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आमसभी सीज़नरोपण सामग्रीअपडेट किया गया 15 अगस्त 2026

Dashehari

ग्राफ़्टेड पौध, असली बीज नहीं। मलिहाबाद (लखनऊ) की किस्म, जो लाखों ख़रीदारों के लिए उत्तर भारतीय आम की पहचान है — इसकी ख़ुशबू ही इसे बिकवाती है, एकांतर फलन इसकी कमज़ोरी है।

सीज़नसभी सीज़न
पकने की अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल; फूल आने के बाद 60–90 दिन में फल पकना
अपेक्षित उपज80–100 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर (साल 10+)
उपयुक्त मिट्टीदोमट

ज़रूरी तथ्य

फसल
आम
प्रकार
रोपण सामग्री
सीज़न
सभी सीज़न
पकने की अवधि
ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल; फूल आने के बाद 60–90 दिन में फल पकना
अपेक्षित उपज
80–100 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर (साल 10+)
उपयुक्त मिट्टी
दोमट
जारी
1700 के दशक में मलिहाबाद (काकोरी ब्लॉक, लखनऊ) के पास खोजी गई स्थानीय किस्म — यह कोई आईसीएआर-विकसित किस्म नहीं है। सीआईएसएच लखनऊ ने 1977 में मूल पेड़ के सायन से क्लोनल प्रवर्धन शुरू किया; 'मलिहाबादी दुसहरी' जीआई टैग 4 सितंबर 2009 को मिला।

इस किस्म के बारे में

दशहरी एक स्थानीय (लैंडरेस) आम की किस्म है, जिसकी खोज 1700 के दशक में लखनऊ ज़िले के काकोरी ब्लॉक स्थित मलिहाबाद के दशहरी गाँव के पास हुई — यह जानकारी दो सीधे फ़ेच किए गए विकिपीडिया लेखों ('Dasheri' व 'Malihabadi Dusseheri Mango') से मिलती है। दोनों लेखों में दोहराई गई मूल कहानी के अनुसार, मलिहाबाद के रईस अब्दुल हमीद ख़ान — जिन्हें बाद में 'बाबा-ए-आम' कहा जाने लगा — के एक सेवक को दशहरी गाँव से गुज़रते समय एक असाधारण आम मिला, जिसे वह वापस ले आया; इसके स्वाद व ख़ुशबू से प्रभावित होकर अब्दुल हमीद ख़ान ने उस बीज की खेती की और अन्य स्थानीय पेड़ों के साथ इसकी ग्राफ़्टिंग करके आम की ग्राफ़्टिंग के सबसे शुरुआती दर्ज मामलों में से एक किया। मूल मातृ वृक्ष, जिसकी उम्र स्रोत के अनुसार लगभग 185–200 साल आँकी गई है, आज भी काकोरी के पास खड़ा है और फल दे रहा है। सीआईएसएच लखनऊ ने 1977 में उसी पेड़ से सायन (scion) इकट्ठा कर क्लोनल प्रवर्धन शुरू किया, और उसके बाद उन्नत ग्राफ़्टेड क्लोन निजी व सरकारी नर्सरियों के नेटवर्क के ज़रिए उत्तर भारतीय किसानों तक पहुँचे। इस किस्म को — जो अपने अधिसूचित मूल क्षेत्र में क़ानूनी रूप से 'मलिहाबादी दशहरी' कहलाती है — 4 सितंबर 2009 को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिला (जो 14 मई 2028 तक वैध है, चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में उस आवेदन पर पंजीकृत, जो राष्ट्रीय बाग़वानी बोर्ड ने 2008 में दाख़िल किया था), जिससे यह उत्तर प्रदेश की पहली और भारत की केवल चौथी जीआई-संरक्षित आम किस्म बनी। अधिसूचित मलिहाबाद क्षेत्र के बाहर उगाए गए फल भी 'दशहरी' के नाम से बेचे जा सकते हैं, पर जीआई केस-स्टडी के अनुसार वे मूल क्षेत्र के फल जैसे आकार, वज़न, मिठास या रंग के बराबर नहीं होते। फल छोटे-से-मध्यम आकार का, लंबोतरा, चमकीला पीला, रेशा-रहित और गहरी ख़ुशबू वाला होता है, आम के हिसाब से भंडारण क्षमता भी अच्छी है; उत्तर भारत के अलावा यह आंध्र प्रदेश, नेपाल व पाकिस्तान में भी उगाई जाती है, और सिंगापुर, हॉन्गकॉन्ग, फ़िलीपींस, मलेशिया, यूएई, सऊदी अरब व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य बाज़ारों में निर्यात होती है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकाररोपण सामग्री
    अवधिग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल; फूल आने के बाद 60–90 दिन में फल पकना
    उपज क्षमता80–100 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर (साल 10+)
    रोग-प्रतिरोधमध्यम — चूर्णिल आसिता के प्रति संवेदनशील और एकांतर फलन की प्रवृत्ति
    मिट्टीदोमट
    सीज़नसभी सीज़न

उपज व अवधि

पकने की अवधि

ग्राफ़्टेड पौधे में साल 4–5 से फल; फूल आने के बाद 60–90 दिन में फल पकना

अपेक्षित उपज

80–100 किलो/पेड़, पूर्ण फलन पर (साल 10+)

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • रेशा-रहित, गहरी ख़ुशबू वाला गूदा, जिसने इसे पीढ़ियों से उत्तर भारत का बेंचमार्क खाने का आम बना रखा है — यही प्रतिष्ठा प्रीमियम माँग खींचती है
  • 2009 का जीआई टैग अब 'मलिहाबादी दुसहरी' नाम को उसके मूल क्षेत्र में उगाए गए फल के लिए औपचारिक रूप से संरक्षित करता है, जिससे यह कहीं और उगाई गई उसी नाम की दशहरी से अलग पहचानी जाती है
  • अन्य कई आम किस्मों की तुलना में अच्छी भंडारण क्षमता, जो इतने बड़े घरेलू व निर्यात नेटवर्क में बिकने वाले फल के लिए काम की बात है

ध्यान रखने योग्य बातें

  • इस रिकॉर्ड का अपना diseaseResistance फ़ील्ड पहले से चूर्णिल आसिता की मध्यम संवेदनशीलता और एकांतर फलन की आदत बताता है — इस बार चूर्णिल आसिता पर किस्म-विशेष कोई नई जानकारी नहीं मिली, पर एकांतर फलन पुराने ग्राफ़्टेड आम की स्थानीय किस्मों में आमतौर पर पाया जाने वाला गुण है, जो रिकॉर्ड की पहले से मौजूद बात से मेल खाता है
  • जीआई संरक्षण सिर्फ़ अधिसूचित मलिहाबाद क्षेत्र में उगाए गए फल को मिलता है; अन्य राज्यों या देशों से बेची गई दशहरी वही किस्म-नाम रखती है, पर जीआई केस-स्टडी के अनुसार वह मूल क्षेत्र के फल जैसे आकार, वज़न, मिठास या रंग के बराबर नहीं होती

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • उत्तर प्रदेश
  • पंजाब
  • हरियाणा
  • बिहार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दशहरी आम मूल रूप से कहाँ से आई?

1700 के दशक में लखनऊ ज़िले के मलिहाबाद स्थित काकोरी ब्लॉक के दशहरी गाँव के पास खोजे गए एक ही पेड़ से — एक सेवक की संयोग से मिली खोज ने स्थानीय रईस अब्दुल हमीद ख़ान को प्रभावित किया, जिन्होंने आगे इसका प्रवर्धन किया। सीआईएसएच लखनऊ ने 1977 से उसी पेड़ से सायन-ग्राफ़्टेड क्लोन तैयार करना शुरू किया।

क्या 'दशहरी' नाम का मतलब हमेशा एक जैसी गुणवत्ता का आम होता है?

पूरी तरह नहीं — 2009 में मिला 'मलिहाबादी दुसहरी' जीआई टैग क़ानूनी रूप से सिर्फ़ अधिसूचित लखनऊ क्षेत्र में उगाए गए फल के नाम को संरक्षित करता है; अन्य राज्यों या देशों में उगाई गई दशहरी वही किस्म-नाम रखती है, पर जीआई केस-स्टडी के अनुसार वह मूल क्षेत्र के फल जैसे आकार, मिठास व रंग के बराबर नहीं होती।

स्रोत: Dasheri — Wikipedia, Malihabadi Dusseheri Mango — Wikipedia. संपादकीय नीति.