Dwarf Cavendish (Basrai)
छोटी, हवा-सहिष्णु कैवेंडिश, G-9 से पहले पश्चिम भारत में लंबे समय से उगाई। अभी इसके लिए अलग से शोध कर विस्तृत पेज नहीं बनाया गया है।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- केला
- प्रकार
- रोपण सामग्री
- सीज़न
- सभी सीज़न
- पकने की अवधि
- 12–14 महीने
- अपेक्षित उपज
- अधिक
- उपयुक्त मिट्टी
- दोमट
- जारी
- एक परंपरागत AAA-जीनोम कैवेंडिश चयन किस्म, जो महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार व पश्चिम बंगाल में लंबे समय से स्थापित है (बासराई महाराष्ट्र में इसका व्यापारिक नाम है) — कोई आईसीएआर-विकसित किस्म नहीं; पिल्लों या टिश्यू कल्चर से प्रचारित, असली बीज से नहीं
इस किस्म के बारे में
ड्वार्फ़ कैवेंडिश — भारत में व्यावसायिक रूप से बासराई नाम से बेची जाती है, जो महाराष्ट्र में इसका प्रमुख व्यापारिक नाम है — एक AAA-जीनोम मिठाई केला है और देश में सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली व्यावसायिक केला किस्म है, यह एक सीधे फ़ेच किए गए TNAU (तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय) केला किस्म प्रोफ़ाइल व एक सीधे फ़ेच किए गए global-agriculture.com किस्म पन्ने से पुष्ट होता है। दोनों स्रोत एक छोटे, हवा-सहिष्णु पौधे का वर्णन करते हैं जो महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार व पश्चिम बंगाल में व्यापक रूप से उगाया जाता है, साथ ही तमिलनाडु, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश में भी — एक राज्य से कहीं व्यापक फैलाव। TNAU लगभग 20–25 किलो के गुच्छे को लगभग 12 घौद व 150+ फलों के साथ दर्ज करता है; global-agriculture.com कुछ कम 15–25 किलो को 6–7 घौद व प्रति घौद लगभग 13 फलों के साथ बताता है — दोनों इतनी व्यापक रूप से, अलग-अलग प्रबंधन स्तरों पर उगाई जाने वाली किस्म के लिए संभावित दायरे हैं। फलों का छिलका मोटा रहता है जो पकने पर भी आंशिक रूप से हरापन बनाए रखता है, और दोनों स्रोत कटाई-बाद की टिकाऊपन को अपेक्षाकृत कमज़ोर बताते हैं। दोनों स्रोत यह भी सहमत हैं कि यह किस्म नम स्थितियों में सिगाटोका पर्ण-चित्ती के प्रति वास्तव में — केवल मध्यम रूप से नहीं — संवेदनशील है: TNAU इसे "अत्यधिक संवेदनशील" कहता है और global-agriculture.com बिल्कुल वही शब्द इस्तेमाल करता है। गांडेवी की एक संबंधित, अधिक उपज देने वाली गुजराती चयन किस्म, जिसे हनुमान या पडारे कहा जाता है, काफ़ी भारी 55–60 किलो के गुच्छे देती है, पर उस आकार तक पहुँचने में अधिक समय लेती है।
मुख्य विशेषताएँ
उपज व अवधि
पकने की अवधि
12–14 महीने
अपेक्षित उपज
अधिक
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- छोटा, हवा-सहिष्णु पौधे का रूप ऊँची केला किस्मों की तुलना में तूफ़ान/हवा से गिरने के नुक़सान को कम करता है
- ड्रिप सिंचाई के साथ सघन रोपण इस किस्म को अत्यधिक उत्पादक बनाता है, ऐसा बताया गया है
- भारत में सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली व्यावसायिक केला किस्म, इसलिए रोपण सामग्री, कृषि-ज्ञान व बाज़ार अवसंरचना — तीनों अच्छी तरह स्थापित हैं
- एक संबंधित गुजराती चयन किस्म (हनुमान/पडारे) उन उत्पादकों के लिए कहीं भारी-गुच्छे वाला विकल्प (55–60 किलो) देती है जो लंबे फ़सल-चक्र को स्वीकार करने को तैयार हों
ध्यान रखने योग्य बातें
- 2026-08-15 को सुधारा गया: diseaseResistance पहले 'मध्यम' बताता था। दोनों सीधे फ़ेच किए गए स्रोत (TNAU, global-agriculture.com) स्वतंत्र रूप से इसे नम स्थितियों में सिगाटोका पर्ण-चित्ती के प्रति 'अत्यधिक संवेदनशील' बताते हैं, इसलिए फ़ील्ड अब 'सिगाटोका पर्ण-चित्ती के प्रति अत्यधिक संवेदनशील' है।
- 2026-08-15 को सुधारा गया: states पहले केवल गुजरात बताता था। दोनों स्रोत महाराष्ट्र को इस किस्म का प्रमुख उत्पादक राज्य बताते हैं, साथ ही गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश भी; फ़ील्ड अब महाराष्ट्र को पहले रखते हुए सभी सात राज्य सूचीबद्ध करता है।
- गुच्छे के आकार के आँकड़े स्रोत के अनुसार थोड़े बदलते हैं: TNAU ~20–25 किलो / 12 घौद / 150+ फल बताता है, global-agriculture.com कुछ कम ~15–25 किलो / 6–7 घौद / ~13 फल प्रति घौद बताता है — इतनी व्यापक रूप से, अलग-अलग क्षेत्रों व प्रबंधन स्तरों पर उगाई जाने वाली किस्म के लिए दोनों संभावित दायरे हैं, विरोधाभास नहीं बल्कि क्षेत्रीय भिन्नता।
- टिकाऊपन दोनों स्रोतों द्वारा कमज़ोर बताई गई है — उन किसानों के लिए प्रासंगिक जो लंबी दूरी के परिवहन वाले बाज़ार के लिए इसकी तुलना रोबस्टा या ग्रैंड नैन जैसे हाइब्रिड से कर रहे हों।
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- महाराष्ट्र
- गुजरात
- बिहार
- पश्चिम बंगाल
- तमिलनाडु
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या बासराई और ड्वार्फ़ कैवेंडिश एक ही किस्म हैं?
हाँ — बासराई केवल वह व्यापारिक नाम है जिससे ड्वार्फ़ कैवेंडिश (AAA) महाराष्ट्र में बेची जाती है, जहाँ यह प्रमुख व्यावसायिक केला किस्म है।
क्या ड्वार्फ़ कैवेंडिश सिगाटोका पर्ण-चित्ती के प्रति प्रतिरोधी है?
नहीं — दो स्वतंत्र रूप से फ़ेच किए गए स्रोत (TNAU व एक global-agriculture.com किस्म प्रोफ़ाइल) दोनों इसे नम स्थितियों में सिगाटोका के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बताते हैं, जो इस रिकॉर्ड के diseaseResistance फ़ील्ड से मेल खाता है।
सबसे अधिक ड्वार्फ़ कैवेंडिश (बासराई) कौन-सा राज्य उगाता है?
महाराष्ट्र, जहाँ यह प्रमुख व्यावसायिक किस्म है और फ़सल को इसका बासराई नाम देता है — इसके बाद गुजरात, बिहार व पश्चिम बंगाल, साथ ही तमिलनाडु, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश में भी खेती होती है।
क्या ड्वार्फ़ कैवेंडिश कटाई के बाद अच्छी तरह टिकती है?
ख़ास तौर पर नहीं — जाँचे गए दोनों स्रोत इसकी कटाई-बाद की टिकाऊपन को अपेक्षाकृत कमज़ोर बताते हैं, जिसे लंबी दूरी के बाज़ारों के लिए योजना बनाते समय ध्यान में रखना चाहिए।
क्या बासराई का कोई अधिक उपज देने वाला संस्करण है?
हाँ — गांडेवी की एक गुजराती चयन किस्म, जिसे हनुमान या पडारे कहा जाता है, बासराई के सामान्य 15–25 किलो की तुलना में कहीं भारी गुच्छे (55–60 किलो) देती है, पर उस आकार तक पहुँचने में अधिक समय लेती है।
स्रोत: Banana Variety Dwarf Cavendish (AAA) — Global Agriculture, Season & Varieties — Banana Expert System, TNAU Agritech Portal. संपादकीय नीति.
