मुख्य सामग्री पर जाएँ
Technical Kisanखेती, तकनीक के साथ
आमसभी सीज़नरोपण सामग्रीअपडेट किया गया 15 अगस्त 2026

Alphonso (Hapus)

ग्राफ़्टेड पौध, असली बीज नहीं। जीआई-टैग वाली कोंकण किस्म, जो भारत में आम का सबसे ज़्यादा भाव दिलाती है — निर्यात व प्रीमियम रिटेल व्यापार लगभग पूरी तरह इसी नाम पर टिका है।

सीज़नसभी सीज़न
पकने की अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल
अपेक्षित उपज40–60 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर — दशहरी से कम, पर उससे कहीं ज़्यादा भाव पर बिकता है
उपयुक्त मिट्टीदोमट

ज़रूरी तथ्य

फसल
आम
प्रकार
रोपण सामग्री
सीज़न
सभी सीज़न
पकने की अवधि
ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल
अपेक्षित उपज
40–60 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर — दशहरी से कम, पर उससे कहीं ज़्यादा भाव पर बिकता है
उपयुक्त मिट्टी
दोमट
जारी
16वीं सदी के पुर्तगाली-युग की गोवा में हुई ग्राफ़्टिंग से जुड़ी कोंकण की स्थानीय किस्म — यह कोई आईसीएआर-विकसित किस्म नहीं है। 'अल्फांसो' को कोंकण के पाँच ज़िलों (रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, ठाणे, पालघर, रायगड) के लिए 3 अक्टूबर 2018 से जीआई टैग मिला हुआ है।

इस किस्म के बारे में

अल्फांसो आम का नाम पुर्तगाली गवर्नर अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क के नाम पर रखा गया, जो 1509 से 1515 तक गोवा के पुर्तगाली वायसराय रहे — यह जानकारी एक सीधे फ़ेच किए गए विकिपीडिया लेख से मिलती है। 16वीं सदी के पुर्तगाली गोवा (लगभग 1550–1575) में जेसुइट मिशनरियों ने ऐसे मज़बूत, मीठे फल तैयार करने के लिए आम की ग्राफ़्टिंग शुरू की जो यूरोप भेजने के बाद 'काटकर परोसे' जा सकें, और अल्फांसो उस प्रयास के कई पुर्तगाली-नाम वाले नतीजों में से एक था, साथ में फ़र्नांडीना व फ़िलीपीना नाम की ग्राफ़्ट भी थीं। यह मुख्यतः कोंकण तट — महाराष्ट्र, गोवा व कर्नाटक, साथ ही गुजरात के वलसाड व नवसारी ज़िलों — में उगाई जाती है, और आज का फल क़रीब 150–300 ग्राम का होता है, जिसका सुनहरा-पीला छिलका पकने पर लाल आभा लिए होता है, गूदा मलाईदार व रेशा-रहित होता है, और तुड़ाई का समय मार्च के अंत से जून तक रहता है। 3 अक्टूबर 2018 से 'अल्फांसो' नाम को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिला हुआ है, जो कोंकण के पाँच ज़िलों (रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, ठाणे, पालघर व रायगड) को कवर करता है — आगे के वेबसर्च-पुष्ट स्रोतों के अनुसार, इस एक पंजीकरण में मूलतः तीन अलग-अलग आवेदन मिलाए गए, जो डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विद्यापीठ तथा रत्नागिरी व देवगढ़ के किसान समूहों ने अलग-अलग दाख़िल किए थे; एक सीधे फ़ेच किए गए देवगढ़ मैंगो ब्लॉग पोस्ट के अनुसार इस मान्यता को हासिल करने में लगभग एक दशक की मेहनत लगी। निर्यात बाज़ार — जापान, कोरिया व यूरोपीय संघ समेत — तब फिर खुले जब अमेरिकी आयात प्रतिबंध (1989–2007) और बाद का यूरोपीय संघ प्रतिबंध (अप्रैल 2014 से) दोनों हटाए गए, यूरोपीय संघ का प्रतिबंध जनवरी 2015 में समाप्त हुआ, जब निर्यात व कीट-उपचार प्रोटोकॉल बेहतर हुए। इस किस्म की सबसे मशहूर कमज़ोरी स्पंजी टिशू विकार है: एक सीधे फ़ेच किए गए रत्नागिरी अल्फांसो मैंगो ब्लॉग पोस्ट के अनुसार यह एक आंतरिक शारीरिक समस्या है, जिसमें गूदे का कुछ हिस्सा कच्चा, सफ़ेद व स्पंजी रह जाता है — यह न तो तुड़ाई के समय और न ही पकने पर बाहर से दिखता है, सिर्फ़ पके आम को काटने पर पता चलता है — यह फल विकास के दौरान पेड़ पर पड़ने वाले गर्मी, पोषण व सिंचाई के तनाव से जुड़ा है, और तुड़ाई के बाद की खुरदुरी हैंडलिंग व एथिलीन के संपर्क से यह और बिगड़ सकता है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकाररोपण सामग्री
    अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल
    उपज क्षमता40–60 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर — दशहरी से कम, पर उससे कहीं ज़्यादा भाव पर बिकता है
    रोग-प्रतिरोधएकांतर फलन व गर्म साल में स्पंजी टिशू विकार की आशंका
    मिट्टीदोमट
    सीज़नसभी सीज़न

उपज व अवधि

पकने की अवधि

ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल

अपेक्षित उपज

40–60 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर — दशहरी से कम, पर उससे कहीं ज़्यादा भाव पर बिकता है

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

मुख्य रोग

  • एकांतर फलन व गर्म साल में स्पंजी टिशू विकार की आशंका

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • भारत का सबसे ज़्यादा दाम पाने वाला व्यावसायिक आम — अकेला नाम ही घरेलू व निर्यात बाज़ार में प्रीमियम दिलाता है, और आयात प्रतिबंध हटने के बाद अब इसमें जापान, कोरिया व यूरोपीय संघ भी शामिल हैं
  • मलाईदार, रेशा-रहित गूदा — यही फल गुणवत्ता है जिसने पुर्तगाली-युग के मूल स्टॉक से सदियों की ग्राफ़्टेड प्रवर्धन के दौरान इसकी प्रतिष्ठा बनाई
  • 2018 से मिला जीआई संरक्षण अब क़ानूनी रूप से 'अल्फांसो' नाम को अधिसूचित पाँच-ज़िला कोंकण क्षेत्र में उगाए गए फल तक सीमित करता है

ध्यान रखने योग्य बातें

  • इस रिकॉर्ड का अपना diseaseResistance फ़ील्ड पहले से गर्म साल में स्पंजी टिशू विकार की बात बताता है — स्रोत-आधारित जानकारी इसकी पुष्टि करती है कि यह एक आंतरिक शारीरिक समस्या है, जो फल विकास के दौरान गर्मी, पोषण व सिंचाई के तनाव से जुड़ी है, बाहर से तुड़ाई या पकने पर नहीं दिखती, सिर्फ़ काटने पर पता चलती है, और निर्यात-गुणवत्ता के लिए असली जोख़िम है
  • एकांतर फलन (जो इस रिकॉर्ड में भी दर्ज है) आम की पुरानी ग्राफ़्टेड स्थानीय किस्मों में आमतौर पर पाया जाता है — इस बार अल्फांसो-विशेष कोई नई जानकारी इस गुण पर नहीं मिली, जो रिकॉर्ड में पहले से मौजूद बात से आगे जाए
  • 'अल्फांसो' जीआई ख़ुद 2018 में तीन अलग-अलग मूल आवेदनों (एक विश्वविद्यालय व दो किसान समूह) का विलय है — आज संरक्षित नाम अकेले 'देवगढ़ अल्फांसो' या 'रत्नागिरी अल्फांसो' से कहीं व्यापक पाँच-ज़िला क्षेत्र को कवर करता है, जितना ख़रीदार को लग सकता है

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • महाराष्ट्र
  • गुजरात

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इसे 'अल्फांसो' क्यों कहा जाता है?

इसका नाम अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क के नाम पर रखा गया, जो 1509 से 1515 तक गोवा के पुर्तगाली वायसराय रहे — 16वीं सदी के गोवा में जेसुइट मिशनरियों ने यूरोप भेजने के लिए मज़बूत, मीठी किस्में तैयार करने के लिए आम की ग्राफ़्टिंग शुरू की, और अल्फांसो उसी प्रयास का एक नतीजा था, साथ में फ़र्नांडीना व फ़िलीपीना जैसी अन्य पुर्तगाली-नाम वाली ग्राफ़्ट भी थीं।

क्या कहीं से भी आने वाला 'अल्फांसो' नाम का फल एक जैसा होता है?

क़ानूनी रूप से नहीं — 3 अक्टूबर 2018 से 'अल्फांसो' जीआई टैग सिर्फ़ पाँच अधिसूचित कोंकण ज़िलों (रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, ठाणे, पालघर, रायगड) में उगाए गए फल के नाम को संरक्षित करता है; यह पंजीकरण एक विश्वविद्यालय व दो किसान समूहों के तीन पहले के अलग-अलग आवेदनों का विलय है।

स्रोत: Alphonso mango — Wikipedia, Devgad Alphonso Mango Got Its Very Own GI Tag — Devgad Mango, Spongy Tissue Disorder — Ratnagiri Alphonso Mango. संपादकीय नीति.