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Technical Kisanखेती, तकनीक के साथ
स्ट्रॉबेरीरबीरनर पौधा (टिशू-कल्चर / प्रमाणित)अंतिम अपडेट: 20 अक्टूबर 2026

Camarosa

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस (1994) की छोटे दिन की किस्म। भारत के परीक्षणों के नतीजे मिले-जुले हैं। मेघालय के परीक्षण में इसने सबसे ज़्यादा फल दिया (245.2 ग्राम प्रति पौधा), पर महाबलेश्वर के परीक्षण में सबसे कम (540 ग्राम प्रति पौधा, 21.65 टन प्रति हेक्टेयर), और वहाँ TSS सबसे कम (9.80%) रहा।

सीज़नरबी
पकने की अवधिलगभग 150–170 दिन
अपेक्षित उपजमेघालय में 245.2 ग्राम प्रति पौधा, महाबलेश्वर में 540 ग्राम (21.65 टन प्रति हेक्टेयर)। नतीजे जगह के साथ बदलते हैं।
उपयुक्त मिट्टीउठी हुई, काली प्लास्टिक मल्च वाली क्यारी पर अच्छी निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी

ज़रूरी तथ्य

प्रकार
रनर पौधा (टिशू-कल्चर / प्रमाणित)
सीज़न
रबी
पकने की अवधि
लगभग 150–170 दिन
अपेक्षित उपज
मेघालय में 245.2 ग्राम प्रति पौधा, महाबलेश्वर में 540 ग्राम (21.65 टन प्रति हेक्टेयर)। नतीजे जगह के साथ बदलते हैं।
उपयुक्त मिट्टी
जैविक पदार्थ से भरपूर, अच्छी निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी, pH 5.7–6.5
रोग-प्रतिरोध
कोई खास रोग-प्रतिरोध का दावा नहीं। कड़ा फल सँभाल अच्छी तरह सह लेता है
जारी
कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस ने बनाई और 1994 में जारी की

असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता और फ़सल की देखभाल पर निर्भर करती है।

इस किस्म के बारे में

कैमारोसा को कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस ने बनाया और 1994 में डगलस × Cal 85.218-605 के क्रॉस से जारी किया। यह ज़ोरदार, छोटे दिन की किस्म है, जिसके फल बड़े, कड़े, गहरे लाल और शंकु आकार के हैं। भारत में यह ICAR की जारी की हुई नहीं है। यह महाबलेश्वर और पंचगनी की नर्सरियों से पौध-सामग्री के रूप में आती है। भारत के परीक्षण इसकी पैदावार पर एकमत नहीं हैं। उमियम, मेघालय के 25 किस्मों के परीक्षण (2005–07) में यह सबसे जल्दी, रोपाई के 91 दिन बाद, फूली और सबसे ज़्यादा फल, 245.2 ग्राम प्रति पौधा, दिया, और फल सबसे भारी, 17.2 ग्राम। महाबलेश्वर में 2016 में चार किस्मों में इसने सबसे कम दिया: 17.00 ग्राम के 31.76 फल, 540 ग्राम प्रति पौधा और 21.65 टन प्रति हेक्टेयर, और TSS सबसे कम, 9.80%। हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में यह सबसे लंबे समय, 111–113 दिन, फूली।

क्या यह किस्म आपके लिए ठीक है?

ऐसी जगह खेती करते हैं जहाँ इसका रिकॉर्ड अच्छा है, जैसे मेघालय के पहाड़ (245.2 ग्राम प्रति पौधा), या लंबा फूलने का समय चाहिए (हिमाचल के परीक्षण में 111–113 दिन), तो कैमारोसा चुनिए। महाबलेश्वर जैसे हालात में सिर्फ़ नाम के भरोसे इसे मत चुनिए। वहाँ 2016 के परीक्षण में इसने चार किस्मों में सबसे कम, 540 ग्राम प्रति पौधा, दिया। वहीं सीस्केप ने 840 ग्राम और विंटर डॉन ने 820 ग्राम दिए। महाबलेश्वर के लिए विंटर डॉन या नबीला लीजिए, और हिमाचल के मध्यम पहाड़ों के लिए चैंडलर (40.08 टन प्रति हेक्टेयर)।

बुवाई और खेती

  • बुवाई का समयमहाबलेश्वर का परीक्षण नवंबर 2016 में उठी क्यारियों पर 30 × 30 सेमी पर लगाया गया। हिमाचल के मध्यम पहाड़ों का परीक्षण अक्टूबर के पहले हफ़्ते में 50 × 25 सेमी पर लगा।
  • दूरी30×30 सेमी, 1–1.2 मी चौड़ी उठी क्यारियों पर काली प्लास्टिक मल्च के आर-पार
  • उर्वरकक्यारी बनाते समय गोबर की खाद के साथ फॉस्फोरस और पोटाश की आधार खुराक। नाइट्रोजन लगभग 3 हफ़्ते पर और फूल आने पर बाँटकर दें, और पूरा पोटाश फूल आने पर (पूरी सारणी फसल गाइड में देखें)

कीट और रोग संबंधी बातें

फ़ायदे और ध्यान रखने योग्य बातें

किसान इसे क्यों चुन सकते हैं

  • मेघालय के परीक्षण में सबसे जल्दी, रोपाई के 91 दिन बाद, फूली और वहाँ 245.2 ग्राम प्रति पौधा दिया।
  • लंबे समय तक फूलती है, हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 111–113 दिन, जिससे तुड़ाई फैलती है।
  • कड़ा, गहरा लाल फल, जिसे हिमाचल के परीक्षण ने आकार और पैदावार में अपेक्षाकृत आशाजनक माना।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • महाबलेश्वर में चार किस्मों में सबसे कम (540 ग्राम प्रति पौधा, 21.65 टन प्रति हेक्टेयर), और वहाँ TSS सबसे कम (9.80%) और फल सबसे छोटा (17.00 ग्राम)।
  • ICAR की जारी की हुई नहीं है। हर साल नए, प्रमाणित रनर लगाइए; पुराने पौधे दोबारा मत लगाइए।
  • ग्रे मोल्ड या रेड स्टील के लिए कोई ख़ास प्रतिरोध नहीं। उठी क्यारी, ड्रिप और मल्च फिर भी चाहिए।

उपयुक्त क्षेत्र

अमेरिका की लाई हुई किस्म है, ICAR की जारी की हुई नहीं। प्रमाणित नर्सरियों के रास्ते महाबलेश्वर–पंचगनी और उत्तरी मैदानों में व्यावसायिक रूप से उगाई जाती है।

  • महाराष्ट्र
  • पंजाब
  • हरियाणा
  • उत्तर प्रदेश
  • दिल्ली

एक ही किस्म, अलग राज्य: अपने सबसे नज़दीक का परीक्षण पढ़िए

कैमारोसा ने मेघालय (2005–07) में 245.2 ग्राम प्रति पौधा दिया, और महाबलेश्वर में 2016 में 540 ग्राम प्रति पौधा, जहाँ सीस्केप ने 840 ग्राम दिया। पौधे एक ही हैं। फ़र्क़ रोपाई की तारीख़, दूरी, मौसम, मिट्टी और साल का है।

इसीलिए 'कैमारोसा सबसे अच्छी है' वाली बात सुरक्षित नहीं। महाबलेश्वर में क्यारियाँ नवंबर 2016 में 30 × 30 सेमी पर लगी थीं। हिमाचल के परीक्षण में पौधे अक्टूबर के पहले हफ़्ते में 50 × 25 सेमी पर लगे। दोनों ने स्थानीय तरीक़ा अपनाया।

अपने सबसे नज़दीक का परीक्षण ढूँढिए। महाराष्ट्र के मैदानों में हैं तो 2016 के महाबलेश्वर के आँकड़े आपके सबसे अच्छे मार्गदर्शक हैं। पहाड़ों में खेती करते हैं तो हिमाचल और मेघालय के आँकड़े लीजिए। फिर दो-तीन किस्में अलग-अलग क्यारियों में लगाइए और एक मौसम फल तौलिए।

क्या अपनी रोपाई सामग्री ख़ुद रख सकते हैं?

यह धावक (रनर) से बढ़ाई जाती है — वे फैलने वाली शाखाएँ, जो ज़मीन छूकर वहीं जड़ पकड़ लेती हैं। स्वस्थ मातृ पौधों से अपने पौधे तैयार किए जा सकते हैं, पर रनर के साथ विषाणु और क्राउन रॉट आगे चले जाते हैं, इसलिए ज़्यादातर किसान हर एक-दो साल में नए प्रमाणित रनर ख़रीदते हैं, अपने ही पौधों से लगातार चलाते नहीं रहते।

दूसरी किस्मों से तुलना

स्ट्रॉबेरी की वे सभी किस्में, जिनका पेज इस साइट पर है, एक साथ देखें। जो किस्म आप अभी देख रहे हैं, उसकी पंक्ति रंग से अलग दिखती है।

किस्मकिसके लिए ठीकपकने की अवधिउपजराज्य
Camarosaयही पेजपहाड़ों और ठंडे मैदानों के किसानों के लिए कड़ा, गहरा लाल फल, जो वहाँ लगाया जाता है जहाँ इसका रिकॉर्ड अच्छा है, यह मानकर नहीं कि वह सबसे ज़्यादा उपज देगालगभग 150–170 दिनमेघालय में 245.2 ग्राम प्रति पौधा, महाबलेश्वर में 540 ग्राम (21.65 टन प्रति हेक्टेयर)। नतीजे जगह के साथ बदलते हैं।महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली
Chandlerपहाड़ों और ठंडे मैदानों की परखी हुई स्ट्रॉबेरी, जो जल्दी फल के लिए नहीं बल्कि हिमाचल और असम के परीक्षणों में अपने रिकॉर्ड के लिए चुनी जाती हैलगभग 150–170 दिनहिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 35.10 और 40.08 टन प्रति हेक्टेयर (2012, 2013); असम के पहाड़ों में 186.8 ग्राम प्रति पौधा।हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा
Festivalबिहार के मैदानों और पहाड़ों के लिए बड़े फल और ज़्यादा पैदावार वाली स्ट्रॉबेरी, जो फल के आकार और पैदावार के लिए चुनी जाती है, मिठास के लिए नहींलगभग 150–170 दिनसबौर, बिहार में 355.04 ग्राम प्रति पौधा; सुपौल, बिहार में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर; हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर; असम के पहाड़ों में 169.0 ग्राम प्रति पौधा।महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़
Nabilaमहाबलेश्वर जैसे हालात के लिए मीठा, बड़े फल वाला फल, जो TSS और प्रति पौधा वज़न के लिए चुना जाता है, और जिसका भारतीय परीक्षण-रिकॉर्ड पतला हैलगभग 150–170 दिनमहाबलेश्वर, 2016 में 735 ग्राम प्रति पौधा (29.42 टन प्रति हेक्टेयर); इतालवी पेटेंट में 850–900 ग्राम प्रति पौधा।महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़
Sweet Charlieमीठी, जल्दी फूलने वाली स्ट्रॉबेरी, जो स्वाद पर बेची जाती है, और जो TSS और फलों की गिनती के लिए लगाई जाती है, सबसे भारी क्यारी के लिए नहींलगभग 140–160 दिनअसम के पहाड़ों में 182.4 ग्राम प्रति पौधा (चैंडलर के बराबर); सबौर, बिहार में 22.48 फल प्रति पौधा। फल छोटे हैं।महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली
Winter Dawnज़ोरदार, जल्दी लगाने वाली किस्म: महाराष्ट्र और बिहार के लिए ज़्यादा फल देने वाली सर्दी की स्ट्रॉबेरी, जो प्रति पौधा फलों की संख्या और जल्दी शुरुआत के लिए चुनी जाती हैलगभग 150–170 दिनमहाबलेश्वर, 2016 में 820 ग्राम प्रति पौधा (32.97 टन प्रति हेक्टेयर), 21.00 ग्राम के 39.20 फलमहाराष्ट्र

इस फ़सल के कैलकुलेटर

आगे के हिसाब यहाँ कर लीजिए — कितना बीज ख़रीदें, बोरा अंकुरित होगा या नहीं, खाद का ख़र्च कितना बैठेगा, और स्ट्रॉबेरी का भाव क्या चल रहा है।

सब्सिडी और सरकारी मदद

स्ट्रॉबेरी के बीज या रोपण सामग्री की लागत में मदद करने वाली योजनाएँ। नियम और आवेदन का तरीक़ा हर योजना के पेज पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या कैमारोसा भारत में बनी स्ट्रॉबेरी किस्म है?

नहीं। इसे कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस ने बनाया और 1994 में जारी किया। यह महाबलेश्वर और पंचगनी की नर्सरियों के बढ़ाए प्रमाणित रोपाई सामग्री के रूप में भारतीय किसानों तक पहुँचती है। इसे इसलिए चुना गया क्योंकि इसका छोटे दिन वाला प्रजनन भारतीय सर्दी में ठीक बैठता है, इसलिए नहीं कि यह भारतीय जारी की हुई किस्म है।

दूर के बाज़ारों में भेजे जाने वाले फल के लिए कैमारोसा की खास कद्र क्यों है?

इसका फल कई दूसरी व्यावसायिक स्ट्रॉबेरी किस्मों की तुलना में खास तौर पर बड़ा और कड़ा है। इसलिए महाबलेश्वर से काफ़ी दूर के शहरी बाज़ारों तक पहुँचने के लिए ज़रूरी सँभाल, पैकिंग और ढुलाई सह लेता है, और उतनी जल्दी नरम या दबा नहीं पड़ता।

क्या कैमारोसा सच में भारत की सबसे ज़्यादा उपज देने वाली स्ट्रॉबेरी है?

हर जगह नहीं। मेघालय के परीक्षण में इसने सबसे ज़्यादा फल दिया, 245.2 ग्राम प्रति पौधा। महाबलेश्वर में 2016 में इसने चार किस्मों में सबसे कम दिया, 540 ग्राम प्रति पौधा (21.65 टन प्रति हेक्टेयर)। इसे अपने राज्य के रिकॉर्ड के आधार पर चुनिए, किसी आम दावे पर नहीं।

कैमारोसा कितनी मीठी है?

महाबलेश्वर में चार किस्मों में इसका TSS सबसे कम था, 9.80%, जबकि नबीला का 12.46% और विंटर डॉन का 11.10%। हिमाचल के परीक्षण में स्वीट चार्ली और ओफ़्रा का TSS सबसे ज़्यादा था। मिठास पर बेचते हैं तो कैमारोसा पहली पसंद नहीं। कड़े, गहरे लाल फल पर बेचते हैं जो सफ़र झेल ले, तो फिर भी हो सकती है।

कैमारोसा कितने समय तक फूलती रहती है?

हिमाचल के मध्यम पहाड़ों के परीक्षण (2012–13) में कैमारोसा दोनों साल 111 और 113 दिन फूली, 13 जीनोटाइप में सबसे लंबे समय, उसके बाद स्वीट चार्ली और वेंटाना। लंबी फूल अवधि का मतलब तुड़ाई की लंबी खिड़की हो सकता है, पर तभी जब पौधे स्वस्थ रहें और फल ग्रे मोल्ड में न जाएँ। महाबलेश्वर में तुड़ाई रोपाई के 70.80 दिन तक चली, जो सबसे कम थी, हालाँकि सांख्यिकीय रूप से अंतर नहीं था।

क्या अपने कैमारोसा पौधों के रनर लगा सकता हूँ?

रनर लिए जा सकते हैं, पर पुराने स्टॉक में रोग जमा होते जाते हैं। ग्रे मोल्ड, क्राउन रॉट और वायरस माँ पौधे से रनर में चले जाते हैं। ऊपर के सभी भारतीय परीक्षणों में पतझड़ में नए रनर लगाए गए थे। हर साल नर्सरी से प्रमाणित रनर ख़रीदिए और उन्हें मल्च वाली साफ़ उठी क्यारी पर लगाइए।

पहाड़ों के लिए कैमारोसा या चैंडलर?

हिमाचल के मध्यम पहाड़ों के परीक्षण (नौनी, 2012–13) में चैंडलर ने सबसे ज़्यादा, 35.10 और 40.08 टन प्रति हेक्टेयर, दिया, और कैमारोसा फल के आकार और पैदावार में आशाजनक किस्मों में थी। असम के पहाड़ों में चैंडलर ने 186.8 ग्राम प्रति पौधा दिया। पहाड़ों में पहली रोपाई के लिए ज़्यादातर रक़बा चैंडलर में रखिए और तुलना के लिए कैमारोसा की कुछ क्यारियाँ।

स्रोत: Camarosa Strawberry Variety Info And Grow Guide, UC Davis — Strawberry Varieties Released, Performance of strawberry cultivars under Mahabaleshwar conditions — J. Pharmacognosy & Phytochemistry 7(4), 2018, Comparative performance of strawberry cultivars under mid-hill conditions of north-western Himalayas — Indian J. Hort. 71(3), 2014, Performance of strawberry cultivars under sub-tropics of Meghalaya (Umiam, 2005–07) — Indian J. Agric. Sci. 78(7), 2008. संपादकीय नीति.