Coorg Mandarin (Kodagu)
ग्राफ़्टेड पौध, असली बीज नहीं। कोडगु ज़िले की पहाड़ी मैंडरिन — ठंडे, ज़्यादा बारिश वाले इलाक़ों के लिए उपयुक्त, जहाँ नागपुर संतरा उतना अच्छा नहीं चलता।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- संतरा
- प्रकार
- रोपण सामग्री
- सीज़न
- सभी सीज़न
- पकने की अवधि
- ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल
- अपेक्षित उपज
- 80–110 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
- उपयुक्त मिट्टी
- दोमट
- जारी
- इस बार मिले किसी भी स्रोत में कोई औपचारिक प्रजनन-रिलीज़ नहीं मिली — सदियों पुरानी कोडगु-पट्टी की देशी किस्म, जीआई-टैग प्राप्त (वर्ष पर मतभेद: कृषि जागरण के अनुसार 2004, विकिपीडिया के अनुसार 2006)।
इस किस्म के बारे में
कूर्ग मैंडरिन (Citrus reticulata), जो मुख्य रूप से कर्नाटक के कोडगु, हासन व चिकमगलूर ज़िलों में उगाई जाती है, परंपरागत रूप से कॉफ़ी बाग़ानों के भीतर छाया-सहनशील द्वितीयक फ़सल के रूप में उगाई जाती रही है — एक सीधे फ़ेच किए गए विकिपीडिया लेख और एक सीधे फ़ेच किए गए कृषि जागरण फ़ीचर, दोनों 150 साल से ज़्यादा समय से यहाँ खेती की पुष्टि करते हैं, हालाँकि इसके आगमन की सटीक तारीख़ स्पष्ट नहीं है — एक विवरण इसे लगभग 300 साल पहले मध्य भारत से जोड़ता है, तो दूसरा ब्रिटिश-राज युग, यानी लगभग 160 साल पहले से। स्रोत जीआई-टैग के वर्ष पर भी असहमत हैं — विकिपीडिया 2006 बताता है, जबकि सीधे फ़ेच किया गया कृषि जागरण फ़ीचर 2004 बताता है, जो कर्नाटक के बागवानी विभाग ने ख़ास तौर पर इस किस्म की रक्षा व पुनरुद्धार के लिए दाख़िल किया था — किसी एक को चुनने के बजाय यहाँ दोनों दर्ज हैं। फल हल्के हरे-पीले रंग का, कसे छिलके वाला, मीठे-खट्टे स्वाद वाला और नागपुर मैंडरिन (ढीले छिलके, ज़्यादा मीठा) से ज़्यादा लंबी शेल्फ़-लाइफ़ वाला होता है। खेती में भारी गिरावट आई है: 1960 के दशक के लगभग 24,000 हेक्टेयर से घटकर हाल के दशकों में 2,000 हेक्टेयर से भी कम, और प्रति पौधा उपज 50+ किलो से घटकर लगभग 10 किलो रह गई — यह जानकारी विकिपीडिया से मिलती है। कृषि जागरण फ़ीचर इस गिरावट का कारण 1980 के दशक तक फैले ग्रीनिंग/सिट्रस-डिक्लाइन रोग के प्रकोप को बताता है, साथ में तना-बेधक, फ़ाइटोफ़्थोरा पत्ती-झड़न, चूर्णिल आसिता, जड़ सड़न, ख़राब गुणवत्ता की रोपण सामग्री और कॉफ़ी-अंतरफ़सल में मिट्टी की गुड़ाई से उथली जड़ों को होने वाले नुक़सान को भी जोड़ता है; गोणिकोप्पल स्थित साइट्रस डाईबैक रोग स्टेशन और चेत्तल्ली स्थित क्षेत्रीय फल अनुसंधान स्टेशन (अब भाकृअनुप-आईआईएचआर का केंद्रीय बागवानी प्रायोगिक स्टेशन) चार दशकों से इस गिरावट पर शोध कर रहे हैं, और राष्ट्रीय बागवानी मिशन समर्थित पुनरुद्धार प्रयास जारी हैं।
मुख्य विशेषताएँ
उपज व अवधि
पकने की अवधि
ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल
अपेक्षित उपज
80–110 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- नागपुर मैंडरिन की तुलना में स्पष्ट रूप से कसा छिलका और लंबी शेल्फ़-लाइफ़ — दोनों किस्मों की एक सीधे फ़ेच की गई विकिपीडिया तुलना के अनुसार।
- कोडगु के कॉफ़ी बाग़ानों के लिए लंबे समय से स्थापित, छाया-सहनशील फ़िट — 150 साल से ज़्यादा समय से कॉफ़ी के साथ उगाई जाती है, अलग बाग़ की ज़रूरत नहीं।
ध्यान रखने योग्य बातें
- इस किस्म की अपनी गिरावट गंभीर व अच्छी तरह दस्तावेज़ीकृत है — 1960 के दशक के लगभग 24,000 हेक्टेयर से हाल में 2,000 हेक्टेयर से भी कम, और प्रति पौधा उपज 50+ किलो से घटकर लगभग 10 किलो — आज कूर्ग मैंडरिन अपनाने वाला किसान एक स्थिर, मुख्यधारा फ़सल नहीं बल्कि सक्रिय रूप से पुनर्जीवित की जा रही फ़सल अपना रहा है।
- यह गिरावट कई कारणों से है, कोई एक आसानी से ठीक होने वाली समस्या नहीं — एक सीधे फ़ेच किए गए कृषि जागरण फ़ीचर में ग्रीनिंग/सिट्रस-डिक्लाइन रोग, तना-बेधक, फ़ाइटोफ़्थोरा पत्ती-झड़न, चूर्णिल आसिता व जड़ सड़न सभी को योगदान करने वाले कारकों के रूप में गिनाया गया है।
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- कर्नाटक
- केरल
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कूर्ग मैंडरिन की खेती इतनी क्यों सिकुड़ गई है?
1980 के दशक से चले आ रहे कई मिलेजुले कारण — ग्रीनिंग/सिट्रस-डिक्लाइन रोग, तना-बेधक, फ़ाइटोफ़्थोरा पत्ती-झड़न, चूर्णिल आसिता, जड़ सड़न, ख़राब गुणवत्ता की रोपण सामग्री और कॉफ़ी-अंतरफ़सल में मिट्टी की गुड़ाई से उथली जड़ों को नुक़सान — ने खेती को 1960 के दशक के लगभग 24,000 हेक्टेयर से घटाकर हाल के दशकों में 2,000 हेक्टेयर से भी कम कर दिया, एक सीधे फ़ेच किए गए कृषि जागरण फ़ीचर और विकिपीडिया के अनुसार।
कूर्ग मैंडरिन नागपुर मैंडरिन से कैसे अलग है?
कूर्ग मैंडरिन का छिलका कसा व हल्का हरा-पीला होता है, स्वाद मीठा-खट्टा और शेल्फ़-लाइफ़ लंबी होती है; नागपुर मैंडरिन का छिलका ढीला और स्वाद ज़्यादा मीठा होता है। कूर्ग कोडगु की ठंडी, गीली पहाड़ी जलवायु के लिए उपयुक्त है, जहाँ नागपुर मैंडरिन उतना अच्छा नहीं चलता — इस रिकॉर्ड का अपना नोट पहले से यही बात कहता है।
स्रोत: Coorg orange — Wikipedia, Coorg Orange; the pride of Kodagu — Krishi Jagran. संपादकीय नीति.
