Co 86032 (Nayana)
भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर से जारी — दक्षिणी पट्टी में मानक उच्च-उपज किस्म, पहली कटाई जितनी ही अच्छी पेड़ी के लिए भी पसंद की जाती है।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- गन्ना
- प्रकार
- रोपण सामग्री
- सीज़न
- सभी सीज़न
- पकने की अवधि
- कटाई तक 11–14 महीने
- अपेक्षित उपज
- 1,000–1,200 क्विंटल/हेक्टेयर
- उपयुक्त मिट्टी
- चिकनी / काली मिट्टी
- जारी
- 2000 में जारी (1994 में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए पहचानी गई) · आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर · क्रॉस Co 62198 × CoC 671, प्रायद्वीपीय/उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए
इस किस्म के बारे में
को 86032 (जिसे नयना नाम से भी बेचा जाता है) आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर में क्रॉस Co 62198 × CoC 671 से विकसित की गई। इसे 1994 में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए पहचाना गया, 1996 से व्यावसायिक रूप से फैलनी शुरू हुई, और 2000 में औपचारिक रूप से जारी होने के लिए अधिसूचित की गई। यह संस्थान की सबसे जानी-पहचानी किस्मों में से एक बन गई — कुछ अनुमानों के अनुसार आज यह उष्णकटिबंधीय प्रायद्वीपीय भारत में दस लाख हेक्टेयर से ज़्यादा क्षेत्र में लगाई जाती है, और इसे लाल सड़न के विरुद्ध आधिकारिक तौर पर "मध्यम प्रतिरोधी" (MR) रेटिंग मिली है। व्यवहार में इसका खेत-प्रदर्शन इस औपचारिक रेटिंग से काफ़ी आगे रहा है: कई रिपोर्टें बताती हैं कि को 86032 के खेत लगभग 25 सालों की खेती में भी लाल सड़न से काफ़ी हद तक मुक्त रहे हैं, जिसका श्रेय एक नोडल-प्रतिरोध तंत्र को दिया जाता है — यहाँ तक कि उन मौसमों में भी जब पड़ोसी संवेदनशील किस्मों में 60–80% संक्रमण देखा गया। इसे एक असाधारण पेड़ी किस्म के रूप में भी जाना जाता है — कुछ किसानों ने एक ही रोपण से 18 या ज़्यादा पेड़ी फ़सलें लेने की सूचना दी है — और यह उत्तर भारत की ज़्यादातर किस्मों से बेहतर सूखा सहनशीलता के लिए भी जानी जाती है। इस चरण में यह जानकारी किसी सीधे फ़ेच किए गए प्राथमिक स्रोत पर आधारित नहीं है: संस्थान की अपनी वेबसाइट (sugarcane.icar.gov.in) पहुँच से बाहर थी और इस विशेष किस्म के लिए आईसीएआर के agrinnovateindia.com लाइसेंसिंग पेज ने 404 त्रुटि दी — यह इस पूरे रोलआउट में देखे गए आईसीएआर-डोमेन पैटर्न के अनुरूप है, इसलिए यहाँ हर आँकड़ा किसी फ़ेच किए गए आधिकारिक दस्तावेज़ की बजाय वेबसर्च-पुष्ट व्यापार व शोध सारांशों से आया है।
मुख्य विशेषताएँ
उपज व अवधि
पकने की अवधि
कटाई तक 11–14 महीने
अपेक्षित उपज
1,000–1,200 क्विंटल/हेक्टेयर
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- लाल सड़न के विरुद्ध उल्लेखनीय रूप से टिकाऊ खेत-प्रदर्शन — क़रीब 25 सालों की रिपोर्टें इसे नोडल-प्रतिरोध के ज़रिए काफ़ी हद तक रोग-मुक्त बताती हैं, जो इसकी आधिकारिक "मध्यम प्रतिरोधी" रेटिंग से काफ़ी आगे है
- असाधारण पेड़ी क्षमता — कुछ किसान एक ही रोपण से 18+ पेड़ी फ़सलों की सूचना देते हैं, जो दोबारा रोपाई की लागत में असली बचत है
- उपज के साथ-साथ बताई गई सूखा सहनशीलता, प्रायद्वीपीय पट्टी के कम-सुनिश्चित-सिंचाई वाले इलाक़ों में उपयोगी
ध्यान रखने योग्य बातें
- इस रिकॉर्ड का diseaseResistance फ़ील्ड "कंडुआ की मध्यम सहनशीलता" का भी श्रेय देता है — इस चरण में किसी भी स्रोत ने को 86032 के लिए विशेष रूप से कंडुआ का ज़िक्र नहीं किया, इसलिए यह दावा यहाँ न तो पुष्ट है, न ही खंडित — बस इस चरण में अपुष्ट है
- इस ब्लॉक का हर तथ्य किसी सीधे फ़ेच किए गए प्राथमिक स्रोत की बजाय वेबसर्च-पुष्ट सारांशों पर आधारित है — गन्ना प्रजनन संस्थान की अपनी वेबसाइट व इसका आईसीएआर लाइसेंसिंग पेज दोनों इस चरण में पहुँच से बाहर थे, इसलिए इस रिकॉर्ड में कोई `sources` सूची नहीं है
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
- तेलंगाना
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
को 86032 इतने लंबे समय तक लाल सड़न से अपेक्षाकृत मुक्त क्यों रही है?
इसे आधिकारिक तौर पर केवल "मध्यम प्रतिरोधी" लाल सड़न रेटिंग मिली है, पर क़रीब 25 सालों की कई खेत रिपोर्टें बताती हैं कि यह शोधकर्ताओं द्वारा नोडल-प्रतिरोध कहे जाने वाले तंत्र के ज़रिए काफ़ी हद तक रोग-मुक्त रही है — यहाँ तक कि उन मौसमों में भी जब पड़ोसी संवेदनशील किस्मों में 60–80% संक्रमण देखा गया — यानी असली प्रदर्शन इसकी औपचारिक रेटिंग से काफ़ी आगे।
को 86032 से कितनी पेड़ी फ़सलें ली जा सकती हैं?
यह पेड़ी किस्म के रूप में मज़बूत प्रतिष्ठा रखती है — कुछ किसानों ने एक ही रोपण से 18 या ज़्यादा पेड़ी फ़सलें लेने की सूचना दी है, जिससे टुकड़ों से दोबारा रोपाई की ज़रूरत कम पड़ती है।
