Swarna (MTU 7029)
पूर्वी भारत की निचली भूमि के लिए एक व्यापक रूप से उगाई जाने वाली लंबी अवधि की धान किस्म, जो स्थिर उपज व नाइट्रोजन के प्रति कम प्रतिक्रिया के लिए जानी जाती है।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- धान
- प्रकार
- इनब्रेड (शुद्ध वंशक्रम) धान किस्म
- सीज़न
- खरीफ़
- पकने की अवधि
- 145–150 दिन
- बीज दर
- रोपाई वाली नर्सरी के लिए लगभग 30–35 किलो/हेक्टेयर — पूर्वी पट्टी में रोपाई वाले धान के लिए सामान्य तरीक़ा, इस किस्म के लिए अलग से तय नहीं
- अपेक्षित उपज
- 45–55 क्विंटल/हेक्टेयर, बारानी निचली भूमि में
- उपयुक्त मिट्टी
- निचली भूमि की मिट्टी, चिकनी मिट्टी सहित
- जारी
- 1982 में जारी · आंध्र प्रदेश धान अनुसंधान केंद्र, मारुतेरु
इस किस्म के बारे में
स्वर्णा को आंध्र प्रदेश धान अनुसंधान केंद्र (APRRS), मारुतेरु — जो आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय का हिस्सा है — ने विकसित किया और 1982 में MTU 7029 के नाम से जारी किया गया। यह पूर्वी भारत में सबसे ज़्यादा उगाई जाने वाली धान किस्मों में से एक बन गई — कम पानी वाले साल में भी स्थिर उपज, नाइट्रोजन के प्रति कम प्रतिक्रिया, और जीवाणु पत्ती झुलसा के प्रति सहनशीलता के लिए, जो उस दौर की कई किस्मों में नहीं थी। इन्हीं गुणों ने इसे पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा व असम की बारानी निचली भूमि के धान के लिए मूल विकल्प बनाया, और यह आज भी पूर्वी पट्टी की कई नई किस्मों की एक जनक वंशरेखा है।
मुख्य विशेषताएँ
बुवाई व खेती
- बीज दररोपाई वाली नर्सरी के लिए लगभग 30–35 किलो/हेक्टेयर — पूर्वी पट्टी में रोपाई वाले धान के लिए सामान्य तरीक़ा, इस किस्म के लिए अलग से तय नहीं
- दूरीरोपी गई पौध के बीच लगभग 20 सेमी × 15 सेमी दूरी, 20–25 दिन पुरानी पौध के साथ — पूर्वी पट्टी की मानक रोपाई दूरी, इस किस्म के लिए अलग से तय नहीं
- बुवाई विधिनर्सरी में तैयार कर रोपाई की जाती है — सीधी बुवाई नहीं
उपज व अवधि
पकने की अवधि
145–150 दिन
अपेक्षित उपज
45–55 क्विंटल/हेक्टेयर, बारानी निचली भूमि में
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
मुख्य रोग
प्रबंधन सुझाव
- इसकी नाइट्रोजन के प्रति कम प्रतिक्रिया का मतलब है कि अतिरिक्त नाइट्रोजन डालने से उपज में उतना अनुपातिक लाभ नहीं मिलता — स्थानीय उत्पादन प्रणाली के लिए सुझाई गई नाइट्रोजन खुराक पर टिके रहें
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- कम पानी वाले ख़राब साल में भी स्थिर उपज — यही वजह है कि यह पूर्वी पट्टी की बारानी निचली भूमि के धान का मूल विकल्प बनी
- जीवाणु पत्ती झुलसा के प्रति सहनशील — अपने दौर की कई किस्मों में यह ताक़त नहीं थी
- पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम व आंध्र प्रदेश में चार दशक का खेत-अनुभव — इसका व्यवहार अच्छी तरह समझा जा चुका है
ध्यान रखने योग्य बातें
- पुरानी किस्म (1982) — अच्छे प्रबंधन में पूर्वी पट्टी की नई किस्में ज़्यादा उपज-सीमा देती हैं
- शीथ ब्लाइट के प्रति संवेदनशील — जीवाणु पत्ती झुलसा की सहनशीलता के उलट, इस पर खेत में नज़र रखनी ज़रूरी है
- नाइट्रोजन के प्रति कम प्रतिक्रिया की वजह से अतिरिक्त उर्वरक से उपज बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है — यह एक स्थिर किस्म है, ज़्यादा-इनपुट वाली नहीं
- बारानी निचली भूमि के लिए सबसे उपयुक्त; पूरी तरह सिंचित, ज़्यादा-इनपुट प्रणाली में इसकी ताक़त उतनी नहीं
उपयुक्त क्षेत्र
स्वर्णा पूर्वी और आसपास के धान-उत्पादक क्षेत्रों में व्यापक रूप से उगाई जाती है। इसे चुनने से पहले वर्तमान राज्य व कृषि-जलवायु सिफ़ारिशें ज़रूर देखें। नीचे दिए राज्य मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं, कोई संपूर्ण आधिकारिक सूची नहीं।
- पश्चिम बंगाल
- बिहार
- ओडिशा
- असम
- उत्तर प्रदेश
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्वर्णा (MTU 7029) धान क्या है?
आंध्र प्रदेश धान अनुसंधान केंद्र, मारुतेरु में विकसित एक धान किस्म, जो 1982 में जारी हुई — पूर्वी पट्टी में स्थिर उपज व जीवाणु पत्ती झुलसा सहनशीलता के लिए जानी जाती है।
स्वर्णा की बीज दर व दूरी क्या है?
नर्सरी के लिए लगभग 30–35 किलो/हेक्टेयर, 20–25 दिन पुरानी पौध को लगभग 20 सेमी × 15 सेमी दूरी पर रोपा जाता है।
क्या स्वर्णा जीवाणु पत्ती झुलसा के प्रति प्रतिरोधी है?
यह जीवाणु पत्ती झुलसा के प्रति सहनशील है — यही एक गुण था जिसने इसे पूर्वी धान पट्टी का मूल विकल्प बनाया।
स्वर्णा की उपज क्षमता क्या है?
बारानी निचली भूमि में लगभग 45–55 क्विंटल/हेक्टेयर — शानदार नहीं बल्कि स्थिर, और यही इसकी मुख्य ख़ासियत है।
स्वर्णा के लिए कौन-से क्षेत्र उपयुक्त हैं?
पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम व उत्तर प्रदेश — पूर्वी भारत की बारानी निचली भूमि की धान पट्टी।
