150

    कंद भराव

    कंद व उसकी साइड-कॉर्मेल स्थिर रूप से फूलतीं; इस अवस्था भर एक-समान मिट्टी-नमी (न खड़ा पानी, न सूखा) ही असल में आकार व गुणवत्ता बनाती है। किसी भी नम दौर भर पत्ती झुलसा पर नज़र रखना जारी रखें।

  6. दिन 150–240

    परिपक्वता व कटाई

    फ़सल पकते पत्तियाँ पीली पड़तीं, सूखतीं व गिरतीं — अवधि किस्म अनुसार बहुत बदलती, एक जल्दी किस्म में लगभग 175 दिन से एक लंबी-अवधि किस्म में 240 दिन तक। खुदाई से 3–4 हफ़्ते पहले सिंचाई बंद करें।

उपयुक्त राज्य

जिन राज्यों में यह फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, वे नीचे हाइलाइट हैं। आपके खेत के लिए अंतिम सलाह हमेशा आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही देगा।

  • जम्मू और कश्मीर
  • हिमाचल प्रदेश
  • पंजाब
  • उत्तराखंड
  • हरियाणा
  • दिल्ली
  • उत्तर प्रदेश
  • राजस्थान
  • बिहार
  • झारखंड
  • पश्चिम बंगाल
  • सिक्किम
  • असम
  • अरुणाचल प्रदेश
  • मेघालय
  • नागालैंड
  • मणिपुर
  • मिज़ोरम
  • त्रिपुरा
  • गुजरात
  • मध्य प्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • महाराष्ट्र
  • ओडिशा
  • गोवा
  • तेलंगाना
  • आंध्र प्रदेश
  • कर्नाटक
  • केरल
  • तमिलनाडु
  • पुदुचेरी
  • लद्दाख
  • चंडीगढ़
  • लक्षद्वीप

यहाँ उगाई जाती है

जलवायु की ज़रूरतें

अरबी की जलभराव-सहनशीलता उस नीची ज़मीन पर एक सच्ची ताक़त है जो बाक़ी कंद फ़सलों को डुबो देती, पर यह जल-प्रबंधन पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने का लाइसेंस नहीं है — कंद-भराव भर एक सच्चा सूखा दौर फिर भी उपज घटाता, जैसे कहीं भी बहुत देर खड़ा पानी कंद-सड़न को बढ़ावा देता है।

  • आदर्श तापमान

    एक गरम, दिन-निरपेक्ष फ़सल जो 25–32°C पर सबसे अच्छी बढ़ती और ऊँचा तापमान भी ठीक-ठाक सह लेती, पर यह पाले के प्रति संवेदनशील है और ठंडे मौसम में बढ़वार तेज़ी से धीमी होती है।

  • वर्षा

    लगभग 700–1,000 मिमी अच्छी बँटी बारिश या उसके बराबर सिंचाई चाहिए। यह सूखे दौर व जलभराव/छोटी डुबान दोनों सचमुच सह लेती — कंद फ़सलों में एक असामान्य मेल — पर स्थिर, नियमित नमी ही सीज़न भर सबसे अच्छा कंद-आकार देती, कोई भी छोर नहीं।

  • नमी

    यह वह गुण है जिस पर सबसे ज़्यादा नज़र रखनी है: लंबे पत्ती-गीलेपन वाला गरम, नम मौसम ठीक वही है जो अरबी पत्ती झुलसा को खेत में फटने के लिए चाहिए, इसलिए नम मानसून दौर सिर्फ़ सामान्य देखभाल नहीं, सक्रिय निगरानी माँगते हैं।

  • धूप

    भरपूर धूप सबसे अच्छी कंद-उपज देती, पर अरबी ज़्यादातर खेत-फ़सलों से आंशिक छाया बेहतर सहती, यही कारण है दक्षिण व पूर्व में इसे अक्सर युवा नारियल, सुपारी या केले के नीचे अंतर-फ़सल के रूप में उगाया जाता है।

मिट्टी की ज़रूरतें

चूँकि अरबी सचमुच ज़्यादातर कंद फ़सलों से ज़्यादा पानी-सहनशील है, किसान कभी-कभी जल-निकासी को बिल्कुल अनावश्यक मान लेते। एक बुनियादी मेड़ या उठी-क्यारी प्रणाली उचित जल-निकासी के साथ फिर भी एक स्थायी जलभराव वाली नीची जगह में सीधे लगाने से बेहतर कंद-आकार देती व कंद-सड़न का ख़तरा घटाती है।

  • उपयुक्त मिट्टी

    बलुई दोमट से चिकनी दोमट, जैविक पदार्थ से भरपूर, अरबी को अच्छी सूट करती, और यह ज़्यादातर कंद फ़सलों से भारी, कम जल-निकासी वाली मिट्टी बेहतर सहती — एक वजह यह उस नीची ज़मीन पर उगाई जाती जो आलू या शकरकंद को नहीं सूट करती।

  • pH स्तर

    pH 5.5–7.0 सबसे अच्छा। यह मध्यम अम्लीय मिट्टी सह लेती, जो उस पूर्वी व दक्षिणी पट्टी को सूट करता जहाँ यह उगाई जाती।

  • जल निकासी

    बाक़ी कंद फ़सलों की तुलना में ख़राब जल-निकासी व खड़े पानी के छोटे दौर को असामान्य रूप से माफ़ करने वाली, हालाँकि इस सहनशीलता की सीमाएँ हैं — ख़राब जल-निकासी वाली जेबों में लंबा जलभराव फिर भी कंद-सड़न को बढ़ावा देता, ख़ासकर चोटिल या ख़राब-गुणवत्ता रोपण-सामग्री के साथ।

  • जैविक तत्व

    जैविक पदार्थ पर अच्छी प्रतिक्रिया देती — रोपाई से पहले मेड़ों या क्यारियों में मिलाई लगभग 10–12 टन/हेक्टेयर अच्छी सड़ी गोबर-खाद या कम्पोस्ट उपज व कंद-गुणवत्ता दोनों बढ़ाती है।

खेत की तैयारी

क्षेत्र चाहे जो हो, चार कदम वही रहते हैं — बस समय बुवाई के अनुसार बदलता है।

  1. 1

    जोतें व मेड़ें या उठी क्यारियाँ बनाएँ

    दो-तीन बार जोतकर बारीक भुरभुरा बनाएँ और 45–60 सेमी दूर मेड़ें या उठी क्यारियाँ बनाएँ। सचमुच नीची, अर्ध-जलीय पट्टियों में, अरबी को इसके बजाय एक पडल किए, धान-जैसे खेत में उगाया जाता — प्रणाली को आदत के बजाय खेत की असली जल-दशा से मिलाएँ।

  2. 2

    गोबर-खाद व आधारीय फॉस्फोरस मिलाएँ

    रोपाई से पहले मेड़-रेखा में 10–12 टन/हेक्टेयर अच्छी सड़ी गोबर-खाद या कम्पोस्ट, साथ पूरी फॉस्फोरस खुराक मिलाएँ।

  3. 3

    स्वस्थ, रोग-मुक्त कॉर्मेल चुनें

    एक स्वस्थ मातृ फ़सल से 20–35 ग्राम की साइड-कॉर्मेल काटें जिसने सीज़न में कभी पत्ती झुलसा या कंद-सड़न न दिखाई हो, और रोपाई से पहले कटे सिरों को फफूँदनाशी से उपचारित करें।

बीज की जानकारी

मुख्य किस्मों की तुलना — अवधि, उपज, रोग-प्रतिरोध या आप किस मक़सद से उगा रहे हैं, इसके आधार पर चुनें।

किस्मअवधिउपजरोग-प्रतिरोधसर्वश्रेष्ठ राज्यकिसके लिए उपयुक्त

श्री किरण

भारत में जारी पहली हाइब्रिड टैरो किस्म, ICAR-CTCRI तिरुवनंतपुरम द्वारा C-303 × C-383 के क्रॉस से विकसित। अर्ध-खड़ा, मध्यम-ऊँचा (70–80 सेमी) पौधा, अंडाकार कंद, हल्के भूरे छिलके व सफ़ेद गूदे के साथ, कटाई के बाद लगभग 60 दिन टिकने वाली कॉर्मेल के लिए उल्लेखनीय — एक टैरो किस्म के लिए असामान्य रूप से लंबा भंडारण-जीवन।

190–210 दिन17.5–28.5 टन/हेक्टेयरकोई विशेष प्रतिरोध दावा नहींकेरलसामान्य खेती, लंबा कटाई-पश्चात भंडारण

श्री पल्लवी

CTCRI की एक किस्म, एक लंबा (1–1.5 मीटर), कम-कल्ले वाला पौधा जो कई छोटी कॉर्मेल (20–25 प्रति पौधा) देता, अरबी पत्ती झुलसा व मोज़ेक रोग दोनों के प्रति खेत-सहनशील — जहाँ दोनों दबाव मौजूद हों वहाँ उपयोगी मेल।

195–210 दिन15–18 टन/हेक्टेयरपत्ती झुलसा व मोज़ेक के प्रति खेत-सहनशीलकेरलपत्ती झुलसा व मोज़ेक दोनों के इतिहास वाले खेत

श्री रश्मि

CTCRI की एक किस्म, एक लंबा (100–150 सेमी) पौधा जो अपेक्षाकृत कम इनपुट स्तरों पर भी अच्छा करता, अपने ग़ैर-कसैले कंद के लिए मूल्यवान जिसकी पकाने की गुणवत्ता व स्वाद अच्छा है — जहाँ कसैलापन एक बाज़ार-शिकायत रही हो वहाँ उपयोगी चुनाव।

210–240 दिन15–20 टन/हेक्टेयरकोई विशेष प्रतिरोध दावा नहींकेरलकम-कसैली टेबल इस्तेमाल, मामूली-इनपुट खेत

श्री हीरा

ICAR-CTCRI क्षेत्रीय केंद्र, भुवनेश्वर द्वारा ख़ासकर ओडिशा दशाओं के लिए जारी — बारानी ऊपरी व सिंचित मध्यम/नीची ज़मीन दोनों को उपयुक्त। ओडिशा की परंपरागत किस्मों में बहुत आम पत्ती झुलसा के प्रति सहनशील, यह प्रति पौधा 12–16 लंबी कॉर्मेल (14–18 सेमी) देती, बहुत कम कसैलेपन (कैल्शियम ऑक्सलेट लगभग 9.2 मिग्रा/100 ग्राम) व अच्छी पकाने की गुणवत्ता व सुगंध के साथ।

~180 दिन~18 टन/हेक्टेयरपत्ती झुलसा के प्रति सहनशीलओडिशापत्ती-झुलसा-प्रवण पट्टियाँ, कम-कसैली टेबल इस्तेमाल, ऊपरी व नीची दोनों खेत

पंजाब अरवी-1

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा जारी, लंबी, तिरछी-खड़ी हरी पत्तियों व लंबे, काफ़ी मोटे कंदों के साथ जिनका गूदा क्रीम, भूरे रंग की झलक लिए — उत्तर-पश्चिमी मैदानों को मुख्य संस्थागत रिलीज़।

~175 दिन~22 टन/हेक्टेयरकोई विशेष प्रतिरोध दावा नहींपंजाबउत्तर-पश्चिमी मैदानों की खेती

पंचमुखी

एक इकलौते संस्थागत रिलीज़ के बजाय कई राज्यों में मिलने वाला व्यापक रूप से उगाया परंपरागत प्रकार, स्थानीय रूप से उगाए प्रकारों में लगातार ऊँची कंद-उपज के लिए मूल्यवान। चूँकि यह किसान-उगाया परंपरागत प्रकार है, बीज-गुणवत्ता व रोग-स्थिति स्रोत के अनुसार बदलती — किसी अनजान खेत के बजाय एक भरोसेमंद, रोग-मुक्त गुणन-प्लॉट से रोपण-सामग्री ख़रीदें।

175–200 दिन~20 टन/हेक्टेयरऔपचारिक रूप से दर्ज नहींकई राज्यों में एक स्थानीय प्रकार के रूप में उगाईजहाँ एक परखा स्थानीय प्रकार पसंद हो वहाँ सामान्य खेती
बीज दर
लगभग 1 टन कॉर्मेल प्रति हेक्टेयर (क़रीब 400 किग्रा/एकड़), हर एक 20–35 ग्राम की स्वस्थ साइड-कॉर्मेल इस्तेमाल करते। 60×45 सेमी दूरी पर यह लगभग 37,000 पौधे/हेक्टेयर बैठता; एक क़रीबी 45×30 सेमी दूरी पर यह लगभग 74,000 पौधे/हेक्टेयर तक बढ़ता है।
प्रमाणित बीज
साइड-कॉर्मेल सिर्फ़ एक स्वस्थ मातृ फ़सल से काटें जिसने सीज़न में किसी भी समय पत्ती झुलसा, मोज़ेक चितकबरापन या कंद-सड़न न दिखाई हो। किसी ऐसे खेत से रोपण-सामग्री कभी न बचाएँ जहाँ झुलसा देखा गया, भले वह प्लॉट के दूसरे हिस्से में हो — फफूँद कॉर्मेल पर व उनके भीतर बनी रहती है। रोपाई से पहले कटे सिरों को अनुशंसित फफूँदनाशी से उपचारित करें।
दूरी
मेड़ें या कतारें 45–60 सेमी दूर, कतार में कॉर्मेल 30–45 सेमी दूर लगाई जातीं।
बीज उपचार
रोपाई से पहले कॉर्मेल, या कम से कम उनकी कटी सतहों को, एक अनुशंसित फफूँदनाशी घोल (जैसे मैंकोज़ेब-आधारित डुबकी) में डुबोएँ — यह पहले हफ़्तों में कंद-सड़न से बचाता और रोपण-सामग्री पर ख़ुद ढोए पत्ती-झुलसा इनोकुलम को घटाता है।

बुवाई गाइड

ऐसे मातृ पौधे से ली कोई कॉर्मेल कभी न लगाएँ जिसने पत्ती झुलसा के लक्षण दिखाए हों, भले उस खेत का बाक़ी हिस्सा स्वस्थ दिखे — फफूँद संक्रमित रोपण-सामग्री पर उतनी ही आसानी से यात्रा करती जितनी हवा से।

सबसे अच्छा समय
मुख्यतः एक खरीफ़ फ़सल, अधिकांश बारानी पट्टी में मानसून के साथ अप्रैल से जून लगाई जाती; सिंचाई में, देश के कुछ हिस्सों में फ़रवरी–मार्च रोपाई भी होती है। कटाई सूखे मौसम में पड़े इसे सुनिश्चित करने को रोपाई-समय अपनी किस्म की बताई अवधि से मिलाएँ।
क़तार की दूरी
45–60 सेमी
पौधे की दूरी
30–45 सेमी
बुवाई की गहराई
5–10 सेमी, कॉर्मेल की आँख-कली ऊपर की ओर
तरीक़ा
स्वस्थ कॉर्मेल नम मेड़ों या क्यारियों में (या सचमुच नीची पट्टियों में एक पडल किए खेत में) लगाएँ, हर एक के आसपास मिट्टी दबाएँ। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें, एक-समान अंकुरण में मदद को।

खाद कार्यक्रम

बुवाई के समय एक साथ पूरी खाद डालने से बँटी हुई मात्रा बेहतर है — खासकर नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा हवा में उड़ जाता है या रिसकर बह जाता है।

  1. 1

    आधारीय (रोपाई पर)

    दिन 0

    रोपाई से पहले मेड़ या क्यारी में मिलाई अच्छी सड़ी गोबर-खाद (10–12 टन/हेक्टेयर), ताकि कॉर्मेल अंकुरित होते यह उपलब्ध हो।

  2. 2

    पहली टॉप-ड्रेसिंग (अंकुरण पर)

    दिन 20–25

    पूरी फॉस्फोरस खुराक साथ आधी नाइट्रोजन व आधा पोटाश (कुल 80:25:100 किग्रा/हेक्टेयर N:P₂O₅:K₂O का), अंकुरण के तुरंत बाद पौधे के आधार के पास दिया जाता।

  3. 3

    दूसरी टॉप-ड्रेसिंग

    दिन 45–60 (मिट्टी चढ़ाई के साथ)

    बची आधी नाइट्रोजन व पोटाश, निराई व मिट्टी चढ़ाई के साथ दी जाती ताकि उर्वरक सतह पर खुला छोड़ने के बजाय ढका जाए।

सिंचाई कार्यक्रम

  1. 1. अंकुरण

    दिन 0–15

    रोपाई पर ठीक एक सिंचाई व लगभग एक हफ़्ते बाद दूसरी खेत भर एक-समान अंकुरण देती है।

  2. 2. वानस्पतिक बढ़वार व कंद-भराव

    दिन 15–150

    मिट्टी कितनी नमी रोकती है इस अनुसार हर 12–15 दिन सींचें — एक ग़ैर-नीची खेत पर सीज़न भर लगभग 9–12 सिंचाइयाँ। यहाँ स्थिर, एक-समान नमी ही असल में कंद-आकार बनाती; न लंबे समय सूखा न लंबे समय खड़ा पानी इसमें मदद करता।

  3. 3. कटाई-पूर्व सुखाव

    कटाई से आख़िरी 3–4 हफ़्ते

    सिंचाई बंद करें ताकि खुदाई से पहले मिट्टी कुछ सूखे — यह उखाड़ना साफ़ बनाता और भंडारण में कंद-सड़न का ख़तरा घटाता है।

महत्वपूर्ण अवस्थाएँ

  • अंकुरण (पहले 2–3 हफ़्ते)
  • कंद-आरंभ व भराव

पानी बचाने के तरीक़े

  • अरबी कंद फ़सलों में असामान्य है क्योंकि यह बिना सड़े खड़े पानी के छोटे दौर सह लेती, पर यह एक भारी-बारिश वर्ष के लिए एक सुरक्षा-मार्जिन है, असल में सूट करते 12–15 दिन के अंतराल से ज़्यादा भारी सींचने का कारण नहीं।
  • जो मिट्टी अच्छी नमी रोकती (दोमट व चिकनी) उन पर अंतराल सुरक्षित रूप से 15 दिन तक बढ़ सकता; बलुई मिट्टियों को उस दायरे का छोटा छोर चाहिए।
  • कटाई से 3–4 हफ़्ते पहले सिंचाई बंद करने से उपज में कुछ नहीं जाता और इसके बाद कंद कितने अच्छे टिकते यह नापने लायक़ सुधरता है।

खरपतवार प्रबंधन

जैविक नियंत्रण

  • पहले दो-तीन महीनों में दो-तीन हाथ-निराई, 30–45 व 60–75 दिन की मिट्टी चढ़ाई के साथ समयबद्ध ताकि निराई व दोबारा-मेड़बंदी साथ हो।
  • मिट्टी चढ़ाई ख़ुद आधार के आसपास छोटे खरपतवार दबा देती जबकि बनते कंद की रक्षा करती है।
  • छतरी बंद होने से पहले एक उथली अंतर-कतार गुड़ाई कतार-बीच साफ़ करती; उसके बाद घनी पत्ती-परत ज़्यादातर काम करती है।

रासायनिक नियंत्रण

  • अरबी/कोलोकेसिया-स्वीकृत एक प्री-इमरजेंस खरपतवारनाशी, रोपाई के तुरंत बाद साफ़, नम मेड़ों पर लगाया, अगेती स्थापना भर खरपतवार रोक सकता; मौजूदा उत्पाद व मात्रा अपने स्थानीय KVK से पक्की करें।
  • बंद होती पत्ती-छतरी लगभग 8–10 हफ़्ते से अधिकांश खरपतवार को छाया देती, इसलिए खरपतवारनाशी पहले दो महीनों में सबसे ज़्यादा मायने रखता है।

पोषक तत्व की कमी की पहचान

हर पोषक तत्व की कमी पौधे पर असल में कैसी दिखती है — ताकि ग़लत स्प्रे करने से पहले आप कमी और रोग में फ़र्क़ कर सकें।

ध्यान देने योग्य रोग

लक्षण, संभावित कारण और असल में क्या इलाज करता है — सिर्फ़ किसी स्प्रे का नाम नहीं।

ध्यान देने योग्य कीट

नुक़सान दिखने से पहले क्या देखें, और रसायन से पहले जैविक विकल्प क्या हैं।

आम ग़लतियाँ जिनसे बचें

जो ग़लतियाँ किसानों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती हैं, खेत में जितनी बार दिखती हैं उसी क्रम में — हमेशा वैसे नहीं जैसा आप सोचें।

  1. 1

    ऐसे खेत से कॉर्मेल बचाना या ख़रीदना जहाँ अरबी पत्ती झुलसा देखा गया, भले प्लॉट के दूसरे हिस्से में हो।

    नुक़सान क्यों होता है

    फफूँद संक्रमित कॉर्मेल पर व उनके भीतर बनी रहती है, इसलिए ख़राब रोपण-सामग्री का एक बैच सीज़न के पहले नम दौर आने से पहले ही एक पूरे नए खेत में झुलसा बो सकता है। सिर्फ़ उन मातृ पौधों से प्रवर्धन करें जो सीज़न भर साफ़ रहे।

  2. 2

    सीधी बिक्री या घरेलू इस्तेमाल को एक तेज़ कसैली किस्म उगाना, या कंद व पत्तियाँ अधपकी छोड़ना।

    नुक़सान क्यों होता है

    कसैली अरबी में कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल कंद अधपका होने पर मुँह व गले में सच में अप्रिय खुजली व जलन देते — यही सबसे बड़ी वजह है कि एक बैच बिक नहीं पाता या कोई घर एक ख़ास स्रोत से ख़रीदना बंद कर देता। जहाँ कसैलापन शिकायत रहा हो वहाँ श्री हीरा या श्री रश्मि जैसी दर्ज कम-कसैली किस्म चुनें, और हमेशा अच्छी तरह पकाएँ।

  3. 3

    यह मान लेना कि अरबी की जलभराव-सहनशीलता का मतलब जल-निकासी कभी मायने नहीं रखती।

    नुक़सान क्यों होता है

    फ़सल आलू या शकरकंद से कहीं बेहतर खड़े पानी के छोटे दौर सहती, पर ख़राब जल-निकासी वाली जेब में लंबा जलभराव फिर भी कंद-सड़न करता, ख़ासकर चोटिल रोपण-सामग्री के साथ। उगाने की प्रणाली — ऊपरी मेड़ें या एक नीचा, अर्ध-जलीय खेत — प्लॉट की असली जल-दशा से मिलाएँ।

  4. 4

    30–45 व 60–75 दिन पर मिट्टी चढ़ाई छोड़ना।

    नुक़सान क्यों होता है

    मिट्टी चढ़ाई के बिना, बनते कंद व कॉर्मेल सतह की ओर धकेलते, हरे पड़ते, स्वाद बिगड़ता व धूप-झुलसन व कीटों के प्रति ज़्यादा उजागर होते। दो मिट्टी-चढ़ाई क्रियाएँ विभाजित उर्वरक खुराक को सतह पर छोड़ने के बजाय जड़-क्षेत्र में भी ले जातीं।

  5. 5

    अरबी पत्ती झुलसा खेत भर दिखने तक छिड़काव का इंतज़ार करना।

    नुक़सान क्यों होता है

    गरम, नम मौसम में जमने के बाद रोग कुछ दिनों में छतरी झाड़ सकता है। मानसून का पहला नम दौर आते ही निगरानी शुरू करें और पहले पानी-भरे धब्बों पर कार्रवाई करें, घाव फैल जाने के बाद नहीं।

  6. 6

    कटाई, छिलका उतारने या पकाने की तैयारी में कंद व पत्तियाँ बिना सावधानी नंगे हाथ सँभालना।

    नुक़सान क्यों होता है

    अरबी में सुई-जैसे कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल नंगी त्वचा पर सच्ची, भले अस्थायी, खुजली व जलन देते, कसैली किस्मों में ज़्यादा बुरी। बड़ी मात्रा सँभालते समय, ख़ासकर साग या पत्रा को इस्तेमाल पत्तियों की, दस्ताने पहनें या हाथों में तेल लगाएँ।

कटाई

लगाई किस्म अनुसार 175–240 दिन पर खोदें, पत्तियाँ पीली पड़, सूख व काफ़ी हद तक गिर जाने पर — एक संकेत कि कंद ने भरना बंद कर दिया व पक गया। खुदाई को मिट्टी थोड़ी सूखी तरफ़ रखने को इससे 3–4 हफ़्ते पहले सिंचाई बंद करें।

तैयार होने के संकेत

  • पत्तियाँ पीली पड़ती, सूखतीं व गिरतीं
  • कंद-छिलका जम गया व हल्की खरोंच पर मुलायम नहीं रहता
  • लगाई किस्म की बताई अवधि तक पहुँचना

उपकरण

  • कंद बिना काटे उठाने को कुदाल, खुदाई-कांटा या खुरपी
  • कटे कंद इकट्ठा करने को टोकरियाँ या बोरियाँ
  • पत्ती-ठूँठ साफ़ काटने को एक तेज़ चाकू

अपेक्षित उपज

एक मानक किस्म की अच्छी-सँभाली फ़सल को लगभग 15–20 टन/हेक्टेयर, व अच्छे प्रबंधन के साथ श्री किरण जैसी ऊँची-उपज किस्म से लगभग 28 टन/हेक्टेयर तक। एक एकड़ पर यह लगभग 60–80 क्विंटल, उन्नत किस्म से ज़्यादा।

कटाई के बाद व भंडारण

  • भंडारण

    कंदों को शकरकंद जैसी कई दिनों की क्योरिंग नहीं चाहिए — अतिरिक्त मिट्टी झाड़ें व एक-दो दिन छायादार, हवादार जगह हवा में सुखाएँ, फिर एक ठंडी, सूखी, अच्छी हवादार जगह भंडारित करें। सावधानी से सँभालें, क्योंकि कटे या चोटिल कंद तेज़ी से सड़ते; स्वस्थ कंद आमतौर पर सामान्य दशा में 2–4 हफ़्ते टिकते, व उचित कोल्ड स्टोरेज में लगभग 11–13°C व 85–90% नमी पर काफ़ी लंबे (बताया जाता कई महीने), हालाँकि वह सुविधा छोटे किसानों को शायद ही मिलती है।

  • पैकेजिंग

    हवादार टोकरियों, क्रेट या बोरियों में उथली परतों में पैक करें, गहरी, कसकर भरी बोरियों के बजाय जो गर्मी व नमी रोकतीं व सड़न को बढ़ावा देतीं।

  • परिवहन

    उचित रूप से जल्दी बाज़ार भेजें व सावधानी से सँभालें — हर कट या चोट परिवहन में कंद-सड़न का द्वार है और बाद में कंद कितना टिकता यह घटाती है।

  • भंडारण अवधि

    सामान्य गाँव व बाज़ार दशा में बिना-प्रशीतन 2–4 हफ़्ते; जहाँ उपलब्ध हो उचित कोल्ड स्टोरेज में काफ़ी ज़्यादा।

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मुनाफ़ा कैलकुलेटर

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पैसा कहाँ जाता है

नीचे कैलकुलेटर की डिफ़ॉल्ट लागत के अनुसार प्रति एकड़ कुल लागत में हर मद का हिस्सा — वहाँ अपने आँकड़े बदलने पर यह तस्वीर पूरी तरह आप पर लागू नहीं रहेगी, पर क्रम शायद ही बदलता है।

  • मज़दूरी31% (₹11,000)
  • ज़मीन का किराया22% (₹8,000)
  • बीज10% (₹3,500)
  • खाद10% (₹3,500)
  • कीटनाशक और खरपतवारनाशक8% (₹3,000)
  • सिंचाई8% (₹3,000)
  • मशीन7% (₹2,500)
  • ब्याज4% (₹1,500)

आधिकारिक डाउनलोड

केवल सरकार और ICAR के दस्तावेज़ — नीचे की हर चीज़ किसी आधिकारिक सर्वर पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मेरी अरबी की पत्तियों पर भूरे-बैंगनी धब्बे तेज़ी से फैल रहे हैं। यह क्या है और मैं क्या करूँ?

यह लगभग निश्चित रूप से अरबी पत्ती झुलसा (Phytophthora colocasiae) है, विश्व भर में टैरो का सबसे नुक़सानदेह रोग — यह ठीक उसी गरम, नम मौसम में फलता-फूलता जो भारत के अधिकांश मानसून में मिलता और कुछ दिनों में खेत की पत्तियाँ झाड़ सकता है। अभी सबसे बुरी तरह प्रभावित पत्तियाँ हटाकर नष्ट करें, एक अनुशंसित कॉपर-आधारित या प्रणालीगत फफूँदनाशी छिड़कें, और अगली फ़सल को श्री हीरा या श्री पल्लवी जैसी सहनशील किस्म लगाएँ व सिर्फ़ उन मातृ पौधों से प्रवर्धन करें जिन्होंने कभी रोग न दिखाया हो।

अरबी मेरे हाथ व गला क्यों खुजलाती है?

वह खुजली, चुभने वाली अनुभूति कंद व पत्ती में मौजूद सुई-जैसे कैल्शियम-ऑक्सलेट क्रिस्टल से आती है, कुछ किस्मों में दूसरों से ज़्यादा। अच्छी तरह पकाना अधिकांश असर मिटा देता है, यही कारण है अधपकी अरबी अच्छी पकी डिश से कहीं ज़्यादा जलन देती है। उगाने व बेचने के लिए, श्री हीरा या श्री रश्मि जैसी दर्ज कम-कसैली किस्म चुनना अधिकांश शिकायतें टालता है, और कच्चे कंद या पत्तियों की बड़ी मात्रा सँभालते समय दस्ताने पहनना हाथ बचाता है।

क्या मैं ऐसी ज़मीन पर अरबी उगा सकता हूँ जो कभी-कभी डूबती है?

ज़्यादातर कंद फ़सलों से बेहतर, हाँ — अरबी सचमुच खड़े पानी के छोटे दौर सह लेती जो आलू या शकरकंद को सड़ा देते, और कुछ नीची पट्टियों में इसे लगभग एक अर्ध-जलीय फ़सल की तरह उगाया जाता। पर यह एक सहनशीलता है, ज़रूरत नहीं: फ़सल फिर भी स्थिर, एक-समान नमी में स्थायी जलभराव से बेहतर कंद बनाती, और ख़राब जल-निकासी वाली जेब में लंबा खड़ा पानी फिर भी कंद-सड़न को बढ़ावा देता है।

अरबी बिना बीज के कैसे लगाई जाती है?

यह पूरी तरह कॉर्मेल से उगाई जाती — एक स्वस्थ मातृ कंद से काटी छोटी साइड-कंद, हर एक 20–35 ग्राम — मेड़ों या क्यारियों में 5–10 सेमी गहरी लगाई जातीं। लगभग एक टन कॉर्मेल एक हेक्टेयर ढकती है। ऐसे मातृ पौधे से कॉर्मेल कभी इस्तेमाल न करें जिसने पत्ती झुलसा या मोज़ेक लक्षण दिखाए हों, क्योंकि दोनों ख़ुद रोपण-सामग्री पर यात्रा करते हैं।

कटी अरबी कितने दिन टिकती है?

स्वस्थ, बिना-नुक़सान कंद आमतौर पर घर या गाँव के भंडार में एक ठंडी, सूखी, हवादार जगह 2–4 हफ़्ते टिकते — शकरकंद जैसी कई-दिन की क्योरिंग की ज़रूरत नहीं। उचित कोल्ड स्टोरेज (लगभग 11–13°C व ऊँची नमी पर) इसे कई महीनों तक बढ़ाता है, हालाँकि वह सुविधा छोटे किसानों को शायद ही मिलती, इसलिए ज़्यादातर अरबी कटाई के कुछ हफ़्तों के भीतर बाज़ार पहुँच जाती है।

क्या अरबी का कोई MSP या मंडी भाव है?

अरबी का कोई MSP नहीं है। यह Agmarknet पर "Colacasia" कमोडिटी नाम से (मानक अपस्ट्रीम स्पेलिंग) व्यापार करती, केरल, तेलंगाना व अन्य राज्यों के बाज़ारों से नियमित दैनिक रिकॉर्ड के साथ — एक पतली या मौसमी सूची के बजाय असली, सक्रिय व्यापार।

अब भी कोई सवाल है?

आम सवालों के जवाब ऊपर FAQs में हैं। आपके खेत और मिट्टी से जुड़ी किसी भी ख़ास बात के लिए आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही आधिकारिक जवाब है।