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मध्यमअपडेट 23 सितंबर 2026

लौंग (लवंग)

Syzygium aromaticum

बीज से पौध बनाकर उगाया जाने वाला, हाथ से कली-कली तोड़ा जाने वाला एक लंबी उम्र का उष्णकटिबंधीय मसाला पेड़, जो भारत में लगभग सिर्फ़ पश्चिमी घाट की नम पहाड़ियों — कन्याकुमारी (तमिलनाडु), केरल व कर्नाटक — में उगता है। पूरा खेल धैर्य व देखभाल का है: छोटी उम्र में छाया व लगातार नमी, पहली कलियाँ लगभग चार से छह साल बाद, और कोई औपचारिक रूप से जारी किस्म नहीं — इसलिए पौध व उसके मातृ-पेड़ की गुणवत्ता किसी भी ब्रांड नाम से ज़्यादा मायने रखती है।

Clusters of green, unopened clove flower buds on a Syzygium aromaticum (clove) tree among glossy leaves, Yercaud, Tamil Nadu — photo courtesy Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

त्वरित सारांश

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त्वरित सारांश

लौंग (Syzygium aromaticum) एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार पेड़ की सूखी, बिना खिली फूल-कली है। भारत में यह पश्चिमी घाट के कुछ नम पहाड़ी इलाक़ों में ही उगती है — सबसे मशहूर तमिलनाडु का कन्याकुमारी ज़िला, जिसकी लौंग को भौगोलिक संकेत (GI) पंजीकरण मिला है — साथ ही केरल, कर्नाटक व अंडमान-निकोबार के कुछ हिस्से। भारत अपनी ज़रूरत की लौंग का बहुत छोटा हिस्सा ही उगाता है; दुनिया की ज़्यादातर फ़सल इंडोनेशिया से आती है।

लौंग धीमी, धैर्य वाली फ़सल है। यह बीज से उगाई जाती है, जिसे ताज़ा ही बोना पड़ता है क्योंकि वह टिकता नहीं। पौध लगभग दो साल छायादार नर्सरी में पलती है और बरसात में, छाया पहले से तैयार रखकर, खेत में लगाई जाती है। छोटे पेड़ नाज़ुक होते हैं — उन्हें छाया व सूखे महीनों में नियमित पानी चाहिए। पहली कलियाँ कई साल बाद आती हैं और पूरी फ़सल और भी देर से, पर अच्छी देखभाल वाला पेड़ दशकों तक फलता रहता है।

भारत में कोई औपचारिक रूप से जारी लौंग किस्म नहीं है। किसान अच्छे, ज़्यादा फलने वाले मातृ-पेड़ों की स्थानीय पौध लगाते हैं, और शोध संस्थाएँ कन्याकुमारी से जुटाई मोटी-कली व बौने चयनों को अभी परख रही हैं। सफलता किस्म के नाम से नहीं, जगह से तय होती है — गर्म, नम, अच्छी निकासी वाली, सुरक्षित जगह — और शुरुआती देखभाल से।

कलियाँ बंद रहते हुए हाथ से कई दौर में तोड़ी जाती हैं, फिर कुछ दिन धूप में सुखाई जाती हैं जब तक वे गहरी व कड़क न हो जाएँ। मुख्य जोखिम हैं: सूखे या जलभराव के बाद अचानक मुरझाना, छोटे पौधों में पत्ती सड़न, और तना बेधक। कोई MSP नहीं है; फ़सल व्यापारियों व केरल की कुछ मंडियों में बिकती है और भाव बहुत ऊपर-नीचे होते हैं।

फसल प्रकार
बारहमासी उष्णकटिबंधीय सदाबहार मसाला पेड़
सीज़न
बरसात (जून–दिसंबर) में रोपाई; कलियाँ लगभग सितंबर से फ़रवरी तक तोड़ी जाती हैं
उपयुक्त राज्य
तमिलनाडु (कन्याकुमारी), केरल, कर्नाटक
पहली कलियाँ
लगभग वर्ष 4 से फूल; लगभग वर्ष 6 से काम की तुड़ाई
जल आवश्यकता
लगातार नमी; सूखे महीनों में ड्रिप या थाले से पानी
तापमान
गर्म व नम; औसत लगभग 20–30°C
मिट्टी
गहरी, ह्यूमस-भरपूर, अच्छी निकासी वाली दोमट या लैटेराइट; कभी जलभराव नहीं
कठिनाई स्तर
मध्यम (लंबा इंतज़ार; जगह व छाया सबसे ज़रूरी)
अपेक्षित उपज
परिपक्व पेड़ से लगभग 2–4 किग्रा सूखी कलियाँ
मुख्य जोखिम
सूखे या जलभराव के बाद अचानक मुरझाना; छोटे पौधों को छाया चाहिए

परिचय

लौंग (Syzygium aromaticum), हिंदी में लौंग व तमिल में किरम्बु या लवंगम, इंडोनेशिया के मलूकू द्वीपों के एक सदाबहार पेड़ की सूखी फूल-कली है। कलियाँ खिलने से पहले, जब पूरी बढ़ जाएँ व उन पर गुलाबी रंगत आए, तोड़ी व धूप में सुखाई जाती हैं। भारत का अपना उत्पादन छोटा है — शोध साहित्य के अनुसार लगभग 1,183 टन सालाना, जबकि दुनिया भर में लगभग 1.8 लाख टन, जिसमें इंडोनेशिया सबसे आगे है — इसलिए भारत में लौंग का बाग़ एक विशेष फ़सल है, बड़ी मंडी की फ़सल नहीं।

भारत में लौंग पश्चिमी घाट की नम पहाड़ियों व अंडमान-निकोबार तक सीमित है। तमिलनाडु का कन्याकुमारी ज़िला (वीरपुली व महेंद्रगिरि के आसपास मरमलै, करुम्परै व वेल्लिमलै के जंगल-क्षेत्र) देश की फ़सल का बड़ा हिस्सा देता है, और कन्याकुमारी लौंग भौगोलिक संकेत (GI) के रूप में पंजीकृत है। बाक़ी हिस्सा केरल की लाल मिट्टी वाले मध्य इलाक़ों व कर्नाटक की ऊँची पहाड़ियों से आता है। पेड़ आमतौर पर मिश्रित बाग़ों में, अक्सर सुपारी, नारियल व अन्य पेड़ों की आंशिक छाया में उगते हैं, और छोटे पौधों के लिए अस्थायी छाया के तौर पर केला लगता है।

चूँकि हर पौध बीज से आती है और पेड़ ज़्यादातर स्व-परागण वाला है, भारतीय लौंग का आनुवंशिक आधार संकरा है और कोई औपचारिक रूप से जारी किस्म नहीं है। तमिलनाडु व केरल के सर्वेक्षणों में अधिक उपज वाले नमूने जुटाए गए हैं, और कन्याकुमारी से "किंग" मोटी-कली प्रकार व एक बौना प्रकार तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के शोध केंद्रों में परखे जाने की जानकारी है — पर ये शोध चयन हैं, आज मँगाई जा सकने वाली किस्में नहीं। किसान के असली चुनाव हैं: जगह, छाया की योजना व वे मातृ-पेड़ जिनसे बीज आया।

फसल की समयरेखा, बुवाई से कटाई तक

पूरे सीज़न की एक झलक — हर अवस्था की पूरी जानकारी के लिए नीचे संबंधित सेक्शन पर जाएँ।

  1. रोपाई से पहले (6–12 महीने)

    पहले छाया

    केला, बबूल या अल्बीज़िया जैसे छाया-पौधे लौंग की पौध लगाने से बहुत पहले लगाए जाते हैं, ताकि छोटे पेड़ तेज़ धूप में नहीं, छाया में उतरें।

  2. नर्सरी (लगभग 2 साल)

    बीज से पौध

    ताज़ा बीज तुरंत बोया जाता है क्योंकि वह टिकता नहीं; जमने में लगभग 5–6 हफ़्ते लगते हैं। खेत में लगाने से पहले पौध लगभग दो साल छायादार नर्सरी में रहती है।

  3. वर्ष 0 (जून–दिसंबर)

    खेत में रोपाई

    दो साल पुरानी पौध बरसात में तैयार गड्ढों में लगभग 6–7 मीटर की दूरी पर लगाई जाती है, केले या अस्थायी मंडप से छाया देकर।

  4. वर्ष 1–3

    जमाव

    सूखे महीनों (जनवरी–मई) में नियमित पानी, मल्च, छाया, निराई व थोड़ी पहली खाद छोटे पेड़ को मज़बूत करती है। सूखे व जलभराव से सबसे ज़्यादा नुकसान इसी दौर में होता है।

  5. वर्ष 4–6

    पहली कलियाँ

    फूल लगभग चौथे साल से आने लगते हैं और पहली काम की तुड़ाई लगभग छठे साल में, शुरू में छोटी फ़सल के साथ।

  6. वर्ष 7–15+

    बढ़ती फ़सल

    उपज धीरे-धीरे बढ़ती है और पेड़ लगभग 15वें साल तक पूरी उपज पर पहुँचते हैं। अच्छी देखभाल वाला पेड़ कई दशक फलता रहता है।

  7. हर मौसम

    कली के दौर व सुखाई

    कलियाँ अगेती (सितंबर–अक्टूबर), मध्य (नवंबर–दिसंबर) व पछेती (जनवरी–फ़रवरी) लहरों में बनती हैं, इसलिए तुड़ाई कई दौर में होती है। तोड़ी कलियाँ लगभग 4–7 दिन धूप में सुखाई जाती हैं।

उपयुक्त राज्य

जिन राज्यों में यह फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, वे नीचे हाइलाइट हैं। आपके खेत के लिए अंतिम सलाह हमेशा आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही देगा।

  • जम्मू और कश्मीर
  • हिमाचल प्रदेश
  • पंजाब
  • उत्तराखंड
  • हरियाणा
  • दिल्ली
  • उत्तर प्रदेश
  • राजस्थान
  • बिहार
  • झारखंड
  • पश्चिम बंगाल
  • सिक्किम
  • असम
  • अरुणाचल प्रदेश
  • मेघालय
  • नागालैंड
  • मणिपुर
  • मिज़ोरम
  • त्रिपुरा
  • गुजरात
  • मध्य प्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • महाराष्ट्र
  • ओडिशा
  • गोवा
  • तेलंगाना
  • आंध्र प्रदेश
  • कर्नाटक
  • केरल
  • तमिलनाडु
  • पुदुचेरी
  • लद्दाख
  • चंडीगढ़
  • लक्षद्वीप

यहाँ उगाई जाती है

जलवायु की ज़रूरतें

उपयुक्त ऊँचाई समुद्र-तल के पास से पश्चिमी घाट में लगभग 1,000 मी तक है। गर्म, नम, अच्छे पानी वाले इलाक़े से बाहर लौंग कमज़ोर दाँव है, चाहे पौध कितनी भी अच्छी हो।

  • आदर्श तापमान

    लौंग सख़्ती से उष्णकटिबंधीय पेड़ है जिसे गर्म, नम मौसम चाहिए — औसत तापमान लगभग 20–30°C। यह ठंडी, पाले वाली या बहुत सूखी जगहों पर ठीक नहीं होती, इसीलिए यह पश्चिमी घाट की पहाड़ियों व द्वीपों तक सीमित है।

  • वर्षा

    सालाना लगभग 1,500–2,500 मिमी की अच्छी बँटी बारिश उपयुक्त है (TNAU 150–250 सेमी बताता है)। सूखे महीनों में फिर भी पानी देना पड़ता है, पर जड़ें पानी में बैठी रहें तो पेड़ ख़राब होता है।

  • नमी

    ऊँची नमी, लगभग 70% से ऊपर, पेड़ के प्राकृतिक माहौल का हिस्सा है और कलियाँ बनने में मदद करती है। वही नमी नर्सरी व छोटे पौधों में पत्ती सड़न व दूसरे फफूँद रोगों को बढ़ावा भी देती है।

  • धूप

    छोटे पौधों को छाया चाहिए — केला या अस्थायी मंडप — और लौंग आम तौर पर सुपारी, नारियल व फलदार पेड़ों की आंशिक छाया में उगाई जाती है। बड़े पेड़ ज़्यादा रोशनी सह लेते हैं, पर सुरक्षित, कम हवा वाली जगह सबसे अच्छी है।

मिट्टी की ज़रूरतें

सुरक्षित, अच्छी निकासी वाली, ह्यूमस-भरपूर जगह चुनें जहाँ सूखे महीनों के लिए भरोसेमंद पानी हो। अच्छी मिट्टी व छाया की योजना में से एक चुनना पड़े तो दोनों ही लें — शुरुआती सालों में लौंग कोई भी ग़लती माफ़ नहीं करती।

  • उपयुक्त मिट्टी

    गहरी, ह्यूमस-भरपूर दोमट व लैटेराइट मिट्टी सबसे उपयुक्त है (TNAU); गहरी लाल दोमट व गहरे उप-स्तर वाली कंकरीली मिट्टी भी चलती है। केरल की लाल मध्य-इलाक़े की मिट्टी व कन्याकुमारी की पहाड़ी मिट्टी इस फ़सल के पारंपरिक घर हैं।

  • pH स्तर

    ह्यूमस-भरपूर जंगल व लैटेराइट मिट्टी जैसी हल्की अम्लीय से लगभग उदासीन मिट्टी लौंग को सूट करती है; तेज़ क्षारीय या खारे हिस्सों से बचें।

  • जल निकासी

    अच्छी निकासी ज़रूरी है। जलभराव अवांछित है, और सूखा व जलभराव दोनों पेड़ के अचानक मुरझाने से जुड़े हैं, इसलिए अच्छी निकासी वाली ढलानें, मल्च व लगातार पानी सबसे अच्छे रहते हैं।

  • जैविक तत्व

    भरपूर जैविक खाद सिफ़ारिश का हिस्सा है — रोपाई पर गड्ढे में कम्पोस्ट या गोबर की खाद जाती है और हर साल दोहराई जाती है, पेड़ की उम्र के साथ बढ़ाकर।

खेत की तैयारी

क्षेत्र चाहे जो हो, चार कदम वही रहते हैं — बस समय बुवाई के अनुसार बदलता है।

  1. 1

    पहले छाया लगाएँ

    लौंग की पौध लगाने से 6 से 12 महीने पहले केला, बबूल, अल्बीज़िया या ऐसे ही छाया-पौधे लगाएँ, ताकि छोटे पेड़ छाया व हवा-रोक में उतरें।

  2. 2

    ग्रिड चिह्नित करें व गड्ढे खोदें

    पेड़ दोनों दिशाओं में लगभग 6–7 मी की दूरी पर रखें (लगभग 80–110 पेड़ प्रति एकड़)। बारिश से काफ़ी पहले गड्ढे खोदें; TNAU 30 सेमी घन और कर्नाटक मसाला बोर्ड 75 सेमी घन बताता है, इसलिए सख़्त, कंकरीली या लैटेराइट ज़मीन पर गड्ढा बड़ा रखें।

  3. 3

    ऊपरी मिट्टी व जैविक खाद से भरें

    हर गड्ढा ऊपरी मिट्टी में कम्पोस्ट या गोबर की खाद (TNAU: प्रति गड्ढा लगभग 10 किग्रा) मिलाकर भरें और रोपाई से पहले बैठने दें।

  4. 4

    सूखे महीनों के लिए पानी का इंतज़ाम

    रोपाई से पहले ही ड्रिप या थाला-सिंचाई की योजना बनाएँ। नाज़ुक छोटे पेड़ों को जनवरी–मई में मौसम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

बीज की जानकारी

मुख्य किस्मों की तुलना — अवधि, उपज, रोग-प्रतिरोध या आप किस मक़सद से उगा रहे हैं, इसके आधार पर चुनें।

किस्मअवधिउपजरोग-प्रतिरोधसर्वश्रेष्ठ राज्यकिसके लिए उपयुक्त

स्थानीय भारतीय लौंग (पौध)

भारत में मानक रोपण-सामग्री: कन्याकुमारी–पश्चिमी घाट पट्टी के अच्छे, ज़्यादा फलने वाले मातृ-पेड़ों के बीज से उगाई पौध, जो केरल कृषि विश्वविद्यालय जैसे राज्य व विश्वविद्यालय नर्सरियों व निजी नर्सरियों में बिकती है। भारतीय लौंग एक संकरे मूल-भंडार से आई, इसीलिए पेड़ों के बीच बहुत कम अंतर मिलता है।

पहली कलियाँ लगभग वर्ष 4–6; लगभग वर्ष 15 तक पूरा फलनपरिपक्व पेड़ से लगभग 2–4 किग्रा सूखी कलियाँकिस्म-स्तर की कोई रोग-प्रतिरोधकता दर्ज नहीं; नुकसान जगह, छाया व नमी-प्रबंधन से तय होता हैतमिलनाडु, केरल, कर्नाटकनम पहाड़ी व मध्य-इलाक़ों में आंशिक छाया वाले मिश्रित बाग़

किंग लौंग (KC-1, KC-2) व बौना (DC-1) चयन — परख जारी

कन्याकुमारी के मरमलै व कीरिपराई इलाक़ों से जुटाए मोटी-कली "किंग" प्रकार व एक बौना प्रकार, जिन्हें तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के शोध केंद्रों में परखे जाने की जानकारी है। ये शोध चयन हैं, औपचारिक रूप से जारी किस्में नहीं; नामी किस्म की उम्मीद करने की जगह किसी राज्य नर्सरी से पूछें कि मोटी-कली वाले मातृ-पेड़ों की पौध मिलती है या नहीं।

परख जारीस्थापित नहीं — परख के आँकड़े उपलब्ध स्रोतों में प्रकाशित नहींउपलब्ध स्रोतों में दस्तावेज़ीकृत नहींतमिलनाडु (कन्याकुमारी)जो किसान मोटी-कली वाले मातृ-पेड़ चुनना चाहते हैं
बीज दर
लौंग दो साल पुरानी नर्सरी पौध के रूप में लगाई जाती है, खेत में बोई नहीं जाती। 6–7 मी दूरी पर लगभग 80–110 पौध प्रति एकड़ के साथ, पहले दो सालों में ख़ाली जगह भरने के लिए कुछ अतिरिक्त रखें।
प्रमाणित बीज
देखने के लिए कोई प्रमाणित लौंग किस्म या बीज-मानक नहीं है। पौध राज्य बागवानी विभाग या विश्वविद्यालय नर्सरी से लें (केरल कृषि विश्वविद्यालय लौंग की पौध बेचता है), जाँच लें कि पौध स्वस्थ व गहरी हरी है और पत्ती के किनारों पर धब्बे नहीं हैं, और अपना बीज लें तो केवल स्वस्थ, ज़्यादा फलने वाले पेड़ों से लें व ताज़ा ही बोएँ।
दूरी
दोनों दिशाओं में लगभग 6–7 मी, ऊपरी मिट्टी व कम्पोस्ट से भरे गड्ढों में, छाया पहले से तैयार रखकर।
बीज उपचार
लौंग का बीज कम उम्र का होता है: पके फल ("लौंग की माँ") से निकालें और तुरंत बो दें। नर्सरी में मुरझाई पौध उखाड़कर नष्ट करें और TNAU की सलाह के अनुसार क्यारी में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.25% से ड्रेंचिंग करें, क्योंकि नर्सरी में मृत्यु दर ऊँची हो सकती है।

बुवाई गाइड

छाया-पौधे उगने व गड्ढे की मिट्टी बैठ जाने के बाद ही लगाएँ; सूखे दौर में खुली धूप में लगाई पौध पहले साल में लौंग का पौधा खोने का सबसे आम तरीक़ा है।

सबसे अच्छा समय
दो साल पुरानी पौध बरसात में लगाएँ — TNAU जून से दिसंबर सबसे अच्छा पाता है — जब छाया जम चुकी हो और मिट्टी ख़ूब गीली हो।
क़तार की दूरी
पंक्तियों के बीच लगभग 6–7 मी
पौधे की दूरी
पंक्ति में पेड़ों के बीच लगभग 6–7 मी
बुवाई की गहराई
पौध को उसी गहराई पर बिठाएँ जिस पर वह नर्सरी में थी, आसपास की मिट्टी हल्के से दबाएँ और गड्ढे में पानी खड़ा न रहने दें।
तरीक़ा
हर तैयार गड्ढे में एक स्वस्थ पौध, तुरंत पानी दें, फिर केले, मंडप या पत्तों से छाया दें और पहले सूखे मौसम में नम रखें।

खाद कार्यक्रम

बुवाई के समय एक साथ पूरी खाद डालने से बँटी हुई मात्रा बेहतर है — खासकर नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा हवा में उड़ जाता है या रिसकर बह जाता है।

  1. 1

    रोपाई पर (बेसल)

    वर्ष 0

    गड्ढे में ऊपरी मिट्टी के साथ कम्पोस्ट या गोबर की खाद (TNAU: लगभग 10 किग्रा)। कर्नाटक मसाला बोर्ड केरल कृषि विश्वविद्यालय की सारणी बताता है: छोटे पौधे के लिए प्रति पौधा प्रति वर्ष लगभग 20:18:50 ग्राम N:P:K व लगभग 15 किग्रा कम्पोस्ट।

  2. 2

    छोटे पेड़

    वर्ष 1–6

    पेड़ बढ़ने के साथ हर साल खुराक धीरे-धीरे बढ़ाएँ। खाद दो दौर में दें — मानसून की शुरुआत व अंत में — और थाले में मल्च बिछाएँ।

  3. 3

    फलदार पेड़

    लगभग वर्ष 7 से

    TNAU सात साल के फलदार पेड़ के लिए लगभग 300:300:960 ग्राम N:P:K व लगभग 50 किग्रा गोबर की खाद प्रति पेड़ बताता है; कर्नाटक मसाला बोर्ड द्वारा उद्धृत KAU सारणी परिपक्व पेड़ (वर्ष 15+) के लिए लगभग 300:250:750 ग्राम व 50 किग्रा कम्पोस्ट है। पोटाश की माँग सबसे भारी है।

  4. 4

    जैव-उर्वरक

    खाद देने के एक महीने बाद

    TNAU खाद देने के एक महीने बाद प्रति पेड़ लगभग 50-50 ग्राम एज़ोस्पिरिलम व फ़ॉस्फ़ोबैक्टीरिया डालने की सलाह देता है।

सिंचाई कार्यक्रम

  1. 1. छोटे पेड़

    सूखे महीने (जनवरी–मई)

    TNAU जनवरी से मई में ड्रिप या थाले से प्रति पेड़ लगभग 8 लीटर पानी की सलाह देता है; कर्नाटक मसाला बोर्ड एक ड्रिप परीक्षण में प्रति पौधा रोज़ लगभग 8 लीटर पर सबसे अच्छी बढ़वार बताता है।

  2. 2. फलदार पेड़

    सूखे दौर

    लंबे सूखे दौर में जड़-क्षेत्र को बराबर नम रखें। सूखा व जलभराव दोनों पेड़ के अचानक मुरझाने से जुड़े हैं।

महत्वपूर्ण अवस्थाएँ

  • रोपाई के बाद पहले दो सूखे मौसम
  • कली बनने से पहले व उसके दौरान के सूखे महीने
  • किसी भी उम्र में लंबे सूखे दौर

पानी बचाने के तरीक़े

  • ढलान पर थाले में पानी भरने की जगह ड्रिप सिंचाई लगाएँ।
  • थाले में पत्तों या फ़सल-अवशेष का मल्च बिछाएँ ताकि नमी टिके व जड़ें ठंडी रहें।
  • पानी का नुकसान घटाने के लिए छाया-पेड़ व पवन-रोधक बनाए रखें।

खरपतवार प्रबंधन

जैविक नियंत्रण

  • हर छोटे पेड़ के आसपास थाला साफ़ रखें और खरपतवार दबाने के लिए मल्च इस्तेमाल करें।
  • लैंटाना व पार्थेनियम को बीज बनने से पहले काटें, और कटे हुए को मल्च की तरह इस्तेमाल करें।
  • शुरुआती सालों में केला जैसी छाया-सहने वाली अंतर-फ़सल ज़मीन को ढके रखती है।

रासायनिक नियंत्रण

  • हर छोटे पेड़ के थाले में हाथ या कुदाल से निराई करें; छोटे पौधों की पतली छाल पर या उसके पास खरपतवारनाशी से बचें।
  • बड़े बाग़ की पंक्तियों के बीच खरपतवारनाशी ज़रूरी हो तो वर्तमान में पंजीकृत दवा व मात्रा अपने राज्य बागवानी विभाग या KVK से पक्की करें।

पोषक तत्व की कमी की पहचान

हर पोषक तत्व की कमी पौधे पर असल में कैसी दिखती है — ताकि ग़लत स्प्रे करने से पहले आप कमी और रोग में फ़र्क़ कर सकें।

ध्यान देने योग्य रोग

लक्षण, संभावित कारण और असल में क्या इलाज करता है — सिर्फ़ किसी स्प्रे का नाम नहीं।

ध्यान देने योग्य कीट

नुक़सान दिखने से पहले क्या देखें, और रसायन से पहले जैविक विकल्प क्या हैं।

आम ग़लतियाँ जिनसे बचें

जो ग़लतियाँ किसानों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती हैं, खेत में जितनी बार दिखती हैं उसी क्रम में — हमेशा वैसे नहीं जैसा आप सोचें।

  1. 1

    छाया तैयार किए बिना खुली धूप में पौध लगाना।

    नुक़सान क्यों होता है

    छोटे लौंग पेड़ नाज़ुक होते हैं; छाया-पौधे (केला, बबूल, अल्बीज़िया) रोपाई से 6–12 महीने पहले उग चुके होने चाहिए, नहीं तो पौध पहले सूखे मौसम में झुलसकर मर जाती है।

  2. 2

    जड़-क्षेत्र को सूखे व जलभराव के बीच झूलने देना।

    नुक़सान क्यों होता है

    दोनों छोर पेड़ के अचानक मुरझाने व मौत से जुड़े हैं, और एक बार पेड़ सूख गया तो बचता नहीं। बराबर पानी दें, मल्च बिछाएँ, और निकासी ठीक करें।

  3. 3

    सूख चुका लौंग बीज बोना या रखना।

    नुक़सान क्यों होता है

    लौंग बीज की उम्र छोटी होती है और उसे ताज़ा ही बोना चाहिए; पुराना बीज कम जमता है और नर्सरी के दो साल बर्बाद करता है।

  4. 4

    नामी किस्म या जल्दी आमदनी की उम्मीद रखना।

    नुक़सान क्यों होता है

    भारत में कोई औपचारिक रूप से जारी लौंग किस्म नहीं है, और पेड़ पहली कलियाँ लगभग चार से छह साल में और सबसे अच्छी फ़सल बहुत बाद देता है। "ख़ास किस्म" ऊँचे दाम पर मिलना ख़तरे की घंटी है; जानी-पहचानी नर्सरी से स्वस्थ पौध लें।

  5. 5

    गर्म, नम इलाक़े से बाहर लगाना।

    नुक़सान क्यों होता है

    लौंग सख़्ती से उष्णकटिबंधीय है और भारत में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों व द्वीपों तक सीमित है; ठंडी, सूखी या हवादार जगह पर प्रबंधन कितना भी अच्छा हो, यह कमज़ोर ही रहेगी।

  6. 6

    फूल खिल जाने के बाद तोड़ना।

    नुक़सान क्यों होता है

    क़ीमत बंद, पूरी बढ़ी कली में है। पंखुड़ियाँ खिलते ही कली लौंग नहीं रहती और कम बिकती है, इसलिए खिलने से पहले कई दौर में तोड़ें।

कटाई

फूल लगभग चौथे साल से आने लगते हैं और काम की तुड़ाई लगभग छठे साल से। कलियाँ पकने में लगभग चार से छह महीने लेती हैं और तब तोड़ी जाती हैं जब पूरी बढ़ चुकी हों पर बंद हों, गुलाबी रंगत के साथ। वे अगेती (सितंबर–अक्टूबर), मध्य (नवंबर–दिसंबर) व पछेती (जनवरी–फ़रवरी) लहरों में बनती हैं, इसलिए तुड़ाई मौसम भर कई दौर में होती है।

तैयार होने के संकेत

  • कलियाँ पूरी बढ़ी हैं पर अभी बंद हैं, गुलाबी रंगत के साथ
  • गुच्छा पंखुड़ियाँ खिलने से पहले तैयार है
  • पेड़ के उस हिस्से की फूल-लहर के बाद कलियों का एक दौर पक चुका है

उपकरण

  • ऊँचे पेड़ों के लिए मज़बूत सीढ़ी या सुरक्षित चढ़ने का सहारा
  • गुच्छे गिराने व छाँटने के लिए साफ़ तिरपाल या चटाई
  • पूरी धूप वाला साफ़ सुखाने का आँगन या रैक

अपेक्षित उपज

TNAU प्रति पेड़ लगभग 2–3 किग्रा सूखी कलियाँ बताता है, और कर्नाटक मसाला बोर्ड वर्ष 15 के बाद परिपक्व पेड़ से लगभग 3–4 किग्रा। उपज उम्र के साथ धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए प्रति एकड़ किसी भी आँकड़े को मोटा अनुमान मानें — 6–7 मी दूरी पर एक परिपक्व एकड़ में लगभग 80–110 पेड़ होते हैं।

कटाई के बाद व भंडारण

  • भंडारण

    कलियों को तब तक सुखाएँ जब तक वे गहरी व कड़क न हो जाएँ, फिर साफ़, सूखे, हवा-रोधी डिब्बों में नमी से दूर रखें; सूखी रखी जाए तो सूखी लौंग अच्छी टिकती है।

  • पैकेजिंग

    कलियों को गुच्छे की डंडी से अलग करें, खिली या टूटी कलियाँ छाँट दें, और सूखी कलियाँ बिक्री के लिए साफ़ बोरियों या डिब्बों में भरें।

  • परिवहन

    सूखी लौंग सघन व हल्की होती है, ढोना आसान; फ़सल आमतौर औपचारिक मंडी की जगह स्थानीय व्यापारियों व क्षेत्रीय मसाला बाज़ारों को बिकती है।

  • भंडारण अवधि

    ठीक से सुखाई व सूखी रखी लौंग अपनी ख़ुशबू लंबे समय तक बनाए रखती है; नमी दुश्मन है।

मंडी भाव

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मुनाफ़ा कैलकुलेटर

आपकी अपनी लागत, अपेक्षित उपज और बिक्री भाव — हमारी नहीं।

पैसा कहाँ जाता है

नीचे कैलकुलेटर की डिफ़ॉल्ट लागत के अनुसार प्रति एकड़ कुल लागत में हर मद का हिस्सा — वहाँ अपने आँकड़े बदलने पर यह तस्वीर पूरी तरह आप पर लागू नहीं रहेगी, पर क्रम शायद ही बदलता है।

  • मज़दूरी56% (₹40,000)
  • खाद11% (₹8,000)
  • ज़मीन का किराया11% (₹8,000)
  • सिंचाई8% (₹6,000)
  • बीज6% (₹4,000)
  • कीटनाशक और खरपतवारनाशक4% (₹3,000)
  • ब्याज3% (₹2,000)
  • मशीन1% (₹500)

आधिकारिक डाउनलोड

केवल सरकार और ICAR के दस्तावेज़ — नीचे की हर चीज़ किसी आधिकारिक सर्वर पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कौन-सी लौंग किस्म लगानी चाहिए?

भारत में कोई औपचारिक रूप से जारी लौंग किस्म नहीं है। लौंग अच्छे, ज़्यादा फलने वाले मातृ-पेड़ों के बीज से उगाई स्थानीय पौध के रूप में लगाई जाती है, जो राज्य व विश्वविद्यालय नर्सरियों व निजी नर्सरियों में बिकती है। कन्याकुमारी के मोटी-कली "किंग" प्रकार (KC-1, KC-2) व बौने प्रकार (DC-1) को तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के शोध केंद्रों में परखे जाने की जानकारी है, पर वे शोध चयन हैं, मँगाई जा सकने वाली किस्में नहीं। किसी भरोसेमंद नर्सरी से स्वस्थ पौध लें और "ख़ास किस्म" ऊँचे दाम पर बेचने वाले से सावधान रहें।

लौंग के पेड़ से फ़सल कब मिलती है, और कितनी?

फूल लगभग चौथे साल से आने लगते हैं और काम की तुड़ाई लगभग छठे साल से, शुरू में छोटी फ़सल के साथ। TNAU प्रति पेड़ लगभग 2–3 किग्रा सूखी कलियाँ बताता है, और कर्नाटक मसाला बोर्ड वर्ष 15 के बाद परिपक्व पेड़ से लगभग 3–4 किग्रा। पेड़ दशकों जीता व फलता है, पर पहले साल पूरी तरह निवेश हैं, इसलिए लंबे इंतज़ार की योजना बनाएँ।

भारत में लौंग कहाँ उगाई जा सकती है?

सिर्फ़ गर्म, नम पहाड़ी व द्वीप इलाक़ों में। तमिलनाडु का कन्याकुमारी ज़िला देश की ज़्यादातर फ़सल देता है, और कन्याकुमारी लौंग एक पंजीकृत भौगोलिक संकेत (GI) है। बाक़ी केरल व कर्नाटक में होती है, और अंडमान-निकोबार के कुछ हिस्सों में भी उगती है। पेड़ को लगभग 1,500–2,500 मिमी बारिश, औसत 20–30°C तापमान व लगभग 1,000 मी तक की ऊँचाई चाहिए, इसलिए यह मैदानों या सूखे इलाक़ों की फ़सल नहीं है।

क्या लौंग का कोई MSP या तय मंडी भाव है?

नहीं। लौंग पर कोई MSP नहीं है। यह व्यापारियों व क्षेत्रीय मसाला बाज़ारों में बिकती है और भाव बहुत ऊपर-नीचे होते हैं: सितंबर 2026 में थोक भाव लगभग ₹900 प्रति किग्रा बताए गए, और केरल की मंडियाँ जैसे थोडुपुझा, कट्टप्पना व मुन्नार लौंग के भाव कभी-कभार ही देती हैं। इस पेज को लिखने वाले दिन सरकारी Agmarknet आँकड़ों की एक लाइव जाँच में लौंग की कोई पंक्ति नहीं मिली, इसलिए मंडी आँकड़ों को कम मानें और बेचने से पहले व्यापारियों के मौजूदा भाव जाँच लें।

क्या नारियल या सुपारी के नीचे अंतर-फ़सल के रूप में लौंग उगा सकता हूँ?

हाँ। लौंग आमतौर अंतर-फ़सल या मिश्रित बाग़ों के हिस्से के रूप में उगाई जाती है, अक्सर सुपारी, नारियल व फलदार पेड़ों की आंशिक छाया में। छोटे पौधों को छाया चाहिए, और केला आमतौर अस्थायी छाया की फ़सल है। पक्का करें कि छोटे पेड़ों को सूखे महीनों में नियमित पानी मिलता रहे।

मेरा लौंग का पेड़ अचानक क्यों मुरझा जाता है?

अचानक मुरझाना लौंग की जानी-पहचानी समस्या है, जो जड़ों के आसपास सूखे या जलभराव के तनाव से जुड़ी है। रोकथाम इलाज से कहीं बेहतर है: छाया, मल्च, लगातार सिंचाई (ढलान पर ड्रिप), पवन-रोधक व अच्छी निकासी। अभी सिर्फ़ पीलापन शुरू हुआ हो तो TNAU जड़-क्षेत्र में कार्बेन्डाज़िम या मैन्कोज़ेब 1 ग्राम प्रति लीटर से ड्रेंचिंग की सलाह देता है; जो पेड़ पूरा सूख चुका उसे बचाया नहीं जा सकता।

अब भी कोई सवाल है?

आम सवालों के जवाब ऊपर FAQs में हैं। आपके खेत और मिट्टी से जुड़ी किसी भी ख़ास बात के लिए आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही आधिकारिक जवाब है।