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कॉफ़ीसभी सीज़नखुली-परागितअपडेट किया गया 13 अगस्त 2026

S.795 (Selection 795)

भारत की सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली अरेबिका, 1940 के दशक में जारी होने के बाद से — एक पुराना, आज़माया हुआ चयन, जिसका रतुआ-प्रतिरोध अब खेत में मिलने वाली उतनी रेस को कवर नहीं करता जितना पहले करता था।

सीज़नसभी सीज़न
पकने की अवधिरोपाई के 3–4 साल बाद पहली फ़सल
अपेक्षित उपज1,500–2,000 किलो साफ़ कॉफ़ी/हेक्टेयर/साल, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टीदोमट

ज़रूरी तथ्य

फसल
कॉफ़ी
प्रकार
खुली-परागित
सीज़न
सभी सीज़न
पकने की अवधि
रोपाई के 3–4 साल बाद पहली फ़सल
अपेक्षित उपज
1,500–2,000 किलो साफ़ कॉफ़ी/हेक्टेयर/साल, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टी
दोमट
जारी
1945–46 में जारी · केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान, बालेहोन्नूर (प्रजनक आर. एल. नरसिंहस्वामी)

इस किस्म के बारे में

एस.795 (सिलेक्शन 795) भारत के सबसे पुराने व सबसे व्यापक रूप से उगाए जाने वाले अरेबिका चयनों में से एक है, जिसे आर. एल. नरसिंहस्वामी ने केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान के बालेहोन्नूर स्टेशन में विकसित किया व 1945–46 में जारी किया। इसका सुझाया गया संकरण एस.288 (स्वयं एक प्राकृतिक C. arabica × C. liberica संकर, मज़बूत जड़ों व रोग-सहनशीलता के लिए मूल्यवान) × केंट (एक टिपिका-व्युत्पन्न चयन, कप गुणवत्ता व रतुआ-सहनशीलता के लिए प्रसिद्ध) है — यह जानकारी कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया के अपने आधिकारिक पृष्ठ पर पुष्ट होती है। यह आज भी भारत की सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली अरेबिका बनी हुई है, जो सुझाए गए अनुसार देश के अरेबिका क्षेत्र के 25–30% हिस्से को कवर करती है, और जारी होने के समय कॉफ़ी पत्ती रतुआ के प्रति सहनशील पाई गई पहली उगाई गई अरेबिका किस्मों में से एक थी। वर्ल्ड कॉफ़ी रिसर्च का किस्म-प्रोफ़ाइल एक उपयोगी बारीकी जोड़ता है: वैश्विक परीक्षणों में ऊँचे रतुआ-प्रतिरोध के बावजूद, एस.795 को भारत में ही संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि वहाँ स्थानीय रतुआ रेस की व्यापक रेंज मौजूद है — जो इस रिकॉर्ड के अपने "रेस I व II के प्रति प्रतिरोधी; रेस VIII के प्रति संवेदनशील" विवरण से क़रीब-क़रीब मेल खाती है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकारखुली-परागित
    अवधिरोपाई के 3–4 साल बाद पहली फ़सल
    उपज क्षमता1,500–2,000 किलो साफ़ कॉफ़ी/हेक्टेयर/साल, पूर्ण फलन पर
    रोग-प्रतिरोधपत्ती रतुआ रेस I व II के प्रति प्रतिरोधी; रेस VIII के प्रति संवेदनशील
    मिट्टीदोमट
    सीज़नसभी सीज़न

मिट्टी व जलवायु

जलवायु

जलवायु
सुझाया गया रोपण घनत्व लगभग 3,000–4,000 पौधे/हेक्टेयर एकल-तना छँटाई के साथ, वर्ल्ड कॉफ़ी रिसर्च किस्म-प्रोफ़ाइल के अनुसार; सबसे बेहतर कप-गुणवत्ता क्षमता ऊँची ऊँचाइयों पर दर्ज

उपज व अवधि

पकने की अवधि

रोपाई के 3–4 साल बाद पहली फ़सल

अपेक्षित उपज

1,500–2,000 किलो साफ़ कॉफ़ी/हेक्टेयर/साल, पूर्ण फलन पर

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • भारत की सबसे व्यापक रूप से लगाई जाने वाली अरेबिका चयन, सुझाए गए अनुसार देश के अरेबिका क्षेत्र के 25–30% हिस्से पर, 80 साल से ज़्यादा व्यावसायिक उपयोग के बाद भी
  • जारी होने के समय कॉफ़ी पत्ती रतुआ के प्रति सहनशील पाई गई पहली अरेबिका किस्मों में से एक — लंबी, ज़ोरदार वृद्धि आदत, प्रति नोड सुझाए गए 14–16 चेरी के साथ

ध्यान रखने योग्य बातें

  • वर्ल्ड कॉफ़ी रिसर्च प्रोफ़ाइल का "भारत में संवेदनशील" वाला नोट भारत की कई स्थानीय रतुआ रेस के समग्र पैटर्न को दर्शाता है, न कि इस रिकॉर्ड के अपने diseaseResistance क्षेत्र में पहले से बताए गए रेस I/II प्रतिरोध व रेस VIII संवेदनशीलता को पलटना — दोनों सुसंगत हैं, विरोधाभासी नहीं

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • कर्नाटक
  • केरल
  • तमिलनाडु

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इतनी पुरानी होने के बावजूद क्या एस.795 आज भी लगाने लायक़ है?

हाँ, नई, ज़्यादा आक्रामक रतुआ रेस से मुक्त ज़मीन पर — इसकी गुणवत्ता की प्रतिष्ठा, आज़माई हुई अनुकूलनशीलता व भारत के अरेबिका क्षेत्र के लगभग 25–30% हिस्से पर क़ब्ज़ा यही दिखाते हैं। पर इस रिकॉर्ड के अपने नोट के अनुसार, जिन किसानों के खेत में एस.795 की कवरेज (रेस I व II) से आगे की रतुआ रेस हों, उन्हें इसके बजाय कावेरी पर विचार करना चाहिए, जिसे ख़ास तौर पर इसी अंतर को पाटने के लिए बनाया गया।

रतुआ-प्रतिरोध के लिए मूल्यवान एक कॉफ़ी किस्म को अब भारत में रतुआ-संवेदनशील क्यों बताया जाता है?

क्योंकि रतुआ-प्रतिरोध रेस-विशिष्ट होता है, सार्वभौमिक नहीं। एस.795 रेस I व II का अच्छी तरह प्रतिरोध करता है, यही वजह है कि यह 1940 के दशक में इतनी महत्वपूर्ण किस्म थी, पर भारत में आज कॉफ़ी पत्ती रतुआ की कई और रेस मौजूद हैं, और एस.795 कभी इन सभी के प्रतिरोध के लिए नहीं बनाई गई — ख़ास तौर पर रेस VIII इसे पार कर जाती है। अलग-अलग रेस मिश्रण के ख़िलाफ़ वैश्विक परीक्षणों में ऊँचा प्रतिरोध होने का मतलब यह नहीं कि वही किस्म हर जगह प्रतिरोधी हो।

स्रोत: S795 coffee — Wikipedia, S795 Variety Profile — World Coffee Research, Indian Coffee Varieties: SLN-795, SLN-9, Chandragiri & Kent — Indian Coffee Beans, Coffee Regions of India — Coffee Board of India. संपादकीय नीति.