RT 351
कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के अंतर्गत मांडोर स्थित एआईसीआरपी तिल केंद्र से जारी — गेहूँ और अगली रबी बुवाई के बीच के छोटे, सूखे खरीफ़ मौसम के लिए बनाई गई।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- तिल
- प्रकार
- खुली-परागित
- सीज़न
- खरीफ़
- पकने की अवधि
- 80–85 दिन
- अपेक्षित उपज
- 5–7 क्विंटल/हेक्टेयर
- उपयुक्त मिट्टी
- बलुई / हल्की मिट्टी
- जारी
- 25 मार्च 2011 (एस.ओ. 632(ई)) को राष्ट्रीय क्षेत्र-I — राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, साथ ही महाराष्ट्र/कर्नाटक के सटे इलाक़ों — के लिए अधिसूचित; एआईसीआरपी तिल, मांडोर केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा विकसित
इस किस्म के बारे में
आरटी 351 को एनआईसी-8409 व आरटी-127 के बीच क्रॉस से वंशावली (पेडिग्री) विधि द्वारा तिल पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) के तहत मांडोर अनुसंधान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर में विकसित किया गया। इसे 25 मार्च 2011 को अधिसूचना एस.ओ. 632(ई) के ज़रिए राष्ट्रीय क्षेत्र-I — राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गर्म, शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र, साथ ही महाराष्ट्र व कर्नाटक के सटे इलाक़ों — के लिए व्यावसायिक खेती हेतु अधिसूचित किया गया। इसकी पहचान बहु-कैप्सूल संरचना है — प्रत्येक पत्ती-कक्ष में कई बीज-कैप्सूल — जो मांडोर केंद्र की पहले की एकल/एकांतर-कैप्सूल किस्मों आरटी 46 (1990), आरटी 127 (1999) व आरटी 346 से एक क़दम आगे है, और यही वजह है कि राजस्थान के छोटे खरीफ़ मौसम में काम करने वाले किसानों में यह तेज़ी से लोकप्रिय हुई।
मुख्य विशेषताएँ
उपज व अवधि
पकने की अवधि
80–85 दिन
अपेक्षित उपज
5–7 क्विंटल/हेक्टेयर
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
मुख्य रोग
- कई स्वतंत्र रूप से एक-दूसरे की पुष्टि करने वाले वेब स्रोतों के अनुसार (इस चरण में कोई सीधे फ़ेच किया गया प्राथमिक स्रोत नहीं) इसमें मैक्रोफ़ोमिना (चारकोल रॉट), पत्ती मरोड़ व फ़िलोडी के प्रति प्रतिरोध, तथा सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बा व कैप्सूल बेधक के प्रति मध्यम प्रतिरोध बताया गया है — जो इस रिकॉर्ड की मौजूदा "फ़िलोडी की मध्यम सहनशीलता" वाली व्याख्या से व्यापक है
- सीधे फ़ेच किया गया एक कृषि विज्ञान केंद्र अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन अध्ययन (2016–2020, राजस्थान के 26 ज़िले) दर्ज करता है कि किसान इसकी ज़्यादा कैप्सूल संख्या के साथ-साथ तना व जड़ सड़न के प्रति प्रतिरोध को ख़ास तौर पर महत्व देते हैं
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- बहु-कैप्सूल संरचना (आरटी 127 जैसी पहले की मांडोर किस्मों के 1–2 के बजाय हर पत्ती-कक्ष में कई कैप्सूल) प्रति पौधा ज़्यादा बीज-स्थल देती है
- राजस्थान के 26 ज़िलों में हुए क्लस्टर अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (2016–2020) में किसानों की मौजूदा पद्धति के मुक़ाबले 36.17% उपज-बढ़त दर्ज हुई, और मात्र 1.35 क्विंटल/हेक्टेयर का विस्तार अंतराल — यानी बेहतर बीज उपलब्धता भर से ही ज़्यादातर संभावित उपज हासिल हो सकती है
ध्यान रखने योग्य बातें
- कई स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार राष्ट्रीय परीक्षण उपज (700–800 किलोग्राम/हेक्टेयर) इस रिकॉर्ड के मौजूदा 5–7 क्विंटल/हेक्टेयर फ़ील्ड से थोड़ी ज़्यादा है — यहाँ इसे एक को चुनने के बजाय एक सीमा के रूप में बताया गया है।
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- राजस्थान
- मध्य प्रदेश
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आरटी 351 को आरटी 127 जैसी राजस्थान की पुरानी तिल किस्मों से अलग क्या बनाता है?
इसका बहु-कैप्सूल गुण — आरटी 46, आरटी 127 व आरटी 346 की एकल/एकांतर व्यवस्था के बजाय हर पत्ती-कक्ष में कई बीज-कैप्सूल — जो उसी छोटी अवधि के पौधे पर ज़्यादा बीज-स्थल जमा कर देता है।
स्रोत: Yield Gaps and Scaling Up of Sesame Variety (RT-351) in Potential Areas of Rajasthan — Indian Journal of Extension Education. संपादकीय नीति.
