Festival
फ़्लोरिडा विश्वविद्यालय (2000) की रोज़ा लिंडा × ओसो ग्रांडे के क्रॉस से बनी। भारत के परीक्षणों में बिहार में इसने सबसे अच्छी पैदावार दी (सबौर में 355.04 ग्राम प्रति पौधा, सुपौल में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर)। हिमाचल में दूसरी सबसे अच्छी (29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर)। और वहाँ सबसे बड़े फल (14.94 और 16.75 ग्राम)।
ज़रूरी तथ्य
- फसल
- स्ट्रॉबेरी
- प्रकार
- रनर पौधा (टिशू-कल्चर / प्रमाणित)
- सीज़न
- रबी
- पकने की अवधि
- लगभग 150–170 दिन
- अपेक्षित उपज
- सबौर, बिहार में 355.04 ग्राम प्रति पौधा; सुपौल, बिहार में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर; हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर; असम के पहाड़ों में 169.0 ग्राम प्रति पौधा।
- उपयुक्त मिट्टी
- जैविक पदार्थ से भरपूर, अच्छी निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी, pH 5.7–6.5
- रोग-प्रतिरोध
- कोई खास रोग-प्रतिरोध का दावा नहीं
- जारी
- फ़्लोरिडा विश्वविद्यालय ने बनाई और 2000 में जारी की
असली उपज बुवाई के समय, मिट्टी, सिंचाई, मौसम, बीज की गुणवत्ता और फ़सल की देखभाल पर निर्भर करती है।
इस किस्म के बारे में
फ़ेस्टिवल को फ़्लोरिडा विश्वविद्यालय ने बनाया और 2000 में रोज़ा लिंडा × ओसो ग्रांडे के क्रॉस से जारी किया। UF/IFAS की तथ्य-पुस्तिका इसे मध्यम आकार, चौड़े शंकु वाले, गहरे लाल, कड़े गूदे के फल वाली और मध्य दिसंबर से मार्च तक फलने वाली बताती है। हमारी पहुँच के स्रोत इसे डे-न्यूट्रल नहीं कहते, और वे इसका दिन-लंबाई वर्ग भी नहीं देते। बिहार में सबौर में तीन किस्मों में यह सबसे अच्छी रही, 355.04 ग्राम प्रति पौधा, और फल सबसे बड़ा, 3.93 सेंटीमीटर। सुपौल ज़िले में इसने 15.26 टन प्रति हेक्टेयर दिया, वहाँ सबसे अच्छा। हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में यह चैंडलर के बाद दूसरे नंबर पर रही, 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर के साथ, और इसके फल सबसे बड़े और सबसे कड़े थे, 14.94 और 16.75 ग्राम। असम के पहाड़ों में इसने 169.0 ग्राम प्रति पौधा, 14.68 ग्राम का फल और तीन किस्मों में सबसे जल्दी पहली तुड़ाई दी।
क्या यह किस्म आपके लिए ठीक है?
बिहार के मैदानों या पहाड़ों में खेती करते हैं और बड़े, कड़े फल और अच्छी पैदावार चाहिए, तो फ़ेस्टिवल चुनिए। सबौर में 355.04 ग्राम प्रति पौधा, सुपौल में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर। हिमाचल में 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर। मिठास ही आपकी बिक्री का आधार है तो इसे मत चुनिए: असम के पहाड़ों में इसका TSS 7.00 °ब्रिक्स था, चैंडलर (7.80) और स्वीट चार्ली (7.92) से कम। मिठास के लिए स्वीट चार्ली लीजिए, और बिहार में 1 दिसंबर की जगह 1 नवंबर को लगाइए।
बुवाई और खेती
- बुवाई का समयबिहार (BAU सबौर): फ़ेस्टिवल और स्वीट चार्ली का नतीजा 1 दिसंबर की तुलना में 1 नवंबर की रोपाई पर बेहतर रहा। असम के पहाड़: सभी किस्मों के लिए चार तारीख़ों में 15 नवंबर सबसे अच्छी रही।
- दूरी30×30 सेमी, 1–1.2 मी चौड़ी उठी क्यारियों पर काली प्लास्टिक मल्च के आर-पार
- उर्वरकक्यारी बनाते समय गोबर की खाद के साथ फॉस्फोरस और पोटाश की आधार खुराक। नाइट्रोजन लगभग 3 हफ़्ते पर और फूल आने पर बाँटकर दें, और पूरा पोटाश फूल आने पर (पूरी सारणी फसल गाइड में देखें)
कीट और रोग संबंधी बातें
मुख्य कीट
फ़ायदे और ध्यान रखने योग्य बातें
किसान इसे क्यों चुन सकते हैं
- सबौर, बिहार में तीन किस्मों में सबसे अच्छी पैदावार (355.04 ग्राम प्रति पौधा) और सुपौल में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर।
- हिमाचल के परीक्षण में सबसे बड़े और सबसे कड़े फल: 14.94 और 16.75 ग्राम।
- हिमाचल में चैंडलर के बाद दूसरी (29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर), और असम के पहाड़ों में तीन में सबसे जल्दी पहली तुड़ाई।
ध्यान रखने योग्य बातें
- असम के पहाड़ों में चैंडलर और स्वीट चार्ली से कम TSS (7.00 °ब्रिक्स) और ज़्यादा खटास (0.65%)।
- ICAR की जारी की हुई नहीं। हर साल प्रमाणित रनर ख़रीदिए।
- रोपाई की तारीख़ मायने रखती है: बिहार में फ़ेस्टिवल का नतीजा 1 दिसंबर की तुलना में 1 नवंबर की रोपाई पर बेहतर रहा।
उपयुक्त क्षेत्र
अमेरिका की लाई हुई किस्म है, ICAR की जारी की हुई नहीं। महाबलेश्वर में उगाई जाती है और ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे गरम पूर्वी राज्यों में सफलता से परखी गई है।
- महाराष्ट्र
- ओडिशा
- छत्तीसगढ़
1 दिसंबर नहीं, 1 नवंबर को लगाइए
BAU सबौर के एक परीक्षण (2012–13) में रोपाई की तारीख़ ने नतीजा उतना ही बदला जितना किस्म ने। विंटर डॉन, फ़ेस्टिवल और स्वीट चार्ली 15 अक्टूबर, 1 नवंबर, 15 नवंबर और 1 दिसंबर को लगाई गईं। 1 नवंबर ने सबसे ज़्यादा फल और सबसे ज़्यादा प्रति पौधा पैदावार दी। 1 दिसंबर ने सबसे कम वृद्धि और सबसे कम फल दिया।
फ़ेस्टिवल के लिए यही उसके सबसे अच्छे नतीजे की तारीख़ थी, 355.04 ग्राम प्रति पौधा। फ़ेस्टिवल और स्वीट चार्ली 1 नवंबर पर बेहतर रहीं। विंटर डॉन 15 अक्टूबर पर सबसे अच्छी रही।
इसलिए बिहार या ऐसे मैदान में हैं तो रनर मँगाते समय कैलेंडर पर 1 नवंबर चिह्नित कर लीजिए। नर्सरी से अक्टूबर के आख़िरी हफ़्ते में डिलीवरी माँगिए। दिसंबर में लगे देर के रनर किस्म चाहे जो हो, कम कमाई देते हैं।
क्या अपनी रोपाई सामग्री ख़ुद रख सकते हैं?
यह धावक (रनर) से बढ़ाई जाती है — वे फैलने वाली शाखाएँ, जो ज़मीन छूकर वहीं जड़ पकड़ लेती हैं। स्वस्थ मातृ पौधों से अपने पौधे तैयार किए जा सकते हैं, पर रनर के साथ विषाणु और क्राउन रॉट आगे चले जाते हैं, इसलिए ज़्यादातर किसान हर एक-दो साल में नए प्रमाणित रनर ख़रीदते हैं, अपने ही पौधों से लगातार चलाते नहीं रहते।
दूसरी किस्मों से तुलना
स्ट्रॉबेरी की वे सभी किस्में, जिनका पेज इस साइट पर है, एक साथ देखें। जो किस्म आप अभी देख रहे हैं, उसकी पंक्ति रंग से अलग दिखती है।
| किस्म | किसके लिए ठीक | पकने की अवधि | उपज | राज्य |
|---|---|---|---|---|
| Camarosa | पहाड़ों और ठंडे मैदानों के किसानों के लिए कड़ा, गहरा लाल फल, जो वहाँ लगाया जाता है जहाँ इसका रिकॉर्ड अच्छा है, यह मानकर नहीं कि वह सबसे ज़्यादा उपज देगा | लगभग 150–170 दिन | मेघालय में 245.2 ग्राम प्रति पौधा, महाबलेश्वर में 540 ग्राम (21.65 टन प्रति हेक्टेयर)। नतीजे जगह के साथ बदलते हैं। | महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली |
| Chandler | पहाड़ों और ठंडे मैदानों की परखी हुई स्ट्रॉबेरी, जो जल्दी फल के लिए नहीं बल्कि हिमाचल और असम के परीक्षणों में अपने रिकॉर्ड के लिए चुनी जाती है | लगभग 150–170 दिन | हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 35.10 और 40.08 टन प्रति हेक्टेयर (2012, 2013); असम के पहाड़ों में 186.8 ग्राम प्रति पौधा। | हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा |
| Festivalयही पेज | बिहार के मैदानों और पहाड़ों के लिए बड़े फल और ज़्यादा पैदावार वाली स्ट्रॉबेरी, जो फल के आकार और पैदावार के लिए चुनी जाती है, मिठास के लिए नहीं | लगभग 150–170 दिन | सबौर, बिहार में 355.04 ग्राम प्रति पौधा; सुपौल, बिहार में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर; हिमाचल के मध्यम पहाड़ों में 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर; असम के पहाड़ों में 169.0 ग्राम प्रति पौधा। | महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़ |
| Nabila | महाबलेश्वर जैसे हालात के लिए मीठा, बड़े फल वाला फल, जो TSS और प्रति पौधा वज़न के लिए चुना जाता है, और जिसका भारतीय परीक्षण-रिकॉर्ड पतला है | लगभग 150–170 दिन | महाबलेश्वर, 2016 में 735 ग्राम प्रति पौधा (29.42 टन प्रति हेक्टेयर); इतालवी पेटेंट में 850–900 ग्राम प्रति पौधा। | महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़ |
| Sweet Charlie | मीठी, जल्दी फूलने वाली स्ट्रॉबेरी, जो स्वाद पर बेची जाती है, और जो TSS और फलों की गिनती के लिए लगाई जाती है, सबसे भारी क्यारी के लिए नहीं | लगभग 140–160 दिन | असम के पहाड़ों में 182.4 ग्राम प्रति पौधा (चैंडलर के बराबर); सबौर, बिहार में 22.48 फल प्रति पौधा। फल छोटे हैं। | महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली |
| Winter Dawn | ज़ोरदार, जल्दी लगाने वाली किस्म: महाराष्ट्र और बिहार के लिए ज़्यादा फल देने वाली सर्दी की स्ट्रॉबेरी, जो प्रति पौधा फलों की संख्या और जल्दी शुरुआत के लिए चुनी जाती है | लगभग 150–170 दिन | महाबलेश्वर, 2016 में 820 ग्राम प्रति पौधा (32.97 टन प्रति हेक्टेयर), 21.00 ग्राम के 39.20 फल | महाराष्ट्र |
इस फ़सल के कैलकुलेटर
आगे के हिसाब यहाँ कर लीजिए — कितना बीज ख़रीदें, बोरा अंकुरित होगा या नहीं, खाद का ख़र्च कितना बैठेगा, और स्ट्रॉबेरी का भाव क्या चल रहा है।
- बीज दर कैलकुलेटरआपके स्ट्रॉबेरी के खेत के लिए कितना बीज चाहिए — आपके बोरे के अंकुरण के हिसाब से सुधारा हुआ।
- बीज किस्म खोजकइस साइट की हर स्ट्रॉबेरी किस्म को राज्य, सीज़न, अवधि और मिट्टी से छानिए।
- खाद कैलकुलेटरस्ट्रॉबेरी की एनपीके सिफ़ारिश को अपने खेत के हिसाब से यूरिया, डीएपी और एमओपी के बोरों में बदलिए।
- फ़सल लाभ कैलकुलेटरबीज, मज़दूरी और लागत को इस किस्म से मिलने वाली उपज के सामने रखकर देखिए।
- मंडी भाव जाँचकव्यापारी से भाव तय करने से पहले अपनी नज़दीकी मंडी में स्ट्रॉबेरी का आज का रेट देखिए।
सब्सिडी और सरकारी मदद
स्ट्रॉबेरी के बीज या रोपण सामग्री की लागत में मदद करने वाली योजनाएँ। नियम और आवेदन का तरीक़ा हर योजना के पेज पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फेस्टिवल के लिए "डे-न्यूट्रल" का क्या मतलब है और भारत में यह क्यों मायने रखता है?
स्ट्रॉबेरी की ज़्यादातर क्लासिक किस्में "छोटे दिन" वाली हैं, जिनमें फूल तभी आते हैं जब सर्दी में दिन की लंबाई एक सीमा से नीचे चली जाए। फेस्टिवल डे-न्यूट्रल की ओर झुकी है, यानी दिन की लंबाई और तापमान की बड़ी रेंज में फूलती और फलती है। इसीलिए यह सिर्फ़ महाबलेश्वर में ही नहीं, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे गरम पूर्वी राज्यों में भी अच्छा करती है, जहाँ सर्दियाँ हल्की और कम साफ़ बँटी होती हैं।
क्या फ़ेस्टिवल डे-न्यूट्रल स्ट्रॉबेरी है?
हमारी पहुँच के स्रोत ऐसा नहीं कहते। UF/IFAS की तथ्य-पुस्तिका फ़ेस्टिवल की मूल किस्में (रोज़ा लिंडा × ओसो ग्रांडे), 2000 की रिलीज़ और मध्य दिसंबर से मार्च की फलन अवधि देती है, पर इसे डे-न्यूट्रल नहीं कहती। यह डे-न्यूट्रल की तरफ़ झुकी है, ऐसे दावे का कोई स्रोत नहीं है। व्यवहार में भारतीय किसान इसे बाक़ी सर्दी की किस्मों की तरह पतझड़ में लगाते हैं।
बिहार में फ़ेस्टिवल कब लगाऊँ?
BAU सबौर (2012–13) में फ़ेस्टिवल और स्वीट चार्ली का नतीजा 1 दिसंबर की तुलना में 1 नवंबर की रोपाई पर बेहतर रहा, दिसंबर की रोपाई पर वृद्धि और पैदावार सबसे कम रही। विंटर डॉन 15 अक्टूबर पर सबसे अच्छी रही। फ़ेस्टिवल का सबसे अच्छा नतीजा, 355.04 ग्राम प्रति पौधा, 1 नवंबर की रोपाई से आया। नवंबर के पहले हफ़्ते में लगाइए और क्यारियों को मल्च और सिंचाई में रखिए।
फ़ेस्टिवल के फल कितने बड़े और कड़े होते हैं?
हिमाचल के परीक्षण में फ़ेस्टिवल के फल सबसे लंबे (42.17 और 43.90 मिमी), सबसे भारी (14.94 और 16.75 ग्राम) और सबसे कड़े थे। सबौर, बिहार में इसका फल सबसे बड़ा, 3.93 सेंटीमीटर, था, विंटर डॉन के बराबर। UF की तथ्य-पुस्तिका फल को मध्यम आकार और कड़ा कहती है। बड़े और कड़े फल उस किसान को सूट करते हैं जो दूर बेचता है।
फ़ेस्टिवल की स्वीट चार्ली से तुलना कैसी है?
फ़ेस्टिवल ज़्यादा वज़न देती है; स्वीट चार्ली ज़्यादा फल और ज़्यादा मिठास। सबौर में फ़ेस्टिवल ने 355.04 ग्राम प्रति पौधा दिया। स्वीट चार्ली ने सबसे ज़्यादा फल दिए, 22.48 प्रति पौधा, पर फल सबसे छोटा, और TSS, शक्कर और विटामिन C सबसे ज़्यादा। असम के पहाड़ों में फ़ेस्टिवल ने 169.0 ग्राम और स्वीट चार्ली ने 182.4 ग्राम दिया, TSS 7.00 और 7.92 °ब्रिक्स। दोनों लगाइए और मीठी वाली को स्वाद पर बेचिए।
फ़ेस्टिवल से कितनी पैदावार की उम्मीद रखूँ?
यह जगह और साल पर निर्भर है। परीक्षणों में सबौर में 355.04 ग्राम प्रति पौधा, सुपौल में 15.26 टन प्रति हेक्टेयर, हिमाचल में 29.76 और 35.24 टन प्रति हेक्टेयर और असम के पहाड़ों में 169.0 ग्राम प्रति पौधा मिला। परीक्षणों में पौधों की दूरी भी अलग थी। अपने सबसे नज़दीक की जगह का आँकड़ा लीजिए और पहले साल कम की उम्मीद रखिए।
स्रोत: Performance of strawberry varieties in different planting environments, Strawberry farming in India: top varieties, cultivation & profit, Effect of planting dates on plant growth, yield and quality in strawberry varieties in subtropics of eastern India — Indian J. Agric. Sci. 87(12), 2017 (BAU Sabour), Evaluation of strawberry cultivars, Supaul district, Bihar — Asian J. Hort. (Das et al.), Comparative performance of strawberry cultivars under mid-hill conditions of north-western Himalayas — Indian J. Hort. 71(3), 2014, 'Strawberry Festival' strawberry — UF/IFAS fact sheet HS1199. संपादकीय नीति.
