दालचीनी
Cinnamomum verum
भीतरी छाल के लिए उगाया जाने वाला मज़बूत सदाबहार मसाला पेड़, जिसे ज़मीन के पास से काटकर झाड़ी की तरह रखा जाता है और 18 से 24 महीने पुरानी टहनियों की छाल साल में दो बार उतारी जाती है — पहली छोटी फ़सल लगभग तीन साल में, जमने के बाद सिंचाई लगभग न के बराबर, और कमाई भारी उपज से नहीं, हुनरमंद छिलाई से आती है।

त्वरित सारांश
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त्वरित सारांश
दालचीनी (Cinnamomum verum) तेजपात कुल के एक सदाबहार पेड़ की सूखी भीतरी छाल है। भारत में यह पश्चिमी घाट की निचली पट्टी में उगती है — केरल के कन्नूर, कोझिकोड व कोट्टायम, तमिलनाडु की निचली नीलगिरि, यरकौड व कन्याकुमारी की पहाड़ियाँ, दक्षिण कर्नाटक का तट, महाराष्ट्र का कोंकण और असम की नागा पहाड़ियाँ।
पेड़ जिलाना आसान है, फ़सल अच्छी करना मुश्किल। यह कमज़ोर लैटेराइट व रेतीली मिट्टी में भी चल जाता है, समुद्र तल से लगभग एक हज़ार मीटर तक उगता है, और पहले दो-तीन गर्मियों के बाद लगभग पूरी तरह बारिश पर रहता है। पैसा छाल तय करती है: टहनियाँ काटी जाती हैं, ख़ास चाकू से हाथ से छाल उतारी जाती है, उसे लपेटकर, खुरचकर सुखाकर क्विल (नली) बनाई जाती है, और नली जितनी पतली व साफ़, ग्रेड उतना ऊँचा।
रोपण-सामग्री आमतौर पर पौध होती है। दालचीनी का बीज जल्दी मर जाता है, इसलिए उसे ताज़ा ही बरसात में बोया जाता है, नर्सरी में लगभग साल भर छाया में पाला जाता है, और मानसून में गड्ढों में रोपा जाता है। लगभग दो साल की उम्र पर पौधे को ज़मीन के पास से काट दिया जाता है — कॉपिसिंग — ताकि ठूँठ से सीधी बग़ल की टहनियों की झाड़ी निकले, और उसके बाद वही टहनियाँ फ़सल हैं।
भारत में चार चुनी हुई किस्में मिलती हैं: ICAR-IISR कोझिकोड की IISR नवश्री व IISR नित्यश्री, TNAU यरकौड की YCD 1, और पेचिपराई की PPI (Ci) 1। कटाई साल में दो बार, मई व नवंबर के आसपास। कोई MSP नहीं है, और नियमित भाव सिर्फ़ मुंबई APMC से आते हैं, इसलिए ज़्यादातर किसान व्यापारी, मसाला कंपनी या तेल आसवन इकाई को बेचते हैं।
- फ़सल प्रकार
- बारहमासी उष्णकटिबंधीय सदाबहार मसाला पेड़, काटकर झाड़ी के रूप में रखा गया
- मौसम
- मानसून के साथ जून-जुलाई में रोपाई; छाल की कटाई मई व नवंबर में
- उपयुक्त राज्य
- केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र (कोंकण), असम
- पहली कटाई
- लगभग वर्ष 3 (कर्नाटक मसाला बोर्ड) या वर्ष 4–5 (TNAU); आर्थिक उम्र 20 साल या ज़्यादा
- पानी की ज़रूरत
- कम — ज़्यादातर बारिश पर; पहले 2–3 साल ही गर्मी में हफ़्ते में दो बार
- तापमान
- गर्म व नम, औसत लगभग 27°C; समुद्र तल से लगभग 1,000 मी तक
- मिट्टी
- ह्यूमस वाली रेतीली या लैटेराइट मिट्टी; कमज़ोर तटीय ज़मीन भी सह लेती है
- कठिनाई
- मध्यम (उगाना आसान, छिलाई व ग्रेडिंग हुनर का काम)
- सामान्य उपज
- पूरी उपज पर लगभग 225–300 किग्रा क्विल/हे प्रति वर्ष; पहली फ़सल 65–125 किग्रा
- मुख्य जोखिम
- लंबा सूखा, और ख़राब छिलाई जिससे पूरा माल नीचे ग्रेड में चला जाए
परिचय
दालचीनी (Cinnamomum verum, पहले C. zeylanicum) तेजपात कुल (Lauraceae) का घना सदाबहार पेड़ है। अपने आप छोड़ दें तो यह 6 से 15 मीटर तक जाता है, पर खेती में इसे काटकर नीची झाड़ी बनाए रखते हैं, क्योंकि फ़सल छोटी टहनियों की भीतरी छाल है — न लकड़ी, न फल। छाल व पत्ती दोनों ख़ुशबूदार हैं और दोनों से तेल निकलता है: छाल के तेल में सिनेमैल्डिहाइड होता है जो मीठी, तीखी ख़ुशबू देता है, और पत्ती का तेल ज़्यादातर यूजेनॉल है, जो लौंग के क़रीब है।
यह जानना ज़रूरी है कि आप लगा क्या रहे हैं। असली दालचीनी Cinnamomum verum है, जो श्रीलंका व मालाबार तट की देशी है। भारतीय रसोई में जो दालचीनी बिकती है वह ज़्यादातर कैसिया की मोटी, सख़्त छाल होती है — C. cassia, C. burmannii या C. loureirii — जो चीन, इंडोनेशिया व वियतनाम से आती है; और तेजपात तीसरी प्रजाति C. tamala है। तीनों अलग पेड़ हैं, दाम अलग, ख़रीदार अलग, इसलिए पौध ख़रीदने से पहले प्रजाति पक्की करें।
भारत में खेती पश्चिमी घाट की निचली ऊँचाइयों पर है — केरल के कन्नूर, कोझिकोड व कोट्टायम ज़िले और तमिलनाडु की निचली नीलगिरि परंपरागत पट्टी हैं; साथ में दक्षिण कर्नाटक का तट, यरकौड व कन्याकुमारी की पहाड़ियाँ, महाराष्ट्र का कोंकण तट और असम की नागा पहाड़ियाँ। रक़बा छोटा है: मसाला बोर्ड की अपनी मसालेवार रक़बा-उत्पादन सारणी (2022-23, तीसरा अग्रिम अनुमान) में लौंग, जायफल व इमली की पंक्तियाँ हैं, दालचीनी की अलग पंक्ति नहीं — इसी से पता चलता है कि देश की फ़सल कितनी पतली है। किसान के लिए इसके दोनों पहलू हैं: मुक़ाबला कम, पर भाव का सहारा भी कोई नहीं।
ज़्यादातर मसाला पेड़ों से उलट, दालचीनी में बड़े पेड़ का इंतज़ार करने का फ़ायदा नहीं। रोपाई के लगभग तीसरे साल से पौधे को काटकर ठूँठ बना दिया जाता है और उससे निकली टहनियाँ हर 18 से 24 महीने में छाल के लिए काटी जाती हैं। अच्छी देखभाल वाला बाग़ 20 साल तक चलता है (TNAU का YCD 1 के लिए आँकड़ा) और पेचिपराई की PPI (Ci) 1 के बारे में कहा गया है कि पेड़ 50 साल तक रखा जा सकता है, यानी यह लंबी उम्र की पूँजी है जो जल्दी देना शुरू करती है और देती रहती है।
फसल की समयरेखा, बुवाई से कटाई तक
पूरे सीज़न की एक झलक — हर अवस्था की पूरी जानकारी के लिए नीचे संबंधित सेक्शन पर जाएँ।
- दिसंबर – जनवरी
मातृ पेड़ों पर फूल
मातृ पेड़ों पर दिसंबर-जनवरी में फूल आते हैं; फल मई से जून में पकते हैं, तभी अगली नर्सरी का बीज इकट्ठा होता है।
- मई – जून
बीज इकट्ठा करना
फल तब तोड़े जाते हैं जब बाहरी गूदा काला पड़ जाए; उन्हें छाया में ढेर करके गूदा गलाया जाता है, फिर धोकर छाया में हवा में सुखाया जाता है। बीज जल्दी मर जाता है, रखा नहीं जा सकता।
- जुलाई – अगस्त
नर्सरी में बुवाई
ताज़ा बीज उठी हुई क्यारियों में 12 सेमी की क़तारों में, या रेत-गोबर खाद-मिट्टी (3:3:1) भरी पॉलीथीन थैलियों में बोया जाता है। अंकुरण 15 से 20 दिन में। क्यारी पर छाया रखें।
- नर्सरी (10–12 महीने)
पौध तैयार करना
क्यारी की पौध अंकुरण के लगभग चार महीने बाद, या 15 सेमी ऊँची होने पर, पॉलीबैग में जाती है। लगभग छह महीने की उम्र तक कृत्रिम छाया रखें। 10 से 12 महीने पर पौध खेत के लिए तैयार।
- जून – जुलाई (वर्ष 0)
खेत में रोपाई
लगभग 50–60 सेमी घन के गड्ढे 2 × 2 मी या 3 × 3 मी पर खोदकर ऊपरी मिट्टी व लगभग 10 किग्रा गोबर खाद से भरें; मानसून के साथ पौध या जड़दार कलम आंशिक छाया में लगाएँ।
- वर्ष 1–2
जमाव
पहली दो-तीन गर्मियों में हफ़्ते में दो बार पानी, साल में दो निराई, बची हुई पत्तियों की मल्च, और हर साल बढ़ने वाली थोड़ी खाद।
- लगभग वर्ष 2
कॉपिसिंग (कटाई-छँटाई)
पौधा लगभग 2 मीटर का हो जाए तो उसे ज़मीन से लगभग 15 सेमी ऊपर से काट दें। ठूँठ से सीधी बग़ल की टहनियों का गुच्छा निकलता है, और ठूँठ के चारों ओर मिट्टी चढ़ाने से और ज़्यादा टहनियाँ फूटती हैं।
- वर्ष 3–5
पहली छाल कटाई
कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड पहली कटाई रोपाई के तीन साल बाद बताता है; TNAU चौथे या पाँचवें साल। पहली फ़सल छोटी होती है — लगभग 65 से 125 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर।
- हर 18–24 महीने, मई व नवंबर
कटाई के दौर
18 से 24 महीने पुरानी, लगभग 1 से 2 मीटर लंबी व 1 से 2.5 सेमी मोटी टहनियाँ मई व फिर नवंबर में काटी जाती हैं, छीली, लपेटी, खुरची व सुखाई जाती हैं। ठूँठ से नई टहनियाँ उनकी जगह ले लेती हैं।
- वर्ष 10–11 से आगे
पूरी उपज
तैयार बाग़ साल में लगभग 225 से 300 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर देता है, साथ में लगभग 70 किग्रा क्विलिंग व फ़ेदरिंग, और 20 साल या उससे ज़्यादा चलता है।
उपयुक्त राज्य
जिन राज्यों में यह फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, वे नीचे हाइलाइट हैं। आपके खेत के लिए अंतिम सलाह हमेशा आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही देगा।
- जम्मू और कश्मीर
- हिमाचल प्रदेश
- पंजाब
- उत्तराखंड
- हरियाणा
- दिल्ली
- उत्तर प्रदेश
- राजस्थान
- बिहार
- झारखंड
- पश्चिम बंगाल
- सिक्किम
- असम
- अरुणाचल प्रदेश
- मेघालय
- नागालैंड
- मणिपुर
- मिज़ोरम
- त्रिपुरा
- गुजरात
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- महाराष्ट्र
- ओडिशा
- गोवा
- तेलंगाना
- आंध्र प्रदेश
- कर्नाटक
- केरल
- तमिलनाडु
- पुदुचेरी
- लद्दाख
- चंडीगढ़
- लक्षद्वीप
- अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह
- दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव
यहाँ उगाई जाती है
जलवायु की ज़रूरतें
यह समुद्र तल से लगभग 1,000 मीटर तक उगती है। YCD 1 की सिफ़ारिश 500 से 1,000 मीटर और 100 से 200 सेमी बारिश के लिए है, और PPI (Ci) 1 की 100 से 500 मीटर की कम ऊँचाई व ज़्यादा बारिश के लिए — अपनी ऊँचाई के हिसाब से किस्म चुनें।
आदर्श तापमान
लगभग 27°C औसत तापमान वाली गर्म, नम जलवायु दालचीनी को सूट करती है। श्रीलंका के सबसे अच्छे बाग़ कम ऊँचाई पर हैं जहाँ औसत 30°C के क़रीब रहता है। लंबा सूखा फ़सल को रोक देता है, इसीलिए पश्चिमी घाट की तलहटी व तट भीतरी मैदानों से बेहतर बैठते हैं।
वर्षा
फ़सल ज़्यादातर बारिश पर चलती है, और साल भर में अच्छी तरह बँटी लगभग 150 से 250 सेमी (1,500–2,500 मिमी) बारिश सबसे उपयुक्त मानी जाती है। श्रीलंका के बाग़ों को 200 से 250 सेमी मिलती है।
नमी
नम, तटीय हवा पेड़ को रास आती है — समुद्र की नज़दीकी और हल्का खारा पानी तक इसके लिए अच्छा बताया गया है। वही नमी नर्सरी में पत्ती धब्बा व डाई-बैक शुरू कराती है, इसलिए क्यारियों में हवा व जगह चाहिए।
धूप
शुरुआती सालों में आंशिक छाया से बढ़वार तेज़ व स्वस्थ होती है; तैयार झाड़ियाँ खुली धूप सह लेती हैं। जंगली दालचीनी 1,800 मीटर तक के सदाबहार जंगल में उगती है, इसलिए छायादार, हवा से बची जगह इसके स्वभाव के क़रीब है।
मिट्टी की ज़रूरतें
दालचीनी कमज़ोर ज़मीन पर भी जी लेगी, पर छाल की उपज व मोटाई ह्यूमस के साथ चलती है। सिर्फ़ खाद के पीछे भागने के बजाय ठूँठ के चारों ओर मल्च व गोबर खाद से मिट्टी बनाएँ।
उपयुक्त मिट्टी
ह्यूमस से भरी रेतीली या लैटेराइट मिट्टी सबसे उपयुक्त है (TNAU)। पश्चिमी तट पर दालचीनी ऐसी लैटेराइट व रेतीली ज़मीन पर उगाई जाती है जिसमें पोषक तत्व कम हैं और जो सब्ज़ी की फ़सल नहीं सँभाल सकती — यही इसकी ख़ासियत है।
pH स्तर
लैटेराइट व ह्यूमस वाली जंगली मिट्टी की हल्की अम्लीय प्रकृति इसे रास आती है। यह मज़बूत पौधा है और कई तरह की मिट्टी सह लेता है, इसलिए यहाँ मिट्टी जाँच से ज़्यादा मायने निकासी व जैविक पदार्थ रखते हैं।
जल निकासी
छोटे पौधों के लिए खुली निकासी ज़रूरी है। ढलान पर हर गड्ढे से ढलान की ओर नाली निकालें — छोटी पौध के चारों ओर खड़ा पानी उसे मार देता है।
जैविक तत्व
खुराक का ज़्यादातर हिस्सा जैविक खाद से आता है: गड्ढे में लगभग 10 किग्रा गोबर खाद, छोटे पौधे के लिए साल में 20 किग्रा, और दस साल व उससे ऊपर के पौधे के लिए साल में 50 किग्रा तक, साथ में खरपतवार, घास व आसवन के बाद बची पत्तियों की मल्च।
खेत की तैयारी
क्षेत्र चाहे जो हो, चार कदम वही रहते हैं — बस समय बुवाई के अनुसार बदलता है।
- 1
ज़मीन साफ़ करें व निशान लगाएँ
जगह साफ़ करके 2 × 2 मी (TNAU) या 3 × 3 मी (कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड) पर गड्ढों के निशान लगाएँ। पास-पास लगाने से छाल के लिए ज़्यादा ठूँठ बैठते हैं; दूर-दूर लगाने से काम व अंतरवर्ती फ़सल आसान रहती है।
- 2
मानसून से पहले गड्ढे खोदें
बारिश से पहले लगभग 50 सेमी घन (कर्नाटक मसाला बोर्ड) से 60 सेमी घन (TNAU) के गड्ढे खोद लें ताकि मिट्टी बैठ व पक जाए।
- 3
ऊपरी मिट्टी व खाद से भरें
हर गड्ढा ऊपरी मिट्टी में लगभग 10 किग्रा गोबर खाद या कम्पोस्ट मिलाकर भरें। कई किसान एक गड्ढे में एक से ज़्यादा पौध लगाते हैं — कर्नाटक का पैकेज पाँच तक की छूट देता है — ताकि ठूँठ का गुच्छा शुरू से घना रहे।
- 4
छाया व निकासी की व्यवस्था
शुरुआती सालों के लिए आंशिक छाया का इंतज़ाम करें, और ढलान वाली ज़मीन पर हर गड्ढे से ढलान की ओर नाली काटें ताकि छोटे पौधे के पास कभी पानी न ठहरे।
बीज की जानकारी
मुख्य किस्मों की तुलना — अवधि, उपज, रोग-प्रतिरोध या आप किस मक़सद से उगा रहे हैं, इसके आधार पर चुनें।
| किस्म | अवधि | उपज | रोग-प्रतिरोध | सर्वश्रेष्ठ राज्य | किसके लिए उपयुक्त |
|---|---|---|---|---|---|
ICAR-IISR कोझिकोड से जारी बीजू (सीडलिंग) चयन। इसके अपने किस्म पन्ने पर जारी वर्ष 1996 लिखा है जबकि संस्थान की किस्म-सारणी में 1995; वंशावली भी पन्ने पर "भारतीय संग्रह से बीजू चयन" और सारणी में "श्रीलंकाई संग्रह से" बताई गई है। ख़ासियत ज़्यादा टहनी-पुनर्जनन (चार पौधों पर 25.45 टहनियाँ) और भारतीय चयनों में सबसे ऊँची छाल रिकवरी 40.6%, छाल तेल 2.7%, पत्ती तेल 2.8% व छाल ओलियोरेज़िन 8.0%। | पहली कटाई लगभग 3 साल; फूल वर्ष 4 से | 200 किग्रा सूखी क्विल/हे, क्षमता 250 किग्रा/हे; प्रति पौधा 201.1 ग्राम सूखी छाल | कोई बड़ा कीट या रोग का हमला नहीं देखा गया (IISR) | भारत के सभी दालचीनी क्षेत्र | जो हर कटाई में सबसे अच्छी छाल रिकवरी चाहते हैं |
ICAR-IISR की दूसरी किस्म। यहाँ भी किस्म पन्ना (1996) व संस्थान की सारणी (1995) का वर्ष अलग है, और पन्ने पर इसे बीजू चयन व सारणी में क्लोनल चयन कहा गया है। भारतीय चयनों में सबसे ऊँचा छाल ओलियोरेज़िन 10.0%, छाल तेल 2.7%, पत्ती तेल 3.0%, और पत्ती तेल में 78% यूजेनॉल — पत्ती का तेल निकालने की सोच रहे हों तो यही बात सबसे काम की है। | पहली कटाई लगभग 3 साल; फूल वर्ष 4 से | 200 किग्रा सूखी क्विल/हे, क्षमता 250 किग्रा/हे; प्रति पौधा 194.6 ग्राम सूखी छाल | कोई बड़ा कीट या रोग का हमला नहीं देखा गया (IISR) | भारत के सभी दालचीनी क्षेत्र | बढ़िया क्विल और पत्ती-तेल आसवन |
TNAU के यरकौड केंद्र पर खुले परागण वाली पौध से किया गया चयन, 1995 में जारी। TNAU के अनुसार सूखी छाल 359.75 किग्रा क्विल व 3,800 किग्रा सूखी पत्ती प्रति हेक्टेयर, छाल रिकवरी 35.3%, क्विल में 2.8% व पत्ती में 3% उड़नशील तेल, और एक कटाई में 19.2 काटने लायक़ टहनियाँ। क्विल का स्वाद मीठा व हल्का तीखा। | तीसरे साल से कटाई; आर्थिक उम्र लगभग 20 साल | लगभग 360 किग्रा क्विल/हे के साथ 3,800 किग्रा सूखी पत्ती/हे | उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं | तमिलनाडु व कर्नाटक | 500–1,000 मी ऊँचाई व 100–200 सेमी बारिश वाले बाग़, और पत्ती-तेल आसवन |
TNAU के बागवानी अनुसंधान केंद्र, पेचिपराई में रखी खुले परागण वाली पौध से चयन, 2003 में जारी। TNAU इसे सूखा सहनशील, कीट व रोगों से बचा रहने वाला, हर 18 से 24 महीने में कटाई के लायक़ और 50 साल तक रखे जाने लायक़ बताता है। इसकी लगभग 980 किग्रा छाल प्रति हेक्टेयर की उपज — 248.42 किग्रा क्विल व 731.58 किग्रा चिप्स व चूरा — पेचिपराई लोकल से 25% ज़्यादा है। | हर 18–24 महीने में कटाई; पेड़ 50 साल तक | लगभग 980 किग्रा छाल/हे (248 किग्रा क्विल + 732 किग्रा चिप्स व चूरा) | TNAU के अनुसार कीट व रोगों से बचा रहने वाला और सूखा सहनशील | तमिलनाडु (कन्याकुमारी पट्टी) | 100–500 मी की कम ऊँचाई व ज़्यादा बारिश, और जो क्विल के साथ चिप्स-चूरा भी बेचते हैं |
कोंकण तेज व अन्य क्षेत्रीय चयन कोंकण तेज, डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विद्यापीठ, दापोली से, महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के लिए जारी है; सुगंधिनी व RRL (B) C-6 भी सरकारी किस्म सूचियों में मिलते हैं। इनमें से किसी के लिए जारी-वर्ष या उपज का प्रकाशित आँकड़ा जारी करने वाली संस्था से हम तक नहीं पहुँचा, इसलिए व्यापारिक वेबसाइटों पर दिए आँकड़े यहाँ नहीं दोहराए गए। ख़रीदने से पहले संबंधित विश्वविद्यालय या अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें। | उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं | उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं | उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं | कोंकण तेज के लिए महाराष्ट्र (कोंकण) | कोंकण के किसान जो स्थानीय रूप से जारी पौध चाहते हैं |
- बीज दर
- दालचीनी खेत में बोई नहीं जाती, 10 से 12 महीने की नर्सरी पौध या जड़दार कलम लगाई जाती है। 2 × 2 मी पर लगभग 2,500 गड्ढे प्रति हेक्टेयर (लगभग 1,000 प्रति एकड़) और 3 × 3 मी पर लगभग 1,100 गड्ढे प्रति हेक्टेयर (लगभग 450 प्रति एकड़) बैठते हैं। एक गड्ढे में कई पौध लगाने वाले उसी हिसाब से गुणा करें, और ख़ाली जगह भरने के लिए 10% पौध ज़्यादा रखें।
- प्रमाणित बीज
- गेहूँ या धान जैसी प्रमाणित बीज श्रेणी दालचीनी में नहीं होती। नाम वाली किस्म की पौध लें — ICAR-IISR कोझिकोड व उसकी कृषिधन नर्सरी से IISR नवश्री या IISR नित्यश्री, TNAU यरकौड से YCD 1, HRS पेचिपराई से PPI (Ci) 1 — या किसी जाने-पहचाने अच्छी उपज वाले मातृ पेड़ से तैयार पौध। और यह पक्का करें कि प्रजाति Cinnamomum verum है, कैसिया या तेजपात नहीं।
- दूरी
- 2 × 2 मी (TNAU) या 3 × 3 मी (कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड), 50 से 60 सेमी घन के गड्ढों में जो ऊपरी मिट्टी व गोबर खाद से भरे हों।
- बीज उपचार
- दालचीनी के बीज में न सुप्तावस्था होती है, न टिकाऊपन — गूदा हटते ही उसे बो देना चाहिए। फल तब तोड़ें जब बाहरी गूदा काला पड़े, छाया में ढेर करके गूदा गलाएँ, पूरे ढेर को रौंदकर धोएँ ताकि बीज अलग हो जाए, फिर हवा में सुखाएँ — धूप में कभी नहीं, क्योंकि धूप से बीज का छिलका फट जाता है। साफ़ बीज जुलाई-अगस्त में तुरंत बो दें।
बुवाई गाइड
जिस पेड़ पर भरोसा हो उसे बढ़ाना हो तो रिंग विधि की गूटी (एयर लेयरिंग), ज़मीनी लेयरिंग व पुराने ठूँठ का बँटवारा — तीनों चलते हैं; गूटी में जड़ें निकालने के लिए इंडोल एसिटिक या इंडोल ब्यूटिरिक एसिड 50 ppm मदद करता है। बीज के अलावा दूसरा आम रास्ता अर्ध-कठोर कलम है।
- सबसे अच्छा समय
- मानसून के साथ जून-जुलाई में रोपाई करें ताकि पौध बारिश के सहारे जम जाए। TNAU जून से दिसंबर तक का समय चलने लायक़ बताता है।
- क़तार की दूरी
- क़तारों के बीच 2 मी (TNAU) से 3 मी (कर्नाटक मसाला बोर्ड)
- पौधे की दूरी
- क़तार में पौधों के बीच 2 मी से 3 मी
- बुवाई की गहराई
- पौध को उसी गहराई पर लगाएँ जिस पर वह पॉलीबैग में थी, मिट्टी हल्के से दबाएँ, और ऐसा गड्ढा न छोड़ें जहाँ पानी ठहरे।
- तरीक़ा
- हर गड्ढे में 10 से 12 महीने की एक स्वस्थ पौध या जड़दार कलम — कर्नाटक का पैकेज घने गुच्छे के लिए एक गड्ढे में पाँच पौध तक की छूट देता है। कुछ किसान भरे गड्ढे में सीधे बीज भी डालते हैं। शुरुआती सालों में आंशिक छाया दें।
खाद कार्यक्रम
बुवाई के समय एक साथ पूरी खाद डालने से बँटी हुई मात्रा बेहतर है — खासकर नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा हवा में उड़ जाता है या रिसकर बह जाता है।
- 1
रोपाई पर (बेसल)
वर्ष 0
रोपाई से पहले हर गड्ढे में ऊपरी मिट्टी के साथ लगभग 10 किग्रा गोबर खाद या कम्पोस्ट।
- 2
पहला साल
वर्ष 1
प्रति पौधा लगभग 20 ग्राम N, 18 ग्राम P₂O₅ व 25 ग्राम K₂O, साथ में 20 किग्रा गोबर खाद (TNAU)। कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड भी यही NPK व 20 किग्रा गोबर खाद देता है।
- 3
हर साल बढ़ोतरी
वर्ष 2–9
हर साल प्रति पौधा लगभग 20 ग्राम N, 18 ग्राम P₂O₅ व 25 ग्राम K₂O और लगभग 2 किग्रा गोबर खाद जोड़ते जाएँ, ताकि खुराक झाड़ी के साथ बढ़े।
- 4
दसवें साल से आगे
वर्ष 10+
प्रति पौधा लगभग 200 ग्राम N, 180 ग्राम P₂O₅ व 250 ग्राम K₂O और 20 किग्रा गोबर खाद (TNAU); कर्नाटक बोर्ड 200:180:200 ग्राम प्रति पौधा व 50 किग्रा गोबर खाद या कम्पोस्ट देता है। 3 × 3 मी दूरी पर यह लगभग 200:180:200 किग्रा प्रति हेक्टेयर बैठता है।
- 5
खुराक बाँटना
मई–जून व सितंबर–नवंबर
खाद दो बार में दें, मानसून की शुरुआत पर और उसके बाद, ताकि हल्की लैटेराइट मिट्टी से पोषक तत्व बह न जाएँ।
सिंचाई कार्यक्रम
1. छोटे पौधे
गर्मी, पहले 2–3 साल
गर्मी के महीनों में हफ़्ते में दो बार पानी दें। कितना, यह मिट्टी की नमी व पौधे की बढ़वार पर है; मक़सद इतना है कि छोटी जड़ों का घेरा सूखे नहीं।
2. जमी हुई झाड़ियाँ
गर्मी के सूखे दौर
गर्मी में बचाव की सिंचाई फ़ायदेमंद है, पर रोज़ का काम नहीं — जमने के बाद दालचीनी बारिश की फ़सल है। फिर भी लंबा सूखा बढ़वार व अगली टहनी-फुटान घटा देता है।
महत्वपूर्ण अवस्थाएँ
- रोपाई के बाद की पहली दो-तीन गर्मियाँ
- हर कटाई या कॉपिसिंग के बाद का फुटान
- मई व नवंबर की कटाई से पहले का लंबा सूखा
पानी बचाने के तरीक़े
- ठूँठ के चारों ओर खरपतवार, घास या तेल आसवन के बाद बची पत्तियों की मल्च डालकर ऊपर मिट्टी चढ़ा दें — कर्नाटक का पैकेज इसे जड़ क्षेत्र की नमी रोकने का सबसे असरदार तरीक़ा बताता है।
- छोटे पौधों पर आंशिक छाया बनाए रखें, छतरी पूरी तरह न खोलें।
- अगस्त-सितंबर में झाड़ियों के चारों ओर एक बार मिट्टी गोड़ें ताकि बारिश बहने के बजाय भीतर जाए।
खरपतवार प्रबंधन
जैविक नियंत्रण
- हर ठूँठ के चारों ओर काटी हुई खरपतवार, घास व आसवन के बाद बची पत्तियों की मोटी मल्च डालें — इससे खरपतवार भी दबते हैं और नमी भी रुकती है।
- Lantana व Parthenium को बीज बनने से पहले काटें और काटन को मल्च में लगाएँ।
- छोटे पौधों के चारों ओर थाला साफ़ रखें और झाड़ी की छतरी को ज़मीन ढकने दें।
रासायनिक नियंत्रण
- दालचीनी में निराई हाथ या खुरपी से होती है — साल में दो बार, जून-जुलाई व अक्टूबर-नवंबर में, और अगस्त-सितंबर में एक बार झाड़ियों के चारों ओर गुड़ाई।
- खरपतवारनाशी दालचीनी के सिफ़ारिश किए पैकेज का हिस्सा नहीं है; बड़े ब्लॉक पर ज़रूरत पड़े तो छोटी टहनियों की पतली छाल के पास इस्तेमाल से पहले मौजूदा पंजीकृत दवा व मात्रा अपने राज्य के बागवानी विभाग या KVK से पक्की करें।
पोषक तत्व की कमी की पहचान
हर पोषक तत्व की कमी पौधे पर असल में कैसी दिखती है — ताकि ग़लत स्प्रे करने से पहले आप कमी और रोग में फ़र्क़ कर सकें।
नाइट्रोजन
दिखने वाला लक्षण
पुरानी पत्तियाँ पीली-हरी पड़ जाती हैं और कॉपिसिंग के बाद टहनियाँ पतली व धीमी निकलती हैं — हल्की, धुली लैटेराइट मिट्टी पर आम बात, जिस पर दालचीनी आमतौर पर लगती है।
फ़ॉस्फ़ोरस
दिखने वाला लक्षण
छोटे पौधे देर से जमते हैं और पुरानी पत्तियों पर फीकी, बैंगनी-सी झलक आ जाती है।
पोटैशियम
दिखने वाला लक्षण
पत्तियों के किनारे झुलसे या पीले, और टहनियाँ कमज़ोर व पतली जिनसे छाल ख़राब मिलती है; तैयार झाड़ी की सिफ़ारिश की गई खुराक में सबसे बड़ा हिस्सा पोटाश का ही है।
ध्यान देने योग्य रोग
लक्षण, संभावित कारण और असल में क्या इलाज करता है — सिर्फ़ किसी स्प्रे का नाम नहीं।
पिंक रोग (गुलाबी रोग)
- लक्षण
- बरसात में तने पर हल्की गुलाबी-सफ़ेद पपड़ी फैलती है, उसके नीचे की कॉर्क परत ख़त्म हो जाती है और ऊपर की टहनी सूख जाती है।
- कारण
- फफूँद Corticium javanicum, जिसे लगातार गीला मौसम पनपाता है।
- इलाज
- 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव इसे आसानी से क़ाबू कर लेता है (कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड)।
- बचाव
- झाड़ी खुली रखें ताकि बारिश के बाद भीतर सूख जाए, रोग वाली टहनियाँ जल्दी काटकर जलाएँ, और छिड़काव सबसे भारी बरसात के हफ़्तों से पहले करें, बाद में नहीं।
एंथ्रेक्नोज़ पत्ती धब्बा व डाई-बैक
- लक्षण
- नर्सरी की नई पत्तियों पर छोटे भूरे दाग़ बढ़ते-बढ़ते पत्ती सुखा देते हैं; फिर संक्रमण तने में जाकर उसे ऊपर से नीचे मारता है। बड़ी पौध व पेड़ों पर तने पर हल्के-गहरे भूरे गोल छल्ले बनते हैं और पत्तियों में छेद दिखते हैं। इसके अलावा नर्सरी में एक अलग झुलसा भी होता है, जिसमें तने पर हल्के भूरे धब्बे पड़ते हैं और पौध मर जाती है; वह Diplodia प्रजाति से होता है।
- कारण
- Colletotrichum gloeosporioides, जो गर्म-गीली नर्सरी में फैलता है।
- इलाज
- बरसात भर 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव (कर्नाटक मसाला बोर्ड)। यही छिड़काव, या 0.3% कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, बोर्ड Diplodia वाले पौध झुलसा के लिए भी बताता है। TNAU पत्ती धब्बे के लिए 1% बोर्डो मिश्रण या 0.25% कॉपर ऑक्सीक्लोराइड बताता है।
- बचाव
- नर्सरी क्यारियाँ ठूँसकर न भरें, निकासी रखें, दिन ढले पानी न दें, रोगी पौध निकालकर जलाएँ, और खेत में सिर्फ़ साफ़ पौध लगाएँ।
शैवाल पत्ती धब्बा (एल्गल लीफ़ स्पॉट)
- लक्षण
- पत्तियों पर उठे हुए, मख़मली नारंगी-सलेटी धब्बे, जो नम बाग़ों में आम हैं और अक्सर Gleosporium वाले भुरभुरे, धँसे गहरे भूरे धब्बों के साथ मिलते हैं।
- कारण
- परजीवी शैवाल Cephaleuros प्रजाति, जिसे छाया व पत्तियों का लगातार गीला रहना पनपाता है।
- इलाज
- 1% बोर्डो मिश्रण या 0.3% कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव (कर्नाटक मसाला बोर्ड)।
- बचाव
- घनी छाया छाँटें, झाड़ियों में इतनी जगह रखें कि पत्तियाँ सूखें, और बाग़ से पुरानी, ज़्यादा धब्बे वाली पत्तियाँ हटाएँ।
काजल फफूँद व ग्रे ब्लाइट
- लक्षण
- ग्रे ब्लाइट में पुरानी पत्तियों पर सलेटी मरे हुए धब्बे बनते हैं; काजल फफूँद काली कालिख-जैसी परत है जो पोंछने से उतर जाती है और आमतौर पर रस चूसने वाले कीटों के पीछे आती है।
- कारण
- ग्रे ब्लाइट के लिए Pestalotiopsis palmarum व काजल फफूँद के लिए Phragmocapnias betle।
- इलाज
- 1% बोर्डो मिश्रण या 0.3% कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पर्णीय छिड़काव इन पत्ती रोगों को क़ाबू करता है (कर्नाटक मसाला बोर्ड)।
- बचाव
- जिन रस चूसने वाले कीटों के सहारे काजल फफूँद जमती है उन्हें रोकें, और छतरी हवादार रखें।
ध्यान देने योग्य कीट
नुक़सान दिखने से पहले क्या देखें, और रसायन से पहले जैविक विकल्प क्या हैं।
दालचीनी तितली
- पहचान
- शरीर के किनारों पर गहरी धारियों वाली हल्की पीली इल्लियाँ, जो नए फुटान की कोमल पत्तियाँ खाती हैं।
- नुक़सान
- इल्लियाँ बहुत तेज़ी से खाती हैं और पौधे को पत्तियों से ख़ाली कर सकती हैं; जिस झाड़ी का नया फुटान चट हो गया, उन टहनियों से छाल की फ़सल कमज़ोर मिलती है।
- जैविक नियंत्रण
- फुटान छोटा रहते ही छोटे पौधों से इल्लियाँ हाथ से चुनें और नर्सरी पर नज़र रखें, क्योंकि पौध सबसे ज़्यादा भुगतती है।
- रासायनिक नियंत्रण
- 0.05% क्विनालफ़ॉस का छिड़काव (कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड)। छिड़काव से पहले मौजूदा पंजीकृत दवा व मात्रा अपने KVK से पक्की करें।
पत्ती सुरंगक (लीफ़ माइनर)
- पहचान
- कोमल पत्तियों के भीतर टेढ़ी-मेढ़ी हल्की सुरंगें, कभी-कभी नर्सरी की पौध पर गंभीर।
- नुक़सान
- सुरंग वाली पत्तियाँ सूखकर गिर जाती हैं, जिससे नर्सरी में व रोपाई के पहले साल पौधों की बढ़वार रुक जाती है।
- जैविक नियंत्रण
- नर्सरी में सुरंग वाली पत्तियाँ तोड़कर नष्ट करें और ज़्यादा नाइट्रोजन देकर मुलायम, लहलहाती बढ़वार न कराएँ।
- रासायनिक नियंत्रण
- कर्नाटक का पैकेज नर्सरी के पत्ती सुरंगक के लिए 0.05% मोनोक्रोटोफ़ॉस और पत्ती सुरंगक, टहनी-पत्ती जालक व पत्ती सिल्लिड के लिए डाइमेथोएट 0.03% बताता है — मोनोक्रोटोफ़ॉस पर भारी पाबंदी है, इसलिए मौजूदा पंजीकृत विकल्प अपने KVK से पक्का करें।
दालचीनी टहनी बेधक
- पहचान
- टहनी में छेद जिससे ताज़ा बुरादा बाहर निकला हो, और छेद के ऊपर टहनी का मुरझाना या सूखना।
- नुक़सान
- भीतर सुरंग बनाती सूँड़ियाँ उसी टहनी को मारती हैं जिससे क्विल बननी थी, यानी सीधा फ़सल का नुकसान।
- जैविक नियंत्रण
- अगली निराई के समय छेद वाली टहनियाँ काटकर जलाएँ और बाग़ से सूखी लकड़ी हटाते रहें।
- रासायनिक नियंत्रण
- TNAU महीने में एक बार तने व शाखाओं पर कार्बेरिल 50 WP 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का लेप लगाने की सलाह देता है। कॉफ़ी रेड बोरर के लिए TNAU तने में इंजेक्शन बताता है, जिसके बाद छाल की कटाई से पहले 20 दिन का अंतर रखना ज़रूरी है।
दीमक व लाल चींटी
- पहचान
- छोटे पौधों के तने पर मिट्टी की नलियाँ, और पत्तियों के फुटान में चींटियों के घोंसले।
- नुक़सान
- सूखे दौर में दीमक छोटे पौधों की जड़ व तना खाती है और पौधा जमने से पहले ही मर सकता है।
- जैविक नियंत्रण
- खेत के पास के घोंसले नष्ट करें, थाले में बिना गला कचरा न छोड़ें, और सूखे दौर में छोटे पौधों को पानी देते रहें।
- रासायनिक नियंत्रण
- TNAU पत्ती खाने वाली इल्लियों, लाल चींटी व दीमक के लिए धूल बुरकाव बताता है; जिस दवा का नाम वहाँ है (मिथाइल पैराथियॉन धूल) वह अब आसानी से उपलब्ध नहीं, इसलिए मौजूदा सिफ़ारिश अपने KVK से लें।
आम ग़लतियाँ जिनसे बचें
जो ग़लतियाँ किसानों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती हैं, खेत में जितनी बार दिखती हैं उसी क्रम में — हमेशा वैसे नहीं जैसा आप सोचें।
- 1
प्रजाति जाँचे बिना "दालचीनी" की पौध ख़रीद लेना।
नुक़सान क्यों होता है
कैसिया (C. cassia, C. burmannii) और तेजपात (C. tamala) अलग पेड़ हैं — छाल अलग, ख़रीदार अलग, दाम अलग। पैसे देने से पहले पक्का करें कि आपको Cinnamomum verum ही मिल रही है।
- 2
दालचीनी का बीज रखना, या धूप में सुखाना।
नुक़सान क्यों होता है
बीज टिकता नहीं और गूदा धुलते ही बो देना चाहिए। धूप में सुखाने से बीज का छिलका फट जाता है और अंकुरण ख़त्म हो जाता है, इसलिए छाया में सुखाएँ और तुरंत बोएँ।
- 3
कॉपिसिंग न करना और पौधे को पेड़ बन जाने देना।
नुक़सान क्यों होता है
फ़सल 18 से 24 महीने पुरानी टहनियों की छाल है। ऊँचा बढ़ने दिया पौधा मोटी, खुरदरी, नीचे ग्रेड की छाल देता है और कटाई को धीमा व ख़तरनाक बना देता है। लगभग दो साल पर उसे 15 सेमी पर काट दें।
- 4
ग़लत समय या ग़लत उम्र पर टहनियाँ काटना।
नुक़सान क्यों होता है
छाल तभी साफ़ उतरती है जब रस चल रहा हो, इसीलिए कटाई मई व नवंबर में बारिश रुकते ही की जाती है। बेमौसम कटाई या दो साल से ज़्यादा पुरानी टहनी की छाल उठती ही नहीं।
- 5
छिलाई व खुरचाई में लापरवाही।
नुक़सान क्यों होता है
ग्रेड — और ज़्यादातर दाम — इस पर तय होता है कि नली कितनी पतली व साफ़ है। लगभग 0.5 सेमी से मोटी, ठीक से न खुरची या ख़राब लपेटी छाल सीधे चिप्स व क्विलिंग में चली जाती है, जो क्विल से कहीं कम दाम पाती है।
- 6
इसे सिंचाई व खाद वाली फ़सल मान लेना।
नुक़सान क्यों होता है
दालचीनी कमज़ोर लैटेराइट मिट्टी का मज़बूत बारानी पेड़ है। पहले दो-तीन साल के बाद सिर्फ़ गर्मी में हफ़्ते में दो बार पानी दें, और मेहनत गोबर खाद, मल्च व साफ़ छिलाई पर लगाएँ।
कटाई
पहली कटाई रोपाई के लगभग तीन साल बाद (कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड) या चौथे-पाँचवें साल (TNAU) आती है। उसके बाद टहनियाँ मई में और फिर नवंबर में काटी जाती हैं, बारिश रुकते ही और झाड़ी का फुटान थमते ही — तभी छाल व लकड़ी के बीच रस खुलकर चलता है, जिससे छाल उठती है। पिछली कटाई के 18 से 24 महीने बाद टहनी तैयार होती है, जब वह लगभग 1 से 2 मीटर लंबी व 1 से 2.5 सेमी मोटी हो। छीलने वाला तिरछा चीरा लगाकर जाँचता है: छाल आसानी से न उठे तो टहनी छोड़ दी जाती है।
तैयार होने के संकेत
- बारिश रुक चुकी है, नया फुटान थमा है और झाड़ी पर पकी पत्तियाँ हैं
- टहनी 18 से 24 महीने पुरानी, लगभग एक-दो मीटर लंबी व 1–2.5 सेमी मोटी
- जाँच के चीरे पर छाल आसानी से उठती है और रस खुलकर चलता है
- ठूँठ से निकली सीधी टहनियाँ, पुराने मोटे तने नहीं
उपकरण
- ठूँठ पर टहनी काटने के लिए तेज़ धार वाला हँसिया या चाकू
- गोल सिरे वाला छोटा छिलाई चाकू
- पाइपिंग यार्ड के लिए मुड़ी धार वाला खुरचनी चाकू
- लपेटी हुई पट्टियों को रात भर ढकने के लिए चटाई या सूखी पत्तियाँ
- साफ़ सुखाई का आँगन
अपेक्षित उपज
पहली फ़सल लगभग 65 से 125 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर देती है। दस-ग्यारह साल का बाग़ आमतौर पर 225 से 300 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर देता है, साथ में लगभग 70 किग्रा क्विलिंग व फ़ेदरिंग। TNAU इसे प्रति झाड़ी लगभग 100 ग्राम सूखी छाल और साल में लगभग 35 किग्रा पत्ती तेल प्रति हेक्टेयर बताता है; एक हेक्टेयर से लगभग 4 किग्रा छाल तेल निकाला जा सकता है। जारी किस्मों में YCD 1 लगभग 360 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर और PPI (Ci) 1 लगभग 980 किग्रा कुल छाल प्रति हेक्टेयर देती है, जिसमें 248 किग्रा क्विल है।
कटाई के बाद व भंडारण
भंडारण
पाइपिंग के बाद क्विल अच्छी तरह सुखाएँ और साफ़, सूखी, हवाबंद पैकिंग में नमी व तेज़ गंध से दूर रखें। अच्छी दालचीनी मोटे काग़ज़ से ज़्यादा मोटी नहीं होनी चाहिए, रंग हल्का भूरा व उस पर लहरदार लकीरें, और टूटने पर साफ़ "कड़क" आवाज़ आनी चाहिए।
पैकेजिंग
छिलाई के बाद पट्टियों को एक के ऊपर एक रखकर दबाया जाता है, लगभग 20 सेमी पर काटा जाता है, लकड़ियों के छोटे घेरे में ढेर करके रात भर सूखी पत्तियों या चटाई से ढका जाता है ताकि नमी बनी रहे और हल्का किण्वन हो जाए। फिर पाइपिंग यार्ड में उन्हें खुरचकर मोटाई के हिसाब से छाँटा और नली की तरह लपेटा जाता है — सबसे बारीक, चिकना, छाल-रहित ग्रेड "00000" और सबसे खुरदरा "0" कहलाता है, बाक़ी चिप्स, पीस, क्विलिंग व फ़ेदरिंग के रूप में बिकता है।
परिवहन
सूखी क्विल हल्की, जगह घेरने वाली व जल्दी टूटने वाली होती है, इसलिए उसे कसकर व खड़ा पैक करके ले जाते हैं। चिप्स, क्विलिंग व फ़ेदरिंग मसाला काउंटर के बजाय पिसाई इकाइयों व तेल आसवन इकाइयों को जाते हैं।
भंडारण अवधि
ठीक से सूखी रखी जाए तो क्विल की ख़ुशबू लंबे समय तक बनी रहती है; नमी और सीलन वाला गोदाम ही ख़ुशबू व ग्रेड दोनों बिगाड़ते हैं।
मंडी भाव
सरकार के अपने एगमार्कनेट डेटा से, आपके नज़दीक का आज का मंडी भाव — लाइव।
सरकारी एगमार्कनेट डेटा से रोज़ाना लाइव मंडी भाव।
data.gov.in (एगमार्कनेट) से सिंक होता है। भाव ₹ प्रति क्विंटल हैं।
मौसम
आपके चुने गए स्थान की मौजूदा स्थिति और 5-दिन का पूर्वानुमान, फसल की अवस्था के अनुसार एक सलाह के साथ।
मौजूदा स्थिति और 5-दिन के पूर्वानुमान के लिए अपना राज्य चुनें।
Open-Meteo से लाइव डेटा
मुनाफ़ा कैलकुलेटर
आपकी अपनी लागत, अपेक्षित उपज और बिक्री भाव — हमारी नहीं।
पैसा कहाँ जाता है
नीचे कैलकुलेटर की डिफ़ॉल्ट लागत के अनुसार प्रति एकड़ कुल लागत में हर मद का हिस्सा — वहाँ अपने आँकड़े बदलने पर यह तस्वीर पूरी तरह आप पर लागू नहीं रहेगी, पर क्रम शायद ही बदलता है।
- मज़दूरी60% (₹35,000)
- ज़मीन का किराया14% (₹8,000)
- खाद12% (₹7,000)
- बीज4% (₹2,500)
- सिंचाई3% (₹2,000)
- कीटनाशक और खरपतवारनाशक3% (₹1,500)
- ब्याज3% (₹1,500)
- मशीन1% (₹500)
आधिकारिक डाउनलोड
केवल सरकार और ICAR के दस्तावेज़ — नीचे की हर चीज़ किसी आधिकारिक सर्वर पर है।
ICAR-IISR, कोझिकोड — दालचीनी
फ़सल प्रोफ़ाइल और IISR नवश्री व नित्यश्री के किस्म पन्ने
TNAU एग्रीटेक पोर्टल — दालचीनी
मिट्टी, मौसम, नर्सरी, रोपाई, खाद सारणी, पौध संरक्षण व कटाई
TNAU — मसाला फ़सलों की किस्में
YCD 1 (1995) व PPI (Ci) 1 (2003) का आधिकारिक विवरण
कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड — दालचीनी पैकेज ऑफ़ प्रैक्टिसेज़
प्रवर्धन, रोपाई, खाद, कीट-रोग, कटाई, छिलाई व ग्रेडिंग
किसान कॉल सेंटर — 1800-180-1551
अपनी भाषा में मुफ़्त फ़सल सलाह
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दालचीनी की कौन-सी किस्म लगाऊँ?
भारत में चार किस्मों के आँकड़े दर्ज हैं। ICAR-IISR कोझिकोड की IISR नवश्री व IISR नित्यश्री दोनों लगभग 200 किग्रा सूखी क्विल प्रति हेक्टेयर देती हैं, क्षमता 250 किग्रा; नवश्री की छाल रिकवरी बेहतर है (40.6%) और नित्यश्री का छाल ओलियोरेज़िन (10%) व पत्ती तेल का यूजेनॉल (78%) ज़्यादा। TNAU यरकौड की YCD 1 500 से 1,000 मीटर व 100 से 200 सेमी बारिश में बैठती है और लगभग 360 किग्रा क्विल के साथ 3,800 किग्रा सूखी पत्ती प्रति हेक्टेयर देती है। पेचिपराई की PPI (Ci) 1 100 से 500 मीटर की कम ऊँचाई के लिए है, सूखा सहनशील बताई गई है, और लगभग 980 किग्रा कुल छाल प्रति हेक्टेयर देती है। कोंकण तेज महाराष्ट्र के कोंकण के लिए जारी है।
पहली कटाई कब आएगी और कितनी मिलेगी?
कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड पहली छाल कटाई रोपाई के तीन साल बाद बताता है और TNAU चौथे-पाँचवें साल। वह पहली फ़सल छोटी होती है — लगभग 65 से 125 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर। दसवें-ग्यारहवें साल तक बाग़ आमतौर पर साल में 225 से 300 किग्रा क्विल प्रति हेक्टेयर देता है, साथ में लगभग 70 किग्रा क्विलिंग व फ़ेदरिंग, और 20 साल या उससे ज़्यादा चलता रहता है।
भारत में दालचीनी कहाँ उगाई जा सकती है?
समुद्र तल से लगभग 1,000 मीटर तक की गर्म, नम पट्टियों में — केरल के कन्नूर, कोझिकोड व कोट्टायम ज़िले, तमिलनाडु की निचली नीलगिरि, यरकौड व कन्याकुमारी की पहाड़ियाँ, दक्षिण कर्नाटक का तट, महाराष्ट्र का कोंकण तट और असम की नागा पहाड़ियाँ। इसे साल में लगभग 150 से 250 सेमी बारिश और 27°C के आसपास औसत तापमान चाहिए; सूखे मैदान इसके लिए नहीं हैं।
दालचीनी, कैसिया और तेजपात में क्या फ़र्क़ है?
असली दालचीनी Cinnamomum verum है — पतली, मुलायम, हल्की भूरी छाल जो परतदार नली में लिपट जाती है। कैसिया (C. cassia, C. burmannii, C. loureirii) अलग प्रजाति है जिसकी छाल मोटी, सख़्त व गहरी होती है, और भारतीय दुकानों में बिकने वाली ज़्यादातर दालचीनी असल में चीन, इंडोनेशिया व वियतनाम से आई कैसिया ही है। तेजपात तीसरी प्रजाति C. tamala है, जो पत्ती के लिए उगाई जाती है। तीनों के ख़रीदार व दाम अलग हैं, इसलिए अपनी पौध की प्रजाति ज़रूर जाँचें।
क्या दालचीनी का MSP या मंडी भाव है?
MSP नहीं है। मंडी व्यापार पतला है: सरकारी Agmarknet आँकड़ों में दालचीनी "Cinamon(Dalchini)" नाम से दर्ज है और नियमित भाव सिर्फ़ मुंबई APMC से आते हैं — अक्टूबर 2026 तक के साल में 223 रिकॉर्ड, जिनमें अक्टूबर 2026 का मॉडल भाव लगभग ₹19,500 से ₹27,000 प्रति क्विंटल रहा (दायरा ₹19,000–34,000)। ज़्यादातर किसान व्यापारी, मसाला कंपनी या तेल आसवन इकाई को बेचते हैं, इसलिए काटने से पहले मौजूदा व्यापारी भाव पता कर लें।
पौधे को ज़मीन तक काटना क्यों पड़ता है?
क्योंकि फ़सल छोटी टहनियों की छाल है, पुरानी लकड़ी की नहीं। लगभग दो साल पर, जब पौधा क़रीब 2 मीटर का हो, उसे ज़मीन से लगभग 15 सेमी ऊपर से काट दिया जाता है — कॉपिसिंग — और ठूँठ से सीधी बग़ल की टहनियों का गुच्छा निकलता है। ठूँठ के चारों ओर मिट्टी चढ़ाने से और ज़्यादा टहनियाँ फूटती हैं। उन्हीं टहनियों की छाल हर 18 से 24 महीने में उतारी जाती है, और ठूँठ दशकों तक नई टहनियाँ देता रहता है।
क्या छाल के साथ पत्तियों से भी कमाई होती है?
हाँ। दालचीनी की पत्तियों से भाप आसवन द्वारा पत्ती तेल निकलता है, जिसमें यूजेनॉल भरपूर होता है — IISR नित्यश्री में 78% और IISR नवश्री में 62%। TNAU पत्ती तेल साल में लगभग 35 किग्रा प्रति हेक्टेयर बताता है, और अकेली YCD 1 लगभग 3,800 किग्रा सूखी पत्ती प्रति हेक्टेयर देती है। छाल का तेल महँगा है पर मात्रा बहुत कम, लगभग 4 किग्रा प्रति हेक्टेयर। आसवन के बाद बची पत्तियाँ बढ़िया मल्च बनती हैं।
अब भी कोई सवाल है?
आम सवालों के जवाब ऊपर FAQs में हैं। आपके खेत और मिट्टी से जुड़ी किसी भी ख़ास बात के लिए आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही आधिकारिक जवाब है।
