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मध्यमअपडेट 27 सितंबर 2026

कोको बीन (चॉकलेट का पेड़)

Theobroma cacao L.

भारत की चॉकलेट फ़सल — छाया-प्रेमी पेड़ जो लगभग पूरी तरह दक्षिण के सुपारी या नारियल बाग़ों की छाया में अंतर-फ़सल के रूप में उगाया जाता है। फली सीधे तने से निकलती है (cauliflory), हाथ से तोड़ी जाती है, और गीले बीजों को एक हफ़्ते की किण्वन (fermentation) प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है जो तय करती है कि ख़रीदार प्रीमियम दाम देगा या सामान्य।

Green cacao pods growing directly from the trunk of a Theobroma cacao tree in a plantation setting — photo courtesy Wikimedia Commons (FranHogan), CC BY-SA 4.0

त्वरित सारांश

इस पेज की मुख्य बातें लगभग दो मिनट में — पढ़ें या सुनें।

त्वरित सारांश

कोको (Theobroma cacao) एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार पेड़ है जिसके बीजों से चॉकलेट, कोकोआ बटर और कोकोआ पाउडर बनते हैं। भारत में यह अकेले नहीं उगाया जाता — सुपारी या नारियल के बाग़ों की छाया में अंतर-फ़सल के रूप में लगता है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश मुख्य राज्य हैं, कुल मिलाकर लगभग एक लाख हेक्टेयर में।

ICAR-CPCRI (विट्ठल, कर्नाटक) ने आठ उन्नत किस्में जारी की हैं — पाँच हाइब्रिड (VTLCH-1 से VTLCH-5) और तीन चयन/क्लोन (VTLCC-1, VTLCS-1, VTLCS-2)। ये ख़ास तौर पर भारतीय ताड़-बाग़ परिस्थितियों के लिए बनी हैं: सघन छत्र जो ताड़ के नीचे फिट हो, जल्दी फलन (तीसरे साल से), और काली फली सड़न व चाय-मच्छर कीट सहनशीलता।

सबसे अहम कटाई-बाद का क़दम है किण्वन। ताज़ा निकाले गीले बीजों को लकड़ी के बक्सों में ढेर करके ढकते हैं और हर दो दिन पलटकर पाँच-सात दिन रखते हैं। सही किण्वन से चॉकलेट-स्वाद के रासायनिक अग्रदूत बनते हैं जिनकी ख़रीदार जाँच करता है; कम किण्वित बीज बहुत कम दाम पर बिकते हैं। किण्वन के बाद बीजों को धूप में लगभग छह-सात प्रतिशत नमी तक सुखाया जाता है।

फ़सल प्रकार
बारहमासी उष्णकटिबंधीय पेड़, ताड़ के नीचे अंतर-फ़सल (cauliflorous)
सीज़न
मानसून (जून–सितंबर) में रोपाई; साल भर फलियाँ, मुख्य तुड़ाई अक्टूबर–मार्च
उपयुक्त राज्य
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश
पहली फ़सल
रोपाई से लगभग 3 वर्ष
जल आवश्यकता
गर्मियों में ड्रिप से लगभग 20 लीटर/पेड़/सप्ताह
तापमान
गर्म व नम उष्णकटिबंधीय; लगभग 20–32°C
मिट्टी
गहरी, अच्छी निकासी वाली दोमट या चिकनी दोमट, जैविक पदार्थ भरपूर
कठिनाई स्तर
मध्यम (किण्वन कौशल बीज-गुणवत्ता व दाम तय करता)
अपेक्षित उपज
पूरे फलन पर लगभग 1–2 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष
मुख्य जोखिम
मानसून में काली फली सड़न; साल भर चाय-मच्छर कीट फलियों पर घाव

परिचय

कोको (Theobroma cacao L.), चॉकलेट का स्रोत, एक छोटा उष्णकटिबंधीय सदाबहार पेड़ है जो जंगल में ऊँचे पेड़ों की छाया में उगता है। भारत में इस छाया-ज़रूरत को सुपारी या नारियल के बाग़ों में निचली-मंज़िल अंतर-फ़सल के रूप में उगाकर पूरा किया जाता है — एक ताड़-आधारित फ़सल-प्रणाली जिस पर ICAR-CPCRI (विट्ठल, कर्नाटक) ने 1970 के दशक से शोध किया है। भारत में लगभग 1.1 लाख हेक्टेयर में कोको उगता है, सालाना लगभग 30,000 टन सूखे बीज।

चार मुख्य कोको राज्य हैं — आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु — जो लगभग सारा उत्पादन करते हैं। आंध्र प्रदेश ने कंपनी-समर्थित अनुबंध खेती (Mondelez, Cargill) से सबसे तेज़ विस्तार किया। पश्चिम अफ़्रीका के विपरीत जहाँ कोको अकेली फ़सल है, भारतीय कोको लगभग हमेशा मौजूदा ताड़-बाग़ों के नीचे बैठता है, जिससे यह अलग बाग़ान के बजाय अतिरिक्त आमदनी का ज़रिया है।

CPCRI ने भारतीय परिस्थितियों के लिए आठ किस्में जारी की हैं: पाँच हाइब्रिड (VTLCH-1 से VTLCH-5), एक क्लोन (VTLCC-1) और दो चयन (VTLCS-1, VTLCS-2)। सभी ताड़ के नीचे फिट होने वाली सघन छत्र, जल्दी फलन और दो मुख्य समस्याओं — काली फली सड़न (Phytophthora palmivora, मानसून में सबसे बुरी) और चाय-मच्छर कीट (Helopeltis spp., जो छोटी फलियों पर घाव करता) — की सहनशीलता के लिए बनी हैं।

फसल की समयरेखा, बुवाई से कटाई तक

पूरे सीज़न की एक झलक — हर अवस्था की पूरी जानकारी के लिए नीचे संबंधित सेक्शन पर जाएँ।

  1. रोपाई से पहले (3–6 महीने)

    नर्सरी

    सिफ़ारिशी हाइब्रिड/क्लोन की पकी फली से बीज तुरंत बोएँ (जल्दी ख़राब होते हैं), मिट्टी-रेत-गोबर खाद मिश्रण भरी पॉलीबैग में छाया में रखें। 4–6 महीने में पौध खेत के लिए तैयार।

  2. वर्ष 0 (जून–सितंबर)

    खेत में रोपाई

    4–6 महीने पुरानी पौध बरसात में मौजूदा ताड़ की पंक्तियों के बीच तैयार गड्ढों (50 × 50 × 50 सेमी) में 2.7 × 2.7 मी या 2.7 × 5.4 मी दूरी पर लगाएँ। ताड़ की छाया कम हो तो केले या ग्लिरिसिडिया से अस्थायी छाया दें।

  3. वर्ष 1–2

    जमाव

    नियमित पानी, मल्चिंग, निराई और धीरे-धीरे बढ़ती खाद-खुराक पौधे को मज़बूत करती। जॉर्कएट (तने का प्राकृतिक काँटा जहाँ छत्र शाखाएँ बनती हैं) बनता है और पेड़ को एकल-स्तर छत्र में प्रशिक्षित करते हैं।

  4. वर्ष 3

    पहला फूल व फलन

    हाइब्रिड किस्में तने व मुख्य शाखाओं से फूलना (cauliflory) शुरू करती हैं। पहली छोटी फ़सल की तुड़ाई हो सकती है।

  5. वर्ष 4–5

    उपज बढ़ना

    फलियों की संख्या लगातार बढ़ती। फलन-मौसम में हर 10–15 दिन नियमित तुड़ाई, छँटाई और कीट/रोग निगरानी दिनचर्या बनती।

  6. वर्ष 6 से आगे

    पूरा फलन

    अच्छी देखभाल वाला पेड़ साल में 50–100+ फलियाँ देता। हर फली से लगभग 30–40 गीले बीज; किस्म व प्रबंधन के अनुसार लगभग 1–3 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष।

  7. हर तुड़ाई दौर

    फली तुड़ाई व किण्वन

    पकी फलियाँ (रंग हरे से पीला या लाल बदलता) तेज़ चाकू से काटें, कुशन को नुक़सान न पहुँचे। बीज निकालकर बक्सों में 5–7 दिन किण्वित करें, हर 48 घंटे पलटें, फिर 6–7% नमी तक धूप में सुखाएँ।

उपयुक्त राज्य

जिन राज्यों में यह फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, वे नीचे हाइलाइट हैं। आपके खेत के लिए अंतिम सलाह हमेशा आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही देगा।

  • जम्मू और कश्मीर
  • हिमाचल प्रदेश
  • पंजाब
  • उत्तराखंड
  • हरियाणा
  • दिल्ली
  • उत्तर प्रदेश
  • राजस्थान
  • बिहार
  • झारखंड
  • पश्चिम बंगाल
  • सिक्किम
  • असम
  • अरुणाचल प्रदेश
  • मेघालय
  • नागालैंड
  • मणिपुर
  • मिज़ोरम
  • त्रिपुरा
  • गुजरात
  • मध्य प्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • महाराष्ट्र
  • ओडिशा
  • गोवा
  • तेलंगाना
  • आंध्र प्रदेश
  • कर्नाटक
  • केरल
  • तमिलनाडु
  • पुदुचेरी
  • लद्दाख
  • चंडीगढ़
  • लक्षद्वीप

यहाँ उगाई जाती है

जलवायु की ज़रूरतें

लगभग 600 मी ऊँचाई तक उपयुक्त। गर्म, नम, भरोसेमंद छाया व नमी वाले इलाक़े से बाहर कोको नहीं चलेगा।

  • आदर्श तापमान

    कोको को गर्म, नम उष्णकटिबंधीय मौसम चाहिए — लगभग 20–32°C। पाला या लंबी सूखी गर्मी सहन नहीं करता।

  • वर्षा

    सालाना लगभग 1,250–2,500 मिमी अच्छी बँटी बारिश। सूखे महीनों में ड्रिप सिंचाई (लगभग 20 लीटर/सप्ताह) चाहिए; जलभराव हानिकारक।

  • नमी

    ऊँची नमी, लगभग 70–80% से ऊपर, पेड़ को सूट करती और फली-विकास में मदद करती। वही नमी मानसून में काली फली सड़न बढ़ाती।

  • धूप

    कोको छाया-प्रेमी पेड़ है — लगभग 50–70% छनी रोशनी में सबसे अच्छा उगता। सुपारी या नारियल आदर्श छाया देते।

मिट्टी की ज़रूरतें

ताड़ के तनों के बीच की जगह रोपण-क्षेत्र है — ताड़ व कोको की जड़ें एक ही मिट्टी साझा करती हैं, इसलिए खाद दोनों फ़सलों को ध्यान में रखकर दें।

  • उपयुक्त मिट्टी

    गहरी, अच्छी निकासी वाली दोमट या चिकनी दोमट, जैविक पदार्थ भरपूर। केरल व कर्नाटक की लाल लैटेराइट मिट्टी, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु की जलोढ़ मिट्टी पारंपरिक कोको क्षेत्र हैं।

  • pH स्तर

    हल्की अम्लीय से लगभग उदासीन (pH 5.0–7.0)।

  • जल निकासी

    अच्छी निकासी ज़रूरी — जलभराव जड़-सड़न लाता और काली फली रोग बढ़ाता।

  • जैविक तत्व

    रोपाई पर व सालाना भरपूर जैविक खाद। कम्पोस्ट, अच्छी सड़ी गोबर खाद और ऊपर के ताड़ की पत्ती-खाद मानक तरीक़ा।

खेत की तैयारी

क्षेत्र चाहे जो हो, चार कदम वही रहते हैं — बस समय बुवाई के अनुसार बदलता है।

  1. 1

    मौजूदा ताड़-बाग़ जाँचें

    कोको सुपारी या नारियल के बीच लगता है। जाँचें कि ताड़ लगभग 50–70% छाया दे रहे। कम छाया हो तो अस्थायी छाया (केला, ग्लिरिसिडिया) लगाएँ।

  2. 2

    गड्ढे खोदें

    ताड़ की पंक्तियों के बीच 2.7 × 2.7 मी या 2.7 × 5.4 मी दूरी पर 50 × 50 × 50 सेमी के गड्ढे खोदें। ऊपरी मिट्टी, अच्छी सड़ी गोबर खाद व रॉक फ़ॉस्फ़ेट से भरें।

  3. 3

    सिंचाई की योजना

    अगर ताड़-बाग़ में ड्रिप न हो तो लगाएँ। सूखे महीनों में हर कोको पेड़ को लगभग 20 लीटर/सप्ताह चाहिए।

बीज की जानकारी

मुख्य किस्मों की तुलना — अवधि, उपज, रोग-प्रतिरोध या आप किस मक़सद से उगा रहे हैं, इसके आधार पर चुनें।

किस्मअवधिउपजरोग-प्रतिरोधसर्वश्रेष्ठ राज्यकिसके लिए उपयुक्त

VTLCH-1 (विट्ठल कोको हाइब्रिड 1)

ICAR-CPCRI, विट्ठल द्वारा जारी। जल्दी फलने वाला, ऊँची उपज — लगभग 50 फली/पेड़/वर्ष, फली भार 350–400 ग्राम, लगभग 40 बीज/फली, सूखा बीज भार लगभग 1–1.11 ग्राम, वसा 54%। लगभग 1.4–1.5 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष।

तीसरे वर्ष से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 1.4–1.5 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (959–1,030 किग्रा/हेक्टेयर)विशेष रूप से दर्ज नहींकेरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशदक्षिण भारत के सभी ताड़-आधारित कोको क्षेत्र

VTLCH-2 (विट्ठल कोको हाइब्रिड 2)

ICAR-CPCRI द्वारा जारी। वंशावली ICS 6 × SCA 6। काली फली सड़न, चाय-मच्छर कीट व कम नमी तनाव सहनशील। लगभग 50 फली/पेड़/वर्ष, 40 बीज/फली, 1–1.5 ग्राम सूखा बीज भार, 54% वसा।

तीसरे वर्ष से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 1.5 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (1,030 किग्रा/हेक्टेयर)काली फली सड़न व चाय-मच्छर कीट सहनशीलकर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, गुजरातकाली फली सड़न व नमी-तनाव जोखिम वाले क्षेत्र

VTLCH-5 / नेत्र सेंचुरा

2008 में ICAR-CPCRI द्वारा शताब्दी वर्ष में जारी। सबसे ऊँची उपज वाला CPCRI हाइब्रिड — लगभग 66 फली/पेड़/वर्ष, 43 बीज/फली, 1.11 ग्राम सूखा बीज भार, 52% वसा। सुपारी व नारियल दोनों के नीचे सघन रोपण के लिए उपयुक्त।

तीसरे वर्ष से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 2.5–3.0 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (1,500–1,800 किग्रा/हेक्टेयर)विशेष रूप से दर्ज नहींकर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशसघन ताड़-आधारित खेती; सबसे ऊँची उपज चाहने वाले किसान

VTLCS-1 (विट्ठल कोको चयन 1)

ICAR-CPCRI द्वारा क्लोनल चयन से जारी। तनाव-सहनशील, भारी फलन — 55 फली/पेड़/वर्ष, 42 बीज/फली, 1.3 ग्राम सूखा बीज भार (अधिकांश हाइब्रिड से भारी), 52% वसा।

वर्ष 3–4 से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 2.5 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (1,700 किग्रा/हेक्टेयर)तनाव-सहनशील (सूखा, गर्मी)कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशसूखे मौसम तनाव वाले क्षेत्र

VTLCS-2 (विट्ठल कोको चयन 2)

ICAR-CPCRI द्वारा क्लोनल चयन से जारी। स्थिर, तनाव-सहनशील भारी फलन — 41 बीज/फली, 1.21 ग्राम सूखा बीज भार, 53% वसा। CPCRI चयनों में सबसे ऊँची वसा।

वर्ष 3–4 से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 2.7 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (1,840 किग्रा/हेक्टेयर)तनाव-सहनशील (सूखा, गर्मी)कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशसूखे क्षेत्र जहाँ तनाव में स्थिर उपज ज़रूरी

VTLCC-1 (विट्ठल कोको क्लोन 1)

ICAR-CPCRI द्वारा क्लोनल किस्म के रूप में जारी। स्व-संगत व पर-संगत — लगभग 75 फली/पेड़/वर्ष, 36 बीज/फली, 0.9–1.05 ग्राम सूखा बीज भार, 52.5% वसा। सघन 12 वर्ग मी छत्र। उत्तर-पूर्वी भारत के लिए सिफ़ारिशी।

तीसरे वर्ष से पहला फलन; वर्ष 6–8 तक पूरा फलनलगभग 1.33 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष (911 किग्रा/हेक्टेयर)स्व-संगत (बिना पर-परागण भरोसेमंद फल-बनावट)उत्तर-पूर्वी राज्य, केरल, कर्नाटकउत्तर-पूर्वी भारत; छोटे बाग़ जहाँ भरोसेमंद स्व-परागण ज़रूरी
बीज दर
कोको 4–6 महीने पुरानी बीज-पौध या कलमी/बडेड पौधों से लगाया जाता है। 2.7 × 2.7 मी दूरी पर लगभग 200–270 पेड़/एकड़, या 2.7 × 5.4 मी पर लगभग 100–135।
प्रमाणित बीज
बीज-फलियाँ या पौध ICAR-CPCRI (विट्ठल, कर्नाटक), KAU (केरल कृषि विश्वविद्यालय) कोको शोध केंद्रों, DCCD (काजू व कोको विकास निदेशालय) नर्सरियों या कंपनी-समर्थित नर्सरियों (Mondelez/Cadbury, Cargill) से लें। पहचानी हाइब्रिड या क्लोनल सामग्री पर ज़ोर दें।
दूरी
मौजूदा ताड़ पंक्तियों के बीच लगभग 2.7 × 2.7 मी या 2.7 × 5.4 मी (CPCRI)।
बीज उपचार
बीज फली खुलने के एक हफ़्ते में ख़राब हो जाते — तुरंत बोएँ। गूदा हटाएँ, 50% छाया में पॉलीबैग में 2–3 सेमी गहरा बोएँ। अंकुरण लगभग 10–15 दिन में।

बुवाई गाइड

ताड़ की छत्र लगभग 50–70% छाया दे। ताड़ बहुत छोटे या दूर-दूर हों तो साथ में अस्थायी छाया (केला, ग्लिरिसिडिया) लगाएँ।

सबसे अच्छा समय
बरसात में पौध लगाएँ — जून से सितंबर — जब ऊपर ताड़ की छाया अच्छी जमी हो।
क़तार की दूरी
पंक्तियों (ताड़ के तनों) के बीच लगभग 2.7 मी या 5.4 मी
पौधे की दूरी
पंक्ति में पेड़ों के बीच लगभग 2.7 मी
बुवाई की गहराई
पौध को नर्सरी-बैग जैसी ही गहराई पर, ऊपरी मिट्टी व गोबर खाद भरे गड्ढे में बिठाएँ।
तरीक़ा
ताड़ पंक्तियों के बीच हर तैयार गड्ढे में एक पौध, तुरंत पानी दें व मल्च करें।

खाद कार्यक्रम

बुवाई के समय एक साथ पूरी खाद डालने से बँटी हुई मात्रा बेहतर है — खासकर नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा हवा में उड़ जाता है या रिसकर बह जाता है।

  1. 1

    रोपाई पर (बेसल)

    वर्ष 0

    गड्ढा ऊपरी मिट्टी, लगभग 5 किग्रा अच्छी सड़ी गोबर खाद व 100 ग्राम रॉक फ़ॉस्फ़ेट से भरें।

  2. 2

    छोटे पेड़

    वर्ष 1–3

    पहला साल: पूरी खुराक का लगभग एक-तिहाई (लगभग 33:13:47 ग्राम N:P₂O₅:K₂O)। दूसरा साल: दो-तिहाई। तीसरे साल से: पूरी खुराक।

  3. 3

    फलदार पेड़

    वर्ष 4 से

    लगभग 100:40:140 ग्राम N:P₂O₅:K₂O प्रति पेड़/वर्ष (CPCRI)। दो बराबर भागों में — अप्रैल–मई व सितंबर–अक्टूबर। 50 से ज़्यादा फली/वर्ष देने वाले पेड़: खुराक दोगुनी करें (200:80:280 ग्राम)।

  4. 4

    जैविक खाद

    सालाना

    लगभग 10–15 किग्रा अच्छी सड़ी गोबर खाद या कम्पोस्ट/पेड़/वर्ष, पेड़ के चारों ओर उथली नाली में।

सिंचाई कार्यक्रम

  1. 1. छोटे पेड़

    सूखे महीने

    गर्मियों में ड्रिप से लगभग 20 लीटर/पेड़/सप्ताह। विकल्प के रूप में थाला सिंचाई।

  2. 2. फलदार पेड़

    सूखे दौर

    सूखे महीनों में लगभग 20 लीटर/पेड़/सप्ताह जारी रखें। पर्याप्त सिंचाई से उपज लगभग 30% बढ़ती (CPCRI)।

महत्वपूर्ण अवस्थाएँ

  • रोपाई के बाद पहले दो सूखे मौसम
  • फूल आने व फली-विकास के दौरान
  • किसी भी उम्र में लंबे सूखे दौर

पानी बचाने के तरीक़े

  • ड्रिप सिंचाई बाढ़-सिंचाई से पानी बचाती और जलभराव टालती।
  • नमी टिकाने व खरपतवार दबाने को ताड़-पत्ती की खाद से मल्च करें।
  • ताड़ की सिंचाई-प्रणाली अक्सर कोको को भी काम आती — दोनों को एकीकृत करें।

खरपतवार प्रबंधन

जैविक नियंत्रण

  • ताड़-पत्ती या कोको फली-छिलके से मल्च करके खरपतवार दबाएँ।
  • मिकेनिया व लैंटाना को फूल-बीज बनने से पहले काटें।
  • छाया-प्रबंधन अपने आप कई खरपतवार दबाता।

रासायनिक नियंत्रण

  • हर छोटे पेड़ के आसपास हाथ या कुदाल से निराई करें। छोटे पौधों के पास खरपतवारनाशी से बचें।
  • पंक्तियों के बीच खरपतवारनाशी ज़रूरी हो तो मौजूदा पंजीकृत दवा व मात्रा KVK या राज्य बागवानी विभाग से पक्की करें।

पोषक तत्व की कमी की पहचान

हर पोषक तत्व की कमी पौधे पर असल में कैसी दिखती है — ताकि ग़लत स्प्रे करने से पहले आप कमी और रोग में फ़र्क़ कर सकें।

ध्यान देने योग्य रोग

लक्षण, संभावित कारण और असल में क्या इलाज करता है — सिर्फ़ किसी स्प्रे का नाम नहीं।

ध्यान देने योग्य कीट

नुक़सान दिखने से पहले क्या देखें, और रसायन से पहले जैविक विकल्प क्या हैं।

आम ग़लतियाँ जिनसे बचें

जो ग़लतियाँ किसानों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती हैं, खेत में जितनी बार दिखती हैं उसी क्रम में — हमेशा वैसे नहीं जैसा आप सोचें।

  1. 1

    बिना पर्याप्त छाया कोको लगाना।

    नुक़सान क्यों होता है

    कोको छाया-प्रेमी पेड़ है। खुली धूप में झुलसता, ख़राब बढ़ता और बहुत कम देता। मौजूदा ताड़-छत्र या अस्थायी छाया के नीचे ही लगाएँ।

  2. 2

    किण्वन छोड़ना या कम करना।

    नुक़सान क्यों होता है

    कम किण्वित बीजों में चॉकलेट-स्वाद अग्रदूत नहीं बनते, बहुत कम दाम मिलते। बक्सों में हर 48 घंटे पलटकर पूरे 5–7 दिन किण्वन अनिवार्य।

  3. 3

    सड़ी फलियाँ पेड़ पर या ज़मीन पर छोड़ना।

    नुक़सान क्यों होता है

    हर सड़ी फली Phytophthora बीजाणुओं का स्रोत जो पड़ोसी फलियाँ संक्रमित करता। हर तुड़ाई-दौर में सड़ी फलियाँ हटाकर गाड़ें या जलाएँ — यह सबसे असरदार काली फली सड़न नियंत्रण।

  4. 4

    अज्ञात बीज-पौध लगाना।

    नुक़सान क्यों होता है

    बिना पहचान की पौध उपज, बीज-आकार व रोग-सहनशीलता में बेतहाशा अलग। लगातार, जल्दी फलन व अपेक्षित गुणवत्ता के लिए पहचाने CPCRI हाइब्रिड या क्लोन लगाएँ।

  5. 5

    छत्र नहीं छाँटना।

    नुक़सान क्यों होता है

    बिना छँटाई कोको ऊँचा बढ़ता, तुड़ाई कठिन, और घना छत्र ख़राब हवा-संचार देता — काली फली सड़न व थ्रेड ब्लाइट का आदर्श माहौल। सालाना एकल-स्तर छत्र छँटाई फलियाँ पहुँच में और रोग काबू में रखती।

  6. 6

    बीज ज़्यादा या कम सुखाना।

    नुक़सान क्यों होता है

    6% से नीचे सुखाए बीज भुरभुरे, हैंडलिंग में टूटते। 8% से ऊपर नमी पर भंडारण में फफूँद लगती। लक्ष्य लगभग 6–7% — बीज तोड़ने पर साफ़ टूटना चाहिए।

कटाई

फलन रोपाई के लगभग तीसरे साल से शुरू। फलियाँ पूरा पकने पर तोड़ें — रंग हरे से पीला (Forastero) या हरे/लाल से नारंगी/लाल (Criollo/Trinitario) बदलता। ज़्यादा पकी फलियों के तने पर फटने से बचने हर 10–15 दिन तोड़ें।

तैयार होने के संकेत

  • किस्म के अनुसार फली का रंग हरे से पीला या नारंगी-लाल बदला
  • फली ठोकने पर खोखली आवाज़
  • फली तने के कुशन से साफ़ कटकर अलग हो

उपकरण

  • तेज़ चाकू या सिकेटर (काटें — कभी मरोड़ें या खींचें नहीं, तने का कुशन ख़राब न हो)
  • फलियाँ जमा करने को साफ़ टोकरियाँ या ट्रे
  • लकड़ी के किण्वन बक्से (लगभग 60 × 60 × 60 सेमी)
  • धूप-सुखाने के लिए ऊँचे जाल या चटाई

अपेक्षित उपज

पूरे फलन पर लगभग 50–100 फली/पेड़/वर्ष। हर फली से लगभग 30–40 गीले बीज। किण्वन व सुखाने के बाद मानक हाइब्रिड से लगभग 1–2 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष; VTLCH-5 से 2.5–3.0 किग्रा/पेड़/वर्ष।

कटाई के बाद व भंडारण

  • भंडारण

    सूखे बीज (लगभग 6–7% नमी) साफ़, सूखे, हवादार जूट या पॉलीप्रोपिलीन बोरों में ज़मीन से ऊँचे रखें। नमी, तेज़ गंध व रसायनों से दूर।

  • पैकेजिंग

    तुड़ाई के तुरंत बाद फलियाँ तोड़ें, गीले बीज निकालें। लकड़ी के बक्सों में 5–7 दिन किण्वित करें, हर 48 घंटे पलटें। ऊँचे जाल पर लगभग 6–7% नमी तक धूप में सुखाएँ। बीज-आकार से ग्रेड करें (बीज-सूचकांक: 100 बीज = लगभग 100 ग्राम, ग्रेड I)।

  • परिवहन

    सूखे कोको बीज सघन हैं व ढुलाई में अच्छे टिकते। Mondelez/Cadbury, Cargill, Campco (केंद्रीय सुपारी व कोको विपणन सहकारी) या स्थानीय व्यापारियों को बिकते।

  • भंडारण अवधि

    सही किण्वित, सुखाए व भंडारित कोको बीज कई महीने अच्छे टिकते। नमी-सोखना व फफूँद मुख्य भंडारण-जोखिम।

मंडी भाव

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मुनाफ़ा कैलकुलेटर

आपकी अपनी लागत, अपेक्षित उपज और बिक्री भाव — हमारी नहीं।

पैसा कहाँ जाता है

नीचे कैलकुलेटर की डिफ़ॉल्ट लागत के अनुसार प्रति एकड़ कुल लागत में हर मद का हिस्सा — वहाँ अपने आँकड़े बदलने पर यह तस्वीर पूरी तरह आप पर लागू नहीं रहेगी, पर क्रम शायद ही बदलता है।

  • मज़दूरी52% (₹25,000)
  • ज़मीन का किराया17% (₹8,000)
  • खाद8% (₹4,000)
  • बीज6% (₹3,000)
  • सिंचाई6% (₹3,000)
  • कीटनाशक और खरपतवारनाशक5% (₹2,500)
  • ब्याज4% (₹2,000)
  • मशीन1% (₹500)

आधिकारिक डाउनलोड

केवल सरकार और ICAR के दस्तावेज़ — नीचे की हर चीज़ किसी आधिकारिक सर्वर पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सुपारी या नारियल बाग़ के बिना कोको उगा सकता हूँ?

कोको को लगभग 50–70% छाया चाहिए। भारत में यह लगभग हमेशा सुपारी या नारियल के नीचे अंतर-फ़सल है। खुले में बिना छाया लगाने से धूप-दाह, ख़राब बढ़वार और बहुत कम उपज। अगर ताड़-बाग़ नहीं तो पहले छाया-पेड़ (ग्लिरिसिडिया, सिल्वर ओक) लगाने होंगे, पर यह भारतीय व्यवहार में असामान्य है।

कौन-सी कोको किस्म लगानी चाहिए?

सबसे ऊँची उपज के लिए VTLCH-5 (नेत्र सेंचुरा) लगभग 2.5–3 किग्रा सूखे बीज/पेड़/वर्ष देता। काली फली सड़न व नमी-तनाव वाले क्षेत्र में VTLCH-2 (दोनों सहनशील) सुरक्षित। उत्तर-पूर्व के लिए VTLCC-1 (स्व-संगत)। पहचानी रोपण-सामग्री CPCRI विट्ठल, KAU या DCCD नर्सरियों से लें।

कोको से फ़सल कब मिलती है?

CPCRI हाइब्रिड लगभग तीसरे साल से फलना शुरू करते। उपज धीरे-धीरे बढ़ती — वर्ष 6–8 तक पूरा फलन। अच्छी देखभाल से पेड़ 25–30 साल या ज़्यादा उत्पादन करता।

क्या कोको का कोई MSP या मंडी भाव है?

कोको पर कोई MSP नहीं। यह Agmarknet पर "Cocoa" कमोडिटी के रूप में ट्रेड होता — मुख्यतः केरल APMC मार्केट (जैसे पुलपल्ली)। 2025–2026 में दाम लगभग ₹15,000 से ₹20,000/क्विंटल रहे। ज़्यादातर भारतीय कोको Mondelez/Cadbury, Cargill या Campco अनुबंध/सहकारी चैनलों से बिकता, अक्सर मंडी फ़्लोर से ऊँचे दाम पर।

किण्वन इतना ज़रूरी क्यों है?

किण्वन वह क़दम है जहाँ बीज के भीतर चॉकलेट-स्वाद के रासायनिक अग्रदूत बनते हैं। बिना सही किण्वन (बक्सों में 5–7 दिन, हर 48 घंटे पलटना) बीज सपाट, कसैले व कड़वे — ख़रीदार इसकी जाँच करता और कम किण्वित बीजों के बहुत कम दाम देता। यह सबसे अहम कटाई-बाद का क़दम है।

कोको में सबसे बड़ी बीमारी कौन-सी?

मानसून में काली फली सड़न (Phytophthora palmivora) सबसे हानिकारक रोग है — बुरे साल में 10–30% फलियाँ ख़राब कर सकती। सबसे असरदार नियंत्रण सफ़ाई — हर तुड़ाई-दौर में सड़ी फली हटाकर नष्ट करें ताकि बीजाणु स्वस्थ फलियों तक न फैलें। मानसून में ताम्र छिड़काव व VTLCH-2 जैसी सहनशील किस्म और मदद करते।

अब भी कोई सवाल है?

आम सवालों के जवाब ऊपर FAQs में हैं। आपके खेत और मिट्टी से जुड़ी किसी भी ख़ास बात के लिए आपका नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र ही आधिकारिक जवाब है।