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अमरूदसभी सीज़नरोपण सामग्रीअपडेट किया गया 15 अगस्त 2026

Allahabad Safeda

ग्राफ़्टेड पौध, असली बीज नहीं। सफ़ेद गूदा और पतला छिलका — उत्तर भारत की मूल खाने की किस्म, पर उस म्लानि से कोई सुरक्षा नहीं जिसने उत्तर प्रदेश के पुराने बाग़ बर्बाद किए हैं।

सीज़नसभी सीज़न
पकने की अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 2–3 से फल
अपेक्षित उपज150–200 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टीदोमट

ज़रूरी तथ्य

फसल
अमरूद
प्रकार
रोपण सामग्री
सीज़न
सभी सीज़न
पकने की अवधि
ग्राफ़्टेड पौधे में साल 2–3 से फल
अपेक्षित उपज
150–200 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टी
दोमट
जारी
इलाहाबाद (प्रयागराज) क्षेत्र की पारंपरिक किस्म, जो लगभग चार दशकों से व्यापक व्यावसायिक खेती में है — यह कोई आईसीएआर-विकसित संकर नहीं है। अब यह आणविक-मार्कर प्रजनन कार्य के लिए भारत का संदर्भ अमरूद जीनोम है।

इस किस्म के बारे में

एक सीधे फ़ेच किए गए PMC जीनोम-मैपिंग शोधपत्र में इलाहाबाद सफ़ेदा को 'गोल्ड स्टैंडर्ड' अमरूद किस्म बताया गया है, जो भारत में लगभग चार दशकों से व्यावसायिक रूप से उगाई जा रही है, और अपने आकर्षक फल-आकार, ज़्यादा कुल घुलनशील शर्करा, विटामिन-सी सामग्री व समग्र खाने की गुणवत्ता के लिए मूल्यवान मानी जाती है — यही वजह है कि यह 'राष्ट्रीय स्तर के कई प्रजनन कार्यक्रमों में शामिल' है और अब अमरूद के आणविक-मार्कर शोध के लिए भारत का संदर्भ जीनोम भी है। उसी शोधपत्र के अनुसार अमरूद कुल मिलाकर आम, केला व खट्टे फलों के बाद भारत की चौथी सबसे महत्वपूर्ण फल फ़सल है। फल हरा-पीला छिलका व सफ़ेद गूदे वाला होता है — इसी गुण के आधार पर शोधपत्र इसे गुलाबी-गूदे वाले 'पंजाब पिंक' व बैंगनी-गूदे वाले 'पर्पल लोकल' से अलग आनुवंशिक समूह में रखता है। एक सीधे फ़ेच किए गए अपनी खेती फ़सल-गाइड पेज में व्यावहारिक आँकड़े भी मिलते हैं: बौना पेड़ गोल, फैले हुए मुकुट के साथ, चिकना गोल फल, लगभग 145 किलो प्रति पेड़, और कुल घुलनशील ठोस पदार्थ (टीएसएस) 10–12%। वही PMC शोधपत्र स्वतंत्र रूप से यह भी पुष्टि करता है कि लखनऊ-49 (L-49) इलाहाबाद सफ़ेदा से 'एक संयोग-जनित अंकुर' है — शोधपत्र के आनुवंशिक विश्लेषण में दोनों किस्में एक ही समूह में आती हैं। इलाहाबाद सफ़ेदा को 'इलाहाबाद सुर्खा' से भ्रमित नहीं करना चाहिए, जो उसी ज़िले की एक अलग, गुलाबी-गूदे वाली अमरूद किस्म है और जिसे अपना अलग आधिकारिक जीआई टैग (2007–08 में मिला) प्राप्त है — सफ़ेदा को वह जीआई संरक्षण प्राप्त नहीं है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकाररोपण सामग्री
    अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 2–3 से फल
    उपज क्षमता150–200 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
    रोग-प्रतिरोधअमरूद म्लानि के प्रति संवेदनशील — म्लानि-प्रभावित ज़मीन पर दोबारा न लगाएँ
    मिट्टीदोमट
    सीज़नसभी सीज़न

उपज व अवधि

पकने की अवधि

ग्राफ़्टेड पौधे में साल 2–3 से फल

अपेक्षित उपज

150–200 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • भारत में गोल्ड-स्टैंडर्ड व्यावसायिक अमरूद किस्म मानी जाती है — बड़ा, आकर्षक हरा-पीला फल, सफ़ेद गूदा, अच्छी शर्करा व विटामिन-सी
  • इस किस्म का जीनोम अब आणविक-मार्कर प्रजनन कार्य के लिए भारत का संदर्भ अमरूद जीनोम है, जो प्रजनन-सामग्री के रूप में इसके व्यापक उपयोग को रेखांकित करता है
  • लखनऊ-49 (सरदार) की मूल किस्म, जो ज़्यादा उपज देने वाली, म्लानि के प्रति ज़्यादा सहनशील किस्म है और जिसकी ओर कई नए बाग़ अब रुख़ कर रहे हैं — यह ख़ुद इलाहाबाद सफ़ेदा से चुना गया एक संयोग-जनित अंकुर है

ध्यान रखने योग्य बातें

  • इस रिकॉर्ड का अपना diseaseResistance फ़ील्ड पहले से म्लानि-संवेदनशीलता बताता है; यह इस बात से मेल खाता है कि लखनऊ-49 — पुणे के गणेशखिंड में चुना गया एक संयोग-जनित अंकुर, न कि सीआईएसएच लखनऊ की देन — इलाहाबाद सफ़ेदा के म्लानि-सहनशील विकल्प के रूप में क्यों लोकप्रिय हुई
  • सिर्फ़ गुलाबी-गूदे वाली 'इलाहाबाद सुर्खा' अमरूद को आधिकारिक जीआई टैग (2007–08) मिला है — इलाहाबाद सफ़ेदा (सफ़ेद-गूदे वाली) ख़ुद एक अलग किस्म है और उसे वह जीआई संरक्षण प्राप्त नहीं है, दोनों को साझा 'इलाहाबाद' नाम के बावजूद मिलाना नहीं चाहिए

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • उत्तर प्रदेश
  • बिहार
  • मध्य प्रदेश

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या इलाहाबाद सफ़ेदा वही जीआई-टैग वाली 'इलाहाबाद' अमरूद है?

नहीं — जिस अमरूद को आधिकारिक जीआई टैग (2007–08 से) मिला है, वह 'इलाहाबाद सुर्खा' है, जो एक अलग गुलाबी-गूदे वाली किस्म है। इलाहाबाद सफ़ेदा सफ़ेद-गूदे वाली है और, दोनों में से ज़्यादा व्यापक रूप से उगाई जाने वाली व्यावसायिक किस्म होने के बावजूद, उसे यह जीआई संरक्षण प्राप्त नहीं है।

लखनऊ-49 ने इलाहाबाद सफ़ेदा की इतनी रोपाई की जगह क्यों ले ली?

लखनऊ-49 (सरदार) 1920 के दशक में ख़ुद इलाहाबाद सफ़ेदा से चुने गए एक संयोग-जनित अंकुर के रूप में सामने आई, और यह ज़्यादा भरोसे से उपज देने और अमरूद-म्लानि को ज़्यादा सहन करने में सक्षम निकली — वही रोग जिसने उत्तर प्रदेश समेत कई पुराने इलाहाबाद सफ़ेदा बाग़ों को बर्बाद कर दिया है, जैसा इस रिकॉर्ड का अपना diseaseResistance फ़ील्ड बताता है।

स्रोत: Development of Genome-Wide Functional Markers Using Draft Genome Assembly of Guava cv. Allahabad Safeda — PMC, Guava Farming Information — Apni Kheti. संपादकीय नीति.