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सोयाबीनखरीफ़खुली-परागितअपडेट किया गया 12 अगस्त 2026

JS 335

वह किस्म जिसने मध्य प्रदेश को भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन राज्य बनाया — जारी होने के दशकों बाद भी सबसे ज़्यादा बोई जाने वाली किस्म।

सीज़नखरीफ़
पकने की अवधि95–100 दिन
अपेक्षित उपज15–18 क्विंटल/हेक्टेयर
उपयुक्त मिट्टीचिकनी / काली मिट्टी

ज़रूरी तथ्य

फसल
सोयाबीन
प्रकार
खुली-परागित
सीज़न
खरीफ़
पकने की अवधि
95–100 दिन
अपेक्षित उपज
15–18 क्विंटल/हेक्टेयर
उपयुक्त मिट्टी
चिकनी / काली मिट्टी
जारी
जेएनकेवीवी, जबलपुर में जेएस 78-77 × जेएस 71-05 के संकरण से विकसित

इस किस्म के बारे में

जेएस 335 जेएनकेवीवी, जबलपुर में जेएस 78-77 × जेएस 71-05 के संकरण से विकसित एक अगेती, अधिक उपज देने वाली सोयाबीन किस्म है। इसमें पौधे के गिरने (लॉजिंग) व फली चटकने के प्रति दर्ज प्रतिरोध है, जिससे देर से कटाई होने पर भी यह कई पुरानी किस्मों से बेहतर खड़ी रहती है — यही एक वजह है कि इसने मध्य प्रदेश को भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन राज्य बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, और जारी होने के दशकों बाद भी यह व्यापक रूप से बोई जाती है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकारखुली-परागित
    अवधि95–100 दिन
    उपज क्षमता15–18 क्विंटल/हेक्टेयर
    रोग-प्रतिरोधमध्यम — पीला मोज़ेक विषाणु
    मिट्टीचिकनी / काली मिट्टी
    सीज़नखरीफ़

उपज व अवधि

पकने की अवधि

95–100 दिन

अपेक्षित उपज

15–18 क्विंटल/हेक्टेयर

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • पौधे के गिरने व फली चटकने के प्रति अंतर्निहित प्रतिरोध, इसलिए बारिश से देर हुई कटाई में शटर-प्रवण किस्म जितना उपज नुक़सान नहीं होता
  • वह किस्म जो मध्य प्रदेश को भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन राज्य बनाने में सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार रही — जारी होने के दशकों बाद भी किसानों के बीच सबसे जाना-पहचाना नाम

ध्यान रखने योग्य बातें

  • छोटी अवधि की किस्मों से ज़्यादा सिंचाई चाहिए, फूल आने व फली भरने के समय नमी की कमी सबसे ज़्यादा उपज नुक़सान करती है
  • उन खेतों के लिए उपयुक्त जहाँ बरसात की नमी मौसम भर टिकी रहती है — जलभराव वाली ज़मीन के लिए उपयुक्त नहीं
  • स्रोत के अनुसार बताई गई उपज अलग-अलग है: सामान्य सीमा 15–18 क्विंटल/हेक्टेयर है, जबकि कुछ बीज-व्यापार पेज अच्छे प्रबंधन में 25–30 क्विंटल/हेक्टेयर बताते हैं — ऊँचे आँकड़े को सर्वोत्तम स्थिति मानें, गारंटी नहीं

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • मध्य प्रदेश
  • महाराष्ट्र
  • राजस्थान

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जेएस 335 जारी होने के दशकों बाद भी क्यों उगाई जाती है?

पौधे के गिरने व फली चटकने के प्रति इसका प्रतिरोध मतलब है कि देर से या बारिश में हुई कटाई में शटर-प्रवण किस्मों जितना उपज नुक़सान नहीं होता, और मध्य प्रदेश में इसका लंबा रिकॉर्ड इसे किसानों का भरोसेमंद नाम बनाए रखता है, भले ही नई जेएस किस्में आ चुकी हों।

जेएस 335 का बीज कैसा दिखता है, ताकि सही किस्म की जाँच हो सके?

बैंगनी फूल व पीला बीज, तेल की मात्रा लगभग 17–19% व प्रोटीन लगभग 40–41% — बीज-व्यापार किस्म विवरण के अनुसार — यह एक मोटा तरीक़ा है यह जाँचने का कि बेचा जा रहा बीज असल में जेएस 335 है या नहीं।

स्रोत: Molecular characterization and genetic diversity studies of Indian soybean cultivars using SSR markers — PMC, सोयाबीन की किस्म JS 335 — Kisaanhelpline. संपादकीय नीति.