Byadgi
कर्नाटक की जीआई-टैग वाली स्थानीय किस्म, तीखेपन की जगह गहरे लाल रंग व हल्की तीखास के लिए उगाई जाती है — ओलियोरेज़िन व मसाला-मिश्रण व्यापार इसके लिए वह प्रीमियम देता है जो सिर्फ़ तीखापन नहीं दिला सकता।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- मिर्च
- प्रकार
- खुली-परागित
- सीज़न
- खरीफ़
- पकने की अवधि
- 170–180 दिन
- अपेक्षित उपज
- 8–15 क्विंटल/हेक्टेयर (सूखी मिर्च)
- उपयुक्त मिट्टी
- दोमट
- जारी
- आईसीएआर के अर्थ में कोई एक विकसित/जारी की गई किस्म नहीं — लंबे समय से उगाई जा रही कर्नाटक की स्थानीय किस्म, जिसे फ़रवरी 2011 में भौगोलिक संकेत टैग नंबर 129 दिया गया
इस किस्म के बारे में
बयाडगी (बयाडागी भी लिखा जाता है) कर्नाटक की एक जीआई-टैग वाली मिर्च किस्म है, जिसका नाम हावेरी ज़िले के बयाडगी क़स्बे पर पड़ा है, यह उस ज़िले के साथ-साथ पड़ोसी धारवाड़ व गोवा के कुछ हिस्सों में भी उगाई जाती है — एक सीधे फ़ेच किए गए विकिपीडिया लेख से पुष्टि होती है कि इसे फ़रवरी 2011 में भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग नंबर 129 मिला। यह कैप्सिकम एन्नुअम प्रजाति की किस्म है जिसे तीखेपन से कहीं ज़्यादा गहरे लाल रंग व हल्की, सुगंधित तीखास के लिए महत्व दिया जाता है: वही स्रोत 156.9 का एएसटीए रंग मूल्य (बहुत ऊँची रेटिंग) बताता है, जबकि बताया गया स्कोविल दायरा तुलनात्मक रूप से कम, लगभग 5,000–15,000 एसएचयू है, और इसके अलग-अलग बताए गए कैप्सैसिन आँकड़े स्रोतों में काफ़ी असहमत हैं — एक स्रोत लगभग 0.03% 'नगण्य' कैप्सैसिन बताता है, दूसरा 0.8–1.3% — यह स्रोतों के बीच एक वास्तविक असहमति है, न कि कोई एक तय आँकड़ा, इसलिए यहाँ इसे असहमति नोट करते हुए एक दायरे के रूप में बताया गया है। दो नामित उप-किस्में उगाई जाती हैं: कड्डी (लंबी, पतली, सिकुड़ी/मुड़ी हुई, कम बीज) व डब्बी (छोटी, मोटी, ज़्यादा बीज, कम तीखी, अपने बेहतर रंग के कारण ओलियोरेज़िन निष्कर्षण व मसाला-मिश्रण के लिए पसंदीदा)। एक टन मिर्च से लगभग 50 लीटर ओलियोरेज़िन निकाला जा सकता है, और — उसी सीधे फ़ेच किए गए स्रोत के अनुसार — बयाडगी मिर्च व्यापार सभी भारतीय मिर्च किस्मों में दूसरा सबसे बड़ा कारोबार है, जिसकी वार्षिक बिक्री अकेले बयाडगी एपीएमसी मंडी में लगभग ₹30 अरब (3,000 करोड़ रुपये) है।
मुख्य विशेषताएँ
उपज व अवधि
पकने की अवधि
170–180 दिन
अपेक्षित उपज
8–15 क्विंटल/हेक्टेयर (सूखी मिर्च)
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।
कीट व रोग संबंधी बातें
मुख्य रोग
- फल सड़न की मध्यम सहनशीलता
फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- तुलनात्मक रूप से कम, हल्की तीखास के मुक़ाबले बहुत ऊँची एएसटीए रंग रेटिंग (156.9) ठीक वही संयोजन है जिसके लिए ओलियोरेज़िन, मसाला-मिश्रण व सौंदर्य प्रसाधन व्यापार प्रीमियम देते हैं, जो इस रिकॉर्ड के अपने नोट में बताए गए प्रीमियम से मेल खाता है।
- जीआई सुरक्षा (फ़रवरी 2011 से) असली बयाडगी-मूल मिर्च को उसी नाम से बिकने वाली अन्य लाल मिर्चों से औपचारिक रूप से अलग करती है, जो इसके लिए ज़्यादा भाव देने की व्यापार की तत्परता को मज़बूत करती है।
ध्यान रखने योग्य बातें
- बयाडगी की कैप्सैसिन मात्रा को लेकर स्रोत काफ़ी असहमत हैं — एक आँकड़ा "नगण्य" (~0.03%) है, दूसरा 0.8–1.3% बताता है — संभवतः यह हल्की डब्बी व तीखी कड्डी उप-किस्मों के बीच के अंतर को दर्शाता है, या केवल स्रोतों में असंगत मापन है; यहाँ इसे असहमति चिह्नित करते हुए एक दायरे के रूप में बताया गया है, न कि कोई एक आँकड़ा चुनकर।
उपयुक्त क्षेत्र
जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।
- कर्नाटक
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बयाडगी कड्डी व डब्बी में क्या अंतर है?
कड्डी लंबी, पतली व सिकुड़ी हुई होती है, कम बीज के साथ, और यह ज़्यादा व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्म है; डब्बी छोटी, मोटी, ज़्यादा बीज वाली, कम तीखी होती है, और अपने बेहतर रंग के कारण ओलियोरेज़िन निष्कर्षण व मसाला-मिश्रण के लिए पसंद की जाती है।
क्या बयाडगी वाक़ई पूसा ज्वाला जैसी विकसित की गई किस्म है?
नहीं — स्रोत इसे किसी एक आईसीएआर- या विश्वविद्यालय-विकसित रिलीज़ की बजाय कर्नाटक की लंबे समय से उगाई जा रही स्थानीय/क्षेत्रीय किस्म बताते हैं, जिसकी सुरक्षा इसके बजाय फ़रवरी 2011 के भौगोलिक संकेत टैग (नंबर 129) से होती है, जो असली बयाडगी-मूल मिर्च को परिभाषित करता है।
स्रोत: Byadagi chilli — Wikipedia, Chilli Varieties in India — Agri Farming. संपादकीय नीति.
