मुख्य सामग्री पर जाएँ
Technical Kisanखेती, तकनीक के साथ
अंगूरसभी सीज़नरोपण सामग्रीअपडेट किया गया 13 अगस्त 2026

Anab-e-Shahi

जड़ वाली कलमों से तैयार, असली बीज से नहीं। भारत में उगाई जाने वाली सबसे पुरानी अंगूर किस्मों में से एक — बड़े, अंबर रंग के बीज वाले दाने, थॉम्पसन सीडलेस के आने से बहुत पहले से दक्खन में ताज़ा टेबल बाज़ार के लिए उगाए जाते रहे।

सीज़नसभी सीज़न
पकने की अवधिजड़ वाली कलम से बनी बेल में साल 2–3 से फल
अपेक्षित उपज300–350 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टीदोमट

ज़रूरी तथ्य

फसल
अंगूर
प्रकार
रोपण सामग्री
सीज़न
सभी सीज़न
पकने की अवधि
जड़ वाली कलम से बनी बेल में साल 2–3 से फल
अपेक्षित उपज
300–350 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
उपयुक्त मिट्टी
दोमट
जारी
लगभग 1890 में अब्दुल बाक़र ख़ान द्वारा मध्य-पूर्व से हैदराबाद लाई गई; 1943 में हैदराबाद के निज़ाम ने इसे 'अनाब-ए-शाही' ('शाही अंगूर') नाम दिया; 1960 के दशक में राज्य के बागवानी विशेषज्ञ स्वर्गीय शंकर पिल्लई ने इसका व्यावसायीकरण किया।

इस किस्म के बारे में

अनाब-ए-शाही भारत की सबसे पुरानी उगाई जाने वाली अंगूर किस्मों में से एक है, जिसे लगभग 1890 में अब्दुल बाक़र ख़ान द्वारा मध्य-पूर्व से हैदराबाद लाया गया — यह जानकारी एक सीधे फ़ेच किए गए द हंस इंडिया लेख से मिलती है, जिसमें ग्रेप रिसर्च स्टेशन, राजेंद्रनगर की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डी. विजया को उद्धृत किया गया है। 'अनाब' अरबी में अंगूर के लिए है और 'शाही' का अर्थ शाही/राजसी है — यह नाम 1943 में हैदराबाद के निज़ाम ने दिया। निज़ाम रियासत के बागवानी विशेषज्ञ स्वर्गीय शंकर पिल्लई ने 1960 के दशक में इस किस्म का व्यावसायीकरण किया, और 1969 में हैदराबाद ने इसी किस्म से विश्व अंगूर-उत्पादन रिकॉर्ड बनाया — 42 टन/एकड़ (लगभग 105 टन/हेक्टेयर)। दाने लंबे, मध्यम-बड़े, पूरी तरह पकने पर अंबर रंग के व बीज वाले होते हैं — यह सच में एक बीज वाली टेबल अंगूर है, ऐसे समय में जब बाज़ार पूरी तरह बीज-रहित की ओर मुड़ चुका है। वही सीधे फ़ेच किया गया स्रोत बताता है कि अनाब-ए-शाही अब अपने हैदराबाद-गढ़ में 'विलुप्ति के कगार पर' है, मुख्य रूप से ग्रेप रिसर्च स्टेशन में ही बची है, क्योंकि किसान बेहतर बाज़ार भाव के लिए थॉम्पसन सीडलेस व उसके क्लोनों की ओर मुड़ गए हैं — भले ही अनाब-ए-शाही के प्राकृतिक बीजों में बीज-रहित अंगूरों से ज़्यादा पोषक-औषधीय मूल्य बताया जाता है। एक सीधे फ़ेच किया गया krishijagran.com सारांश स्वतंत्र रूप से इसी लगभग-1890 आगमन-कहानी की पुष्टि करता है और बताता है कि इसकी खेती बाद में आंध्र प्रदेश से पंजाब, हरियाणा व तमिलनाडु तक फैली — यह इस रिकॉर्ड के अपने states फ़ील्ड (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) से मेल खाता है।

मुख्य विशेषताएँ

    पौध प्रकाररोपण सामग्री
    अवधिजड़ वाली कलम से बनी बेल में साल 2–3 से फल
    उपज क्षमता300–350 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर
    रोग-प्रतिरोधडाउनी मिल्ड्यू के प्रति संवेदनशील
    मिट्टीदोमट
    सीज़नसभी सीज़न

उपज व अवधि

पकने की अवधि

जड़ वाली कलम से बनी बेल में साल 2–3 से फल

अपेक्षित उपज

300–350 क्विंटल/हेक्टेयर, पूर्ण फलन पर

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता व फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कीट व रोग संबंधी बातें

फ़ायदे व ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • सच में बीज वाली, अंबर रंग की टेबल अंगूर, जिसके बीज व छिलके में बीज-रहित किस्मों से ज़्यादा पोषक-औषधीय मूल्य बताया गया है — एक सीधे फ़ेच किए गए krishijagran.com सारांश के अनुसार
  • ऐतिहासिक उपज रिकॉर्ड — हैदराबाद ने 1969 में अनाब-ए-शाही से विश्व अंगूर-उत्पादन रिकॉर्ड बनाया, 42 टन/एकड़ (लगभग 105 टन/हेक्टेयर) — एक सीधे फ़ेच किए गए द हंस इंडिया लेख के अनुसार

ध्यान रखने योग्य बातें

  • अब अपने ही हैदराबाद-गढ़ में सच में विलुप्ति के कगार पर है, मुख्यतः ग्रेप रिसर्च स्टेशन, राजेंद्रनगर में बची है — किसान बेहतर बाज़ार भाव के लिए लगभग पूरी तरह थॉम्पसन सीडलेस व उसके क्लोनों की ओर मुड़ चुके हैं, यह बात डॉ. डी. विजया (प्रधान वैज्ञानिक, ग्रेप रिसर्च स्टेशन) ने एक सीधे फ़ेच किए गए द हंस इंडिया लेख में सीधे कही है। इस रिकॉर्ड का अपना states फ़ील्ड (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) मौजूदा व्यावसायिक खेती के पैमाने के बजाय ऐतिहासिक हैदराबाद-दक्खन गढ़ को दर्शाता है, जो काफ़ी सिकुड़ चुका है
  • एक बीज वाली विटिस विनिफ़ेरा किस्म होने के नाते इसमें भी थॉम्पसन सीडलेस जैसी ही डाउनी-मिल्ड्यू के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध की कमी है — इस रिकॉर्ड का अपना diseaseResistance फ़ील्ड पहले से यही बताता है

उपयुक्त क्षेत्र

जिन राज्यों के लिए यह किस्म सुझाई गई है — स्थानीय स्तर पर भी जाँच लें, क्योंकि एक राज्य में एक से ज़्यादा सुझाया क्षेत्र हो सकता है।

  • आंध्र प्रदेश
  • तेलंगाना

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत की अपनी विरासती अंगूर होने के बावजूद अनाब-ए-शाही क्यों लुप्त हो रही है?

शुद्ध रूप से आर्थिक वजह — एक सीधे फ़ेच किए गए द हंस इंडिया लेख में ग्रेप रिसर्च स्टेशन की अपनी प्रधान वैज्ञानिक कहती हैं कि किसान बेहतर बाज़ार भाव के लिए लगभग पूरी तरह थॉम्पसन सीडलेस व उसके क्लोनों की ओर मुड़ चुके हैं। अनाब-ए-शाही अब मुख्यतः रिसर्च स्टेशन में ही बची है, भले ही इसने कभी विश्व अंगूर-उपज रिकॉर्ड (42 टन/एकड़, हैदराबाद, 1969) बनाया था।

'अनाब-ए-शाही' नाम का क्या मतलब है?

'अनाब' अरबी में अंगूर के लिए है और 'शाही' का मतलब राजसी है — हैदराबाद के निज़ाम ने यह नाम 1943 में दिया, यानी इस किस्म को लगभग 1890 में अब्दुल बाक़र ख़ान द्वारा मध्य-पूर्व से शहर में लाए जाने के दशकों बाद।

स्रोत: Hyderabad: Anab e Shahi losing out to seedless grapes — The Hans India, Top 5 Varieties of Grapes in India — Krishi Jagran. संपादकीय नीति.