मुख्यमंत्री निराश्रित/बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना
गौशाला से निराश्रित गोवंश लेकर पालने वाले किसानों और पशुपालकों को ₹50 रोज़ (₹1,500 प्रति माह) प्रति गाय, अधिकतम चार पशुओं तक।
संचालक: पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार
- रोज़ की रकम
- ₹50 प्रति गाय
- मासिक रकम
- ₹1,500 प्रति गाय
- प्रति व्यक्ति पशु
- अधिकतम 4
- सहभागी (अक्टूबर 2026)
- पोर्टल पर लगभग 1.13 लाख
परिचय
उत्तर प्रदेश में लाखों निराश्रित और छोड़े गए पशु सरकारी गौशालाओं में रखे गए हैं। इस योजना में इच्छुक किसान या पशुपालक गौशाला से गोवंश लेकर घर पर पाल सकता है, और राज्य हर पशु के लिए रोज़ का भरण-पोषण भत्ता देता है।
फरवरी 2025 में पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह ने रोज़ की रकम ₹30 से बढ़ाकर ₹50 प्रति गाय की घोषणा की (ईटीवी भारत, 9 फरवरी 2025)। यानी ₹1,500 प्रति माह प्रति गाय, और एक व्यक्ति को चार पशु तक मिल सकते हैं — चार के लिए लगभग ₹6,000 प्रति माह।
योजना को तेज़ी से लाभार्थी मिले हैं। फरवरी 2025 में रकम बढ़ते समय 1,05,139 लाभार्थियों को 1,62,625 गायें सौंपी जा चुकी थीं, और करीब 7,700 आश्रय स्थलों में 12 लाख से ज़्यादा पशु थे। विभाग के गौशाला प्रबंधन पोर्टल (up.goashray.in) पर अक्टूबर 2026 में करीब 6,090 आश्रय स्थलों में लगभग 12.17 लाख गोवंश और लगभग 1.13 लाख सहभागी दिखे।
उत्तर प्रदेश बजट 2026-27 में भी योजना का प्रावधान है। राज्य इसे आश्रय स्थलों की भीड़ घटाने और ग्रामीण परिवारों को नियमित नकद सहारा देने के तरीक़े के रूप में देखता है।
आपको क्या मिलता है
लाभ वैसा ही, जैसा राज्य ने अधिसूचित किया है — यहाँ कुछ भी अनुमान नहीं है।
- आप जिस निराश्रित गाय को पालें उसके लिए ₹50 रोज़, यानी ₹1,500 प्रति माह।
- प्रति व्यक्ति चार पशु तक — चार गायों पर लगभग ₹6,000 प्रति माह।
- पैसा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से आपके बैंक खाते में आता है।
- नियमित आमदनी और गोबर की खाद मिलती है, और भीड़ भरी गौशालाओं का बोझ घटता है।
कौन पात्र है
राज्य योजनाएँ अपने मानदंड आमतौर पर सूची में नहीं, विवरण में लिखती हैं। यह वही विवरण खोलकर रखा गया है — अंतिम फ़ैसला विभाग के सत्यापन का होता है।
आप पात्र हैं अगर
- उत्तर प्रदेश का निवासी जो सरकारी गौशाला से लिए निराश्रित गोवंश को पालने को तैयार हो
- पशुओं को ठीक से रखने और खिलाने में सक्षम
- किसान, पशुपालक या कोई भी इच्छुक व्यक्ति — प्रति व्यक्ति चार पशु तक
ज़रूरी दस्तावेज़
शुरू करने से पहले ये तैयार रखें — ज़्यादातर आवेदन हक़ न होने से नहीं, कोई काग़ज़ छूट जाने से रद्द होते हैं।
- आधार कार्ड
- बैंक पासबुक (आवेदक के नाम का खाता)
- पते का प्रमाण
- पशु रखने की जगह का प्रमाण, माँगे जाने पर
आवेदन कैसे करें
केंद्रीय योजना से कम कदम, और आमतौर पर पोर्टल नहीं, एक कार्यालय।
- 1
गौशाला या पशु चिकित्सा कार्यालय से मिलें
अपनी नज़दीकी गौशाला के प्रभारी या ज़िला मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (CVO) कार्यालय जाकर बताएँ कि आप योजना में गोवंश लेना चाहते हैं।
- 2
आवेदन भरें
आधार, पते और बैंक विवरण के साथ फॉर्म जमा करें। विभाग सहभागियों को दिए गए पशुओं का हिसाब अपने गौशाला प्रबंधन पोर्टल पर रखता है।
- 3
गोवंश प्राप्त करें
मंज़ूरी के बाद गौशाला आपको चार पशुओं तक सौंप देती है। सुपुर्दगी के रिकॉर्ड की प्रति ले लें।
- 4
पालें और भुगतान पाएँ
पशुओं को स्वस्थ रखें। ₹50 प्रतिदिन की रकम DBT से आपके बैंक खाते में भेजी जाती है।
अगर कुछ गड़बड़ हो
नाम सूची में न हो, या भुगतान अटका हो — विभाग ने ख़ुद जो रास्ता बताया है, वह यहाँ है।
- पहले विभाग के पशुधन समस्या निवारण केंद्र के टोल-फ्री नंबर 1800-180-5141 या अपने ज़िले के CVO कार्यालय से संपर्क करें।
- आगे शिकायत के लिए यूपी जनसुनवाई (IGRS): jansunwai.up.nic.in या सीएम हेल्पलाइन 1076 का इस्तेमाल करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रति गाय कितना पैसा मिलता है?
आप जिस निराश्रित गाय को पालें उसके लिए ₹50 रोज़, यानी ₹1,500 प्रति माह। फरवरी 2025 में यह ₹30 से बढ़ाया गया।
मैं कितने पशु ले सकता हूँ?
प्रति व्यक्ति चार पशु तक। चार गायों पर लगभग ₹6,000 प्रति माह।
गोवंश कहाँ से मिलता है?
अपने ज़िले की सरकारी गौशाला से, गौशाला प्रभारी या ज़िला मुख्य पशु चिकित्साधिकारी के ज़रिए।
क्या यह गोपालक योजना जैसी ही है?
नहीं। गोपालक योजना डेयरी इकाई शुरू करने के लिए सब्सिडी वाला अलग बैंक लोन है। यह योजना गौशाला से लिए निराश्रित गोवंश को पालने के बदले रोज़ की रकम देती है।
पैसा कैसे मिलता है?
सीधे आपके बैंक खाते में DBT से। खाता आपके अपने नाम का और आधार से जुड़ा होना चाहिए।
क्या कोई हेल्पलाइन है?
हाँ। पशुधन समस्याओं के लिए विभाग का टोल-फ्री नंबर 1800-180-5141 है, और लखनऊ में निदेशालय से 0522-2740482 पर बात हो सकती है।
तथ्य 4 अक्टूबर 2026 को up.goashray.in से जाँचे गए। संपादकीय नीति.
